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कालिंजर कार्तिक मेला में श्रद्धालुओं का जमघट
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 04 Nov 2017 12:01 AM IST
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कार्तिक पूर्णिमा मेला के मौके पर कालिंजर दुर्ग में श्रद्धालुओं की भीड़।
- फोटो : अमर उजाला
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बुंदेलखंड के मशहूर मेलों में शामिल कार्तिक पूर्णिमा का मेला यहां ऐतिहासिक कालिंजर दुर्ग में शुरू हो गया। यह पांच दिन चलेगा। शुक्रवार को मंदिरों में दर्शन के साथ श्रद्धालु सांस्कृतिक और मनोरंजक कार्यक्रमों का भी लुत्फ लिया। मेले में बड़ी संख्या में सीमावर्ती मध्य प्रदेश के श्रद्धालु भी शामिल हैं।
पूर्णिमा मेले में मुख्य श्रद्धा दुर्ग के तालाबों में स्नान की है। बुड्ढा-बुड्ढी तालाब, रामकटोरा और कोटितीर्थ तालाबों और स्वर्गारोहिणी कुंड में श्रद्धालु स्नान करने के बाद नीलकंठेश्वर मंदिर में जलाभिषेक और पूजा-अर्चना कर रहे हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आमद हो रही है।
महिलाएं खासकर एक माह ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करके यहां दुर्ग में जलाभिषेक और पूजा-अर्चना करतीं हैं। उधर, श्रद्धालुओं की भीड़ के मद्देनजर बैरियर लगाए गए हैं। रामनगर रोड और बांदा रोड, सतना रोड और पन्ना रोड पर बैरियर लगे हैं। वाहनों को मेला परिसर में दाखिल नहीं होने दिया जा रहा। उधर, सुरक्षा की दृष्टि से मेले में चार सब इंस्पेक्टर, 26 कांस्टेबिल, चार महिला सिपाही और गुढ़ा, सढ़ा तथा किला चौकियों सहित कालिंजर थाना पुलिस लगाई गई है। जल संस्थान ने पानी के टैंकर खड़े किए हैं।
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चंदेल नरेश ने की थी शुरुआत
कार्तिक पूर्णिमा मेला पर हर वर्ष दुर्ग पर मेला लगता है। बताते हैं कि इसकी शुरुआत चंदेल नरेश परमादीदेव ने 1165 ईस्वी में की थी। इसका उल्लेख ऐतिहासिक अभिलेखों में मिलता है। परमादीदेव साहित्यिक एवं धार्मिक प्रवृत्ति का शासक था। उसने खुद भगवान नीलकंठ की स्तुति प्रणयन किया है। दुर्ग के नीलकंठेश्वर मंदिर के गर्भ में शिलालेख में इसका उल्लेख मिलता है। बताते हैं कि चंदेल शासक में मंत्री रहे वत्सराज द्वारा रचित रूपक षष्ठकम के छह नाटकों के मंचन में कार्तिक पूर्णिमा महोत्सव भी शामिल था। तभी से कार्तिक पूर्णिमा पर दुर्ग में मेला आयोजित होता चला आ रहा है। यह कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया तक पांच दिन होता है।
पानी भरा टैंकर लुढ़का, दुकानें तहस-नहस
शुक्रवार को कार्तिक मेला परिसर में जल संस्थान ने पानी भरा टैंकर किला रोड पर खड़ा किया था। रास्ता ढालदार होने से टैंकर अचानक पीछे की ओर लुढ़क गया। टैंकर वहां लगी दुकानों में जा घुसा। दुकानदारों और वहां बैठे लोगों ने भाग कर जान बचाई। दुकानें तहस-नहस हो गई। मेला के बावजूद यहां की सड़क दुरुस्त नहीं कराई गई। किला मार्ग के अलावा नरैनी मार्ग में भी गड्ढ़े हैं। मंदिर गेट के पास की टंकी दुरुस्त नहीं कराई गई।
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पूर्णिमा मेले में मुख्य श्रद्धा दुर्ग के तालाबों में स्नान की है। बुड्ढा-बुड्ढी तालाब, रामकटोरा और कोटितीर्थ तालाबों और स्वर्गारोहिणी कुंड में श्रद्धालु स्नान करने के बाद नीलकंठेश्वर मंदिर में जलाभिषेक और पूजा-अर्चना कर रहे हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आमद हो रही है।
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महिलाएं खासकर एक माह ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करके यहां दुर्ग में जलाभिषेक और पूजा-अर्चना करतीं हैं। उधर, श्रद्धालुओं की भीड़ के मद्देनजर बैरियर लगाए गए हैं। रामनगर रोड और बांदा रोड, सतना रोड और पन्ना रोड पर बैरियर लगे हैं। वाहनों को मेला परिसर में दाखिल नहीं होने दिया जा रहा। उधर, सुरक्षा की दृष्टि से मेले में चार सब इंस्पेक्टर, 26 कांस्टेबिल, चार महिला सिपाही और गुढ़ा, सढ़ा तथा किला चौकियों सहित कालिंजर थाना पुलिस लगाई गई है। जल संस्थान ने पानी के टैंकर खड़े किए हैं।
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चंदेल नरेश ने की थी शुरुआत
कार्तिक पूर्णिमा मेला पर हर वर्ष दुर्ग पर मेला लगता है। बताते हैं कि इसकी शुरुआत चंदेल नरेश परमादीदेव ने 1165 ईस्वी में की थी। इसका उल्लेख ऐतिहासिक अभिलेखों में मिलता है। परमादीदेव साहित्यिक एवं धार्मिक प्रवृत्ति का शासक था। उसने खुद भगवान नीलकंठ की स्तुति प्रणयन किया है। दुर्ग के नीलकंठेश्वर मंदिर के गर्भ में शिलालेख में इसका उल्लेख मिलता है। बताते हैं कि चंदेल शासक में मंत्री रहे वत्सराज द्वारा रचित रूपक षष्ठकम के छह नाटकों के मंचन में कार्तिक पूर्णिमा महोत्सव भी शामिल था। तभी से कार्तिक पूर्णिमा पर दुर्ग में मेला आयोजित होता चला आ रहा है। यह कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया तक पांच दिन होता है।
पानी भरा टैंकर लुढ़का, दुकानें तहस-नहस
शुक्रवार को कार्तिक मेला परिसर में जल संस्थान ने पानी भरा टैंकर किला रोड पर खड़ा किया था। रास्ता ढालदार होने से टैंकर अचानक पीछे की ओर लुढ़क गया। टैंकर वहां लगी दुकानों में जा घुसा। दुकानदारों और वहां बैठे लोगों ने भाग कर जान बचाई। दुकानें तहस-नहस हो गई। मेला के बावजूद यहां की सड़क दुरुस्त नहीं कराई गई। किला मार्ग के अलावा नरैनी मार्ग में भी गड्ढ़े हैं। मंदिर गेट के पास की टंकी दुरुस्त नहीं कराई गई।