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मानसूनी मौसम फिर लाया डकैतों की मौत का पैगाम

Tue, 17 Sep 2019 12:03 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Tue, 17 Sep 2019 12:03 AM IST
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Monsoon season brought back the message of death of dacoits
बांदा। हर मानसूनी मौसम पाठा में डकैत सरगनाओं की मौत का पैगाम लेकर आता है। संयोग कहा जाए या पाठा का भौगोलिक परिस्थितियां। पिछले एक दशक का इतिहास यही साबित कर रहा है। बुंदेलखंड के सबसे ज्यादा चर्चित दस्यु सरगना ददुआ से लेकर लगभग डेढ़ दर्जन इनामी डकैत और गिरोहों के हार्डकोर सदस्य बरसात के मौसम में ही मारे गए हैं। इस धारणा या किवदंती को दस्यु सरगना बबुली कोल की मौत ने एक बार फिर साबित कर दिया है।
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यूपी-एमपी की सरहद पर बड़े क्षेत्रफल में फैले पाठा के जंगल को डकैतों की अड्डे की शोहरत की शुरुआत 1975 में शिवकुमार उर्फ ददुआ कुर्मी (देवकली, चित्रकूट) ने कराई। कुछ दिनों बाद ही ददुआ को पुलिस ने अंतर्राज्यीय गिरोह (आईएस)-112 के रूप में दर्ज कर लिया। धीरे-धीरे उस पर इनाम की राशि साढ़े 5 लाख रुपये हो गई। तीन दशक से ज्यादा पाठा में दस्यु सरगना के रूप में बादशाहत करने वाले ददुआ को पुलिस ने मानसूनी मौसम में 23 जुलाई 2007 को उसके 10 साथियों के साथ मार गिराया था।
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ददुआ के बाद पाठा को दस्युओं के ठिकाने की शोहरत अंबिका पटेल उर्फ ठोकिया ने दिलाई। यह दस्यु सरगना भी बहुत खतरनाक साबित हुआ। ददुआ की मौत के अगले ही दिन इसने पाठा क्षेत्र के नजदीक बघोलन गांव के पास छह एसटीएफ जवानों को एक साथ गोलियों से भूनकर शहीद कर दिया था। अन्य कई पुलिस कर्मियों को मारने के अलावा कई जघन्य वारदातें अंजाम दीं। उस पर साढ़े 7 लाख रुपये का इनाम घोषित हुआ। अंतत: ठोकिया भी बारिश के मौसम में 4 अगस्त 2008 को मारा गया।
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ठोकिया के बाद पाठा में दस्यु सरगना सुंदर पटेल उर्फ रागिया ने सिर उठाया। मानसूनी मौसम ने उसे भी ठिकाने लगाया। 15 जुलाई 2012 को इसका भी अंत हो गया। रागिया के बाद पाठा में दस्यु सरगना स्वदेश पटेल उर्फ बलखड़िया का आतंक सिर चढ़कर बोला। अंतत: बारिश का मौसम उसके लिए भी बवालेजान साबित हुआ। 2 जुलाई 2015 को बलखड़िया का भी खात्मा हो गया। इनके अलावा दस्यु नंगू सिंह उर्फ इंद्रजीत सिंह 8 अगस्त 2006 और राजकरन पटेल उर्फ चच्चू 16 अगस्त 2006 को ठिकाने लगे।
इन सारे डकैतों के सफाए के बाद पाठा का मोस्टवांटेड बन गया बबुली कोल भी अंतत: मानसूनी मौसम में ही मारा गया। रविवार (15 सितंबर) को सीमावर्ती सतना जनपद के चमड़ी पहाड़ के जंगल में बबुली कोल और उसकी गैंग का हार्ड कोर सदस्य तथा रिश्ते में साला लवलेश कोल गोलियों से भून दिए गए। चर्चा तो यही है कि उसके गिरोह के ही एक नए सदस्य ने दोनों को मौत के घाट उतारा। उसके पीछे हाल ही में एक किसान के किए गए अपहरण में मिली फिरौती की रकम के बंटवारे का विवाद बताया जा रहा है। हालांकि मध्य प्रदेश पुलिस इन दोनों डकैतों को मुठभेड़ में अपने हाथों मार गिराने का दावा कर रही है।
कोल बिरादरी से पहला दस्यु सरगना था बबुली
बांदा। दस्युओं की बादशाहत के पहले पाठा में दादुओं की सल्तनत थी। यह दादू पाठा के जंगलों में तेंदू पत्ती के ठेकेदार हुआ करते थे। यहां आबाद कोल आदिवासियों से तेंदू पत्ती तुड़ाई जाती थी। 1970 के दशक में ददुआ के दस्तक देने के बाद पाठा में पनपना शुरू हुई दस्युओं गिरोहों की बेल अब तक जारी रही।

खास बात यह है कि यहां के गिरोहों की कमान अधिकतर पटेल बिरादरी के दस्युओं के हाथ रही। लेकिन उनकी हार्ड कोर से लेकर साधारण सदस्यों की टीम में कोल बिरादरी की भागीदारी जरूर रही। दस्यु बबुली कोल बिरादरी का पहला बड़ा दस्यु सरगना था। पहले वह ददुआ और उसके बाद ठोकिया व बलखड़िया गिरोहों में शामिल रहा। कोल बिरादरी के अन्य चर्चित दस्युओं में लवलेश कोल (बहिल पुरवा), भइयन उर्फ टाइगर उर्फ खरदूषण कोल (नेउरा, मऊ), अशोक कोल पुत्र छोटा (चमरौंहा, मानिकपुर), रोहिणी उर्फ भुंडा कोल (चमरौंहा) आदि शामिल हैं।
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