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मर्का पुल: सिर्फ तीन इंजीनियर ही नहीं, तीन सरकारें भी जवाबदेह
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मरका घाट में अधूरा पुल। (फाइल फोटो)
- फोटो : BANDA
बांदा। यमुना नदी में मर्का घाट पर पुल निर्माण में देरी के लिए सेतु निगम के मात्र तीन इंजीनियर ही जिम्मेदार नहीं हैं। आम लोगों में चर्चा है कि प्रदेश की तीन सरकारें भी इसके लिए जवाबदेह हैं। जिनकी सत्ता में यह पुल एक दशक से भी ज्यादा समय तक अधूरा रहा और लागत भी दोगुना बढ़ गई। इस लेटलतीफी का खामियाजा अगस्त माह में यहां नाव पलटने से 13 लोगों को जान गवां कर भुगतना पड़ा।
मर्का घाट नाव हादसे के बाद हरकत में आई सरकार ने पुल निर्माण में देरी की जांच पड़ताल कराई। इसमें सेतु निगम के तत्कालीन महाप्रबंधक (सिविल), उप परियोजना प्रबंधक और सहायक अभियंता को जिम्मेदार ठहराया गया है।
जांच में दलील दी गई है कि दिसंबर 2021 में पुल का भौतिक काम 71 फीसदी हो चुका था पर जुलाई 2022 में प्रगति का ग्राफ मात्र 79 प्रतिशत ही पहुंचा। यानी सात माह में मात्र 8 फीसदी ही प्रगति हुई।
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इस जांच के बाद यह सवाल उठ रहे हैं कि तत्कालीन बसपा सरकार में स्वीकृत और निर्माण शुरू हो जाने के बाद 2011 से अब तक बसपा के बाद पांच वर्ष सपा और उसके बाद अब तक करीब 7 वर्ष भाजपा सरकार के बीत गए। पुल चालू नहीं हो पाया।
इस दौरान सेतु निगम ने पुल का पुनरीक्षित (रिवाइज) एस्टीमेट लगभग दोगुना करते हुए शासन को भेजा। तत्कालीन सरकारें किस्तों में बजट देती रहीं। बजट के अभाव में कई वर्ष काम ठप रहा। सेतु निगम ने निर्माण में देरी का कारण आरटीआई कार्यकर्ता कुलदीप शुक्ला द्वारा मांगी गई सूचना में बजट का अभाव और कोरोनाकाल बताया था।
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इनसेट
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तीन बार बढ़ा पुल का एस्टीमेट
बांदा। बबेरू मार्ग पर यमुना नदी में मर्का घाट पर पुल की मंजूरी 13 सितंबर 2011 को मिली थी। तत्कालीन पीडब्ल्यूडी मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने स्वीकृति देने के बाद इसका शिलान्यास किया था। इस पुल को वर्ष 2016 में बनकर तैयार हो जाना था। तब इसकी लागत 38 करोड़ बताई गई थी। एक दशक में तीन बार इस्टीमेट बढ़ाया गया और इसकी लागत 70 करोड़ 48 लाख 67 हजार तक पहुंच गई। निर्माण के दौरान तत्कालीन कई मंत्री, उच्चाधिकारी और स्थानीय जनप्रतिनिधि भी पुल का निरीक्षण करते रहे। लेकिन निर्माण ने रफ्तार नहीं पकड़ी। अधूरा पुल मर्का घाट में नाव हादसा की वजह बन गया।
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इनसेट
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11 साल में बढ़ गई 70 मीटर लंबाई
बांदा। नाव हादसे के सरकार और अधिकारियों ने पुल की सुध ली और जांच-पड़ताल शुरू करा दी। करीब दो माह पूर्व सेतु निगम के उप परियोजना प्रबंधक अरुण कुमार ने डीएम को बताया था कि वर्ष 2010-11 में पुल स्वीकृत हुआ था। शासन ने 38 करोड़ 94 लाख रुपये मंजूर किए थे। लेकिन अब इसकी लागत बढ़कर 87 करोड़ 80 लाख 92 हजार रुपये हो गई। इनमें सेतु (पुल) के लिए 70 करोड़ 28 लाख 67 हजार रुपये और एप्रोच रोड के लिए पीडब्ल्यूडी को 17 करोड़ 52 लाख रुपये बजट शामिल है। सेतु की लंबाई लगभग 70 मीटर बढ़ने से लागत बढ़ी। 56 करोड़ 37 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं।
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मर्का घाट नाव हादसे के बाद हरकत में आई सरकार ने पुल निर्माण में देरी की जांच पड़ताल कराई। इसमें सेतु निगम के तत्कालीन महाप्रबंधक (सिविल), उप परियोजना प्रबंधक और सहायक अभियंता को जिम्मेदार ठहराया गया है।
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जांच में दलील दी गई है कि दिसंबर 2021 में पुल का भौतिक काम 71 फीसदी हो चुका था पर जुलाई 2022 में प्रगति का ग्राफ मात्र 79 प्रतिशत ही पहुंचा। यानी सात माह में मात्र 8 फीसदी ही प्रगति हुई।
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इस जांच के बाद यह सवाल उठ रहे हैं कि तत्कालीन बसपा सरकार में स्वीकृत और निर्माण शुरू हो जाने के बाद 2011 से अब तक बसपा के बाद पांच वर्ष सपा और उसके बाद अब तक करीब 7 वर्ष भाजपा सरकार के बीत गए। पुल चालू नहीं हो पाया।
इस दौरान सेतु निगम ने पुल का पुनरीक्षित (रिवाइज) एस्टीमेट लगभग दोगुना करते हुए शासन को भेजा। तत्कालीन सरकारें किस्तों में बजट देती रहीं। बजट के अभाव में कई वर्ष काम ठप रहा। सेतु निगम ने निर्माण में देरी का कारण आरटीआई कार्यकर्ता कुलदीप शुक्ला द्वारा मांगी गई सूचना में बजट का अभाव और कोरोनाकाल बताया था।
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तीन बार बढ़ा पुल का एस्टीमेट
बांदा। बबेरू मार्ग पर यमुना नदी में मर्का घाट पर पुल की मंजूरी 13 सितंबर 2011 को मिली थी। तत्कालीन पीडब्ल्यूडी मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने स्वीकृति देने के बाद इसका शिलान्यास किया था। इस पुल को वर्ष 2016 में बनकर तैयार हो जाना था। तब इसकी लागत 38 करोड़ बताई गई थी। एक दशक में तीन बार इस्टीमेट बढ़ाया गया और इसकी लागत 70 करोड़ 48 लाख 67 हजार तक पहुंच गई। निर्माण के दौरान तत्कालीन कई मंत्री, उच्चाधिकारी और स्थानीय जनप्रतिनिधि भी पुल का निरीक्षण करते रहे। लेकिन निर्माण ने रफ्तार नहीं पकड़ी। अधूरा पुल मर्का घाट में नाव हादसा की वजह बन गया।
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11 साल में बढ़ गई 70 मीटर लंबाई
बांदा। नाव हादसे के सरकार और अधिकारियों ने पुल की सुध ली और जांच-पड़ताल शुरू करा दी। करीब दो माह पूर्व सेतु निगम के उप परियोजना प्रबंधक अरुण कुमार ने डीएम को बताया था कि वर्ष 2010-11 में पुल स्वीकृत हुआ था। शासन ने 38 करोड़ 94 लाख रुपये मंजूर किए थे। लेकिन अब इसकी लागत बढ़कर 87 करोड़ 80 लाख 92 हजार रुपये हो गई। इनमें सेतु (पुल) के लिए 70 करोड़ 28 लाख 67 हजार रुपये और एप्रोच रोड के लिए पीडब्ल्यूडी को 17 करोड़ 52 लाख रुपये बजट शामिल है। सेतु की लंबाई लगभग 70 मीटर बढ़ने से लागत बढ़ी। 56 करोड़ 37 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं।