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बुंदेलखंड के 12 जल संग्रह स्थलों को साल में मिलते हैं मात्र सवा चार लाख
Banda
Updated Mon, 11 Jun 2012 12:00 PM IST
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बांदा। बुंदेलखंड जैसे जल आपदा वाले क्षेत्र में पुरातत्व विभाग जल संग्रह कार्याें पर मात्र चार लाख रुपए सालाना खर्च करता है। खास बात यह है कि लखनऊ मंडल से जुड़े कुल 13 जल संग्रह स्थलों में 12 अकेले बुंदेलखंड में हैं। सिर्फ एक जल संग्रह स्थल बाहर है। यह रमाबाई नगर (कानपुर देहात) में बिछियापुरा में संदल शाह गुंबद वाला ताल है वहीं बुंदेलखंड के 12 जल संग्रह स्थल उपेक्षा के चलते अपने अस्तित्व खोते नजर आ रहे हैं। यहां पर बरसात में ही पानी नजर आता है।
गौरतलब है कि बुंदेलखंड में पानी का संकट नया नहीं है। शताब्दियों पूर्व भी यहां पानी महत्वपूर्ण था। राजा महाराजाओं द्वारा बनवाए गए स्मारकों, किलो आदि में जल संग्रह स्थल के रूप में बावली, ताल-तालाब इत्यादि बनवाए गए थे। यह आज भी मौजूद हैं लेकिन यह पूर्व की तरह पानी से लबरेज नहीं रहे। देखरेख के अभाव में इनमें जल संग्रह और भंडारण की क्षमता घट गई है। लगभग सभी स्मारक पुरातत्व विभाग के संरक्षण में हैं। अखिल भारतीय बुुंदेलखंड विकास मंच महासचिव नसीर अहमद सिद्दीकी को जनसूचना अधिकार अधिनियम के तहत पुरातत्व विभाग के उप अधीक्षण पुरातत्व विद् लखनऊ मंडल इंदुप्रकाश ने जानकारी दी है कि पिछले पांच वर्षाें में बुंदेलखंड के जल संग्रह स्थलों के संरक्षण में 21 लाख 13 हजार रुपए खर्च किए गए यानी चार लाख 22 हजार रुपए सालाना। बुंदेलखंड में 176 केंद्रीय संरक्षित स्मारक हैं। इनमें 12 जल संग्रह स्थल हैं। पुरातत्व विभाग ने सबसे ज्यादा चार लाख 112 रुपए अकोना स्थित जल संग्रह स्थल पर खर्च किया है। सबसे कम 30 हजार रुपए कीरत सागर (महोबा) में खर्च किए गए। पांच वर्षाें में कीरत सागर पर मात्र 2 लाख 6 हजार रुपए खर्च हुआ है। कालिंजर (बांदा) के पाताल गंगा, पांडु कुंज, बुड्ढा-बुड्ढी तालाब, कोटि तीरथ और चित्रकूट में पैश्वनी नदी, लोखरी झील, रामनगर ताल, महोबा में रामनगर झील, सिजारी जैसे अनेक जल संग्रह स्थलों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने संरक्षित सूचीबद्ध नहीं किया जबकि यह ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के हैं। महोबा के कीरत सागर, मदन सागर और विजय सागर में पूरे साल पानी मिलता है। बांदा में मात्र एक बावली भवानीपुरवा में है। इसमें सिर्फ बरसात में पानी इकट्ठा होता है।
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गौरतलब है कि बुंदेलखंड में पानी का संकट नया नहीं है। शताब्दियों पूर्व भी यहां पानी महत्वपूर्ण था। राजा महाराजाओं द्वारा बनवाए गए स्मारकों, किलो आदि में जल संग्रह स्थल के रूप में बावली, ताल-तालाब इत्यादि बनवाए गए थे। यह आज भी मौजूद हैं लेकिन यह पूर्व की तरह पानी से लबरेज नहीं रहे। देखरेख के अभाव में इनमें जल संग्रह और भंडारण की क्षमता घट गई है। लगभग सभी स्मारक पुरातत्व विभाग के संरक्षण में हैं। अखिल भारतीय बुुंदेलखंड विकास मंच महासचिव नसीर अहमद सिद्दीकी को जनसूचना अधिकार अधिनियम के तहत पुरातत्व विभाग के उप अधीक्षण पुरातत्व विद् लखनऊ मंडल इंदुप्रकाश ने जानकारी दी है कि पिछले पांच वर्षाें में बुंदेलखंड के जल संग्रह स्थलों के संरक्षण में 21 लाख 13 हजार रुपए खर्च किए गए यानी चार लाख 22 हजार रुपए सालाना। बुंदेलखंड में 176 केंद्रीय संरक्षित स्मारक हैं। इनमें 12 जल संग्रह स्थल हैं। पुरातत्व विभाग ने सबसे ज्यादा चार लाख 112 रुपए अकोना स्थित जल संग्रह स्थल पर खर्च किया है। सबसे कम 30 हजार रुपए कीरत सागर (महोबा) में खर्च किए गए। पांच वर्षाें में कीरत सागर पर मात्र 2 लाख 6 हजार रुपए खर्च हुआ है। कालिंजर (बांदा) के पाताल गंगा, पांडु कुंज, बुड्ढा-बुड्ढी तालाब, कोटि तीरथ और चित्रकूट में पैश्वनी नदी, लोखरी झील, रामनगर ताल, महोबा में रामनगर झील, सिजारी जैसे अनेक जल संग्रह स्थलों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने संरक्षित सूचीबद्ध नहीं किया जबकि यह ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के हैं। महोबा के कीरत सागर, मदन सागर और विजय सागर में पूरे साल पानी मिलता है। बांदा में मात्र एक बावली भवानीपुरवा में है। इसमें सिर्फ बरसात में पानी इकट्ठा होता है।
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