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Banda News: रिश्वत मामले में महोबा का तत्कालीन स्थापना लिपिक बरी
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बांदा। महोबा के वर्ष 2005 के चर्चित रिश्वत मामले में विशेष न्यायालय भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम ने जिला पंचायत महोबा के तत्कालीन स्थापना लिपिक आत्माराम सिंह को दोषमुक्त कर दिया।
विशेष न्यायाधीश चंद्रपाल-द्वितीय की अदालत ने अभियोजन के साक्ष्यों में गंभीर कमियां और रिश्वत मांगने व स्वीकार करने के आरोप के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलने पर यह फैसला सुनाया।
मामला तत्कालीन जिला पंचायत महोबा के टैक्स कलेक्टर हनीफुद्दीन की शिकायत से जुड़ा था। उन्होंने विजिलेंस अधिष्ठान झांसी में शिकायत की थी कि छत्रसाल ग्रामीण बैंक से पर्सनल लोन लेने के लिए वेतन व कटौती संबंधी विवरण अंकित कर अधिकारियों के हस्ताक्षर कराने के एवज में स्थापना लिपिक आत्माराम सिंह ने ढाई हजार रुपये रिश्वत मांगी।
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शिकायत के आधार पर विजिलेंस टीम ने उसे 28 जून 2005 को पालीवाल मार्केट स्थित बैंक के पास ट्रैप किया। अभियोजन के मुताबिक, आत्माराम सिंह को एक हजार रुपये रिश्वत लेते गिरफ्तार किया गया। इसके बाद कोतवाली नगर महोबा में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
बचाव पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि जिस काम के बदले रिश्वत मांगने का आरोप लगाया गया, वह ट्रैप की तारीख से करीब 40 दिन पहले ही पूरा हो चुका था। लोन आवेदन से संबंधित दस्तावेजों का निस्तारण 20 मई 2005 को हो चुका था। अपर मुख्य अधिकारी और जिला पंचायत अध्यक्ष के हस्ताक्षर भी उसी दिन हो गए थे। ऐसे में 28 जून को उसी काम के लिए रिश्वत मांगने का आरोप अभियोजन साबित नहीं कर सका।
विजिलेंस ट्रैप के स्वतंत्र गवाह रमेश चंद्र भी अदालत में अभियोजन की कहानी के अनुरूप बयान नहीं दे सके। अदालत ने उन्हें पक्षद्रोही घोषित किया। दूसरे स्वतंत्र गवाह मुश्ताक को अभियोजन ने अदालत में परीक्षित ही नहीं कराया। अदालत ने माना कि अभियोजन आरोपी के खिलाफ रिश्वत मांगने और स्वीकार करने का आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका। इसके बाद आत्माराम सिंह को सभी आरोपों से बरी करने का आदेश दिया।
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टूटी मिली धोवन की शीशी, मांग का भी ठोस प्रमाण नहीं
मामले में रासायनिक परीक्षण के लिए भेजी गई शीशियों में शिकायतकर्ता के हाथ के धोवन वाली शीशी टूटी मिली। उसका घोल भी बह चुका था। इससे अभियोजन के वैज्ञानिक साक्ष्य भी सवालों के घेरे में आए। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय की नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में रिश्वत की मांग और स्वीकृति को संदेह से परे साबित करना जरूरी है। केवल रिश्वत की रकम बरामद हो जाने के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता।
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विशेष न्यायाधीश चंद्रपाल-द्वितीय की अदालत ने अभियोजन के साक्ष्यों में गंभीर कमियां और रिश्वत मांगने व स्वीकार करने के आरोप के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलने पर यह फैसला सुनाया।
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मामला तत्कालीन जिला पंचायत महोबा के टैक्स कलेक्टर हनीफुद्दीन की शिकायत से जुड़ा था। उन्होंने विजिलेंस अधिष्ठान झांसी में शिकायत की थी कि छत्रसाल ग्रामीण बैंक से पर्सनल लोन लेने के लिए वेतन व कटौती संबंधी विवरण अंकित कर अधिकारियों के हस्ताक्षर कराने के एवज में स्थापना लिपिक आत्माराम सिंह ने ढाई हजार रुपये रिश्वत मांगी।
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शिकायत के आधार पर विजिलेंस टीम ने उसे 28 जून 2005 को पालीवाल मार्केट स्थित बैंक के पास ट्रैप किया। अभियोजन के मुताबिक, आत्माराम सिंह को एक हजार रुपये रिश्वत लेते गिरफ्तार किया गया। इसके बाद कोतवाली नगर महोबा में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
बचाव पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि जिस काम के बदले रिश्वत मांगने का आरोप लगाया गया, वह ट्रैप की तारीख से करीब 40 दिन पहले ही पूरा हो चुका था। लोन आवेदन से संबंधित दस्तावेजों का निस्तारण 20 मई 2005 को हो चुका था। अपर मुख्य अधिकारी और जिला पंचायत अध्यक्ष के हस्ताक्षर भी उसी दिन हो गए थे। ऐसे में 28 जून को उसी काम के लिए रिश्वत मांगने का आरोप अभियोजन साबित नहीं कर सका।
विजिलेंस ट्रैप के स्वतंत्र गवाह रमेश चंद्र भी अदालत में अभियोजन की कहानी के अनुरूप बयान नहीं दे सके। अदालत ने उन्हें पक्षद्रोही घोषित किया। दूसरे स्वतंत्र गवाह मुश्ताक को अभियोजन ने अदालत में परीक्षित ही नहीं कराया। अदालत ने माना कि अभियोजन आरोपी के खिलाफ रिश्वत मांगने और स्वीकार करने का आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका। इसके बाद आत्माराम सिंह को सभी आरोपों से बरी करने का आदेश दिया।
टूटी मिली धोवन की शीशी, मांग का भी ठोस प्रमाण नहीं
मामले में रासायनिक परीक्षण के लिए भेजी गई शीशियों में शिकायतकर्ता के हाथ के धोवन वाली शीशी टूटी मिली। उसका घोल भी बह चुका था। इससे अभियोजन के वैज्ञानिक साक्ष्य भी सवालों के घेरे में आए। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय की नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में रिश्वत की मांग और स्वीकृति को संदेह से परे साबित करना जरूरी है। केवल रिश्वत की रकम बरामद हो जाने के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता।