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महुआ से मिटा रहे पेट की आग

Wed, 04 May 2016 11:51 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा Updated Wed, 04 May 2016 11:51 PM IST
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Deleting Mahua stomach fire
महुआ बीनकर पेट का जुगाड़ करते मां-बेटे। - फोटो : अमर उजाला

करतल। मौसम की मार से फसल दगा दे गई। अब तमाम गांवोें में भूख मिटाने का रास्ता सिर्फ जंगली फल बचे हैं। इन दिनों महुआ का मौसम है। फल से पेड़ लदे पड़े हैं। बुंदेलखंड में महुआ कई तरह से खाया जाता है। इन दिनों तमाम गरीब जंगल में महुआ बीनकर लपसी और डुबरी बनाकर खा रहे हैं।

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नरैनी क्षेत्र में एमपी की सरहद से जुड़े गांवों की हालत ज्यादा खराब है। सूखे ने यहां सब कुछ पलट दिया है। गाजीपुर गांव के अंश खलारी में बुधवार को रामपाल पटेल का आठ वर्षीय पुत्र सुशील अपनी मां के साथ जंगल में महुआ बीन रहा था। वह स्कूल नहीं गया। अपनी मां कला के साथ पिछले एक महीने से महुआ बीनने में मदद कर रहा है।
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रामपाल के पास सिर्फ पांच बीघा जमीन है। नाममात्र को गेहूं पैदा हुआ है। इससे घर का खर्च नहीं चल सकता। वह बताता है कि कोटेदार ने पिछले तीन महीनों से राशन नहीं दिया। रामपाल बारातों आदि मेें बहरुपिया बनकर प्रदर्शन करता है। यह काम कभी कभार ही मिलता है।
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उसकी पत्नी कला ने कहा कि महुआ का भंडार कर लेने से अगले तीन-चार महीने इसकी लपसी और डुबरी बना खाकर काम चला लेंगे। कमोबेश यही स्थिति आसपास के गांवों की भी है। यहां के तमाम बाशिंदे मध्य प्रदेश की पन्ना घाटी चले गए हैं। वहां उन्हें जंगली फल अचार व गरेधू मिल रहा है। इसे वह बेंचकर काम चला रहे हैं।


अब तक न तो किसी ग्रामीण को राहत राशन पैकेट मिला न ही पशुपालक को भूसा। उधर, इस बारे में नरैनी उप जिलाधिकारी महेंद्र सिंह का कहना है कि पूर्ति निरीक्षक को भेजकर जांच करवाई जा रही है। पात्र पीड़ितों को पूरी मदद मिलेगी। उन्होंने बताया कि गांवों और मजरों में 10-10 गरीब परिवारों की सूची स्कूल के प्रधानाध्यापकों से मांगी गई है। उन्होंने कोटेदारों को खबरदार किया कि ईमानदारी से राशन वितरण न किया तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।

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