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Balrampur News: बलरामपुर में पड़ी थी राम जन्मभूमि को मुक्त कराने की नींव

Thu, 28 Dec 2023 11:44 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर Updated Thu, 28 Dec 2023 11:44 PM IST
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The foundation for liberating Ram Janmabhoomi was laid in Balrampur.
बलरामपुर। अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की धूम जोरों पर है। पांच सौ साल बाद पूरे हो रहे सपने को देखकर सभी की भावनाएं हिलोरे मार रही हैं। इन सब के बीच यह सच्चाई कम लोगों को ही पता है कि राम जन्मभूमि को मुक्त कराने में बलरामपुर का विशेष स्थान है। रामजन्म मंदिर की भूमि मुक्त कराने की नींव आजादी से पहले ही वर्ष 1947 में बलरामपुर के रामभवन में हुए मंथन के साथ पड़ी थी।
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बलरामपुर रियासत के तत्कालीन महाराजा पाटेश्वरी प्रसाद सिंह की हिंदू भावनाओं और लान टेनिस खेल में रुचि लेने के कारण गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ और फैजाबाद (अब अयोध्या) के जिला मजिस्ट्रेट केके नायर सेे मित्रता थी। महाराजा पाटेश्वरी की धर्म सम्राट की उपाधि से विभूषित स्वामी करपात्री महाराज से भी नजदीकियां थीं। 1947 के शुरुआती महीनों में करपात्री महाराजा की मौजूदगी में राज भवन में ही अयोध्या में राम जन्मभूमि को मुक्त कराने की रणनीति पर पहली बार चर्चा हुई थी।
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इसमें पाटेश्वरी प्रसाद सिंह, गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ और राम भक्त गोंडा के तत्कालीन कलेक्टर केके नायर भी शामिल थे। इसके बाद मंदिर आंदोलन को तेज करने के लिए 1947 में ही करपात्री महाराज ने बलरामपुर के महाराजा के साथ मिलकर अखिल भारतीय राम राज्य परिषद पार्टी की स्थापना की थी। बताया जाता है कि इन्हीं चार नायकों की रणनीति के कारण 22 व 23 दिसंबर 1949 की मध्यरात्रि में रामलला की एक मूर्ति रहस्यमय ढंग से विवादित स्थल पर दिखाई दी थी। मूर्ति की मौजूदगी ने हिंदू समाज के बीच एक अभूतपूर्व जोश जगा दिया था। इससे परेशान तात्कालिक सरकार ने फैजाबाद के जिला मजिस्ट्रेट केके नायर से मूर्ति को हटवाने के लिए कहा लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि इससे सांप्रदायिक हिंसा भड़क सकती है। संवाद
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केरल के अलेप्पी में 11 सितंबर 1907 को जन्मे और 1930 बैच के आईसीएस केके नायर अगस्त 1946 में गोंडा के जिला मजिस्ट्रेट बने थे। इसके बाद उनकी महाराजा से दोस्ती हुई और 1947 में राम जन्मभूमि की रणनीति पर पहली बार चर्चा हुई। जुलाई 1947 में उनका स्थानांतरण फैजाबाद (अब अयोध्या) के लिए हो गया।
इसके बाद गोरखपुर स्थित गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ से इन दोनाें की मित्रता हुई और इन्हीं की रणनीति के चलते 22 व 23 दिसंबर 1949 की रात में मंदिर के अंदर के हिस्से में भगवान श्रीराम की एक मूर्ति लोगों को मिली थी।

वर्ष 1952 में सेवानिवृत्ति लेने के बाद नायर बहराइच सीट से जनसंघ के टिकट पर चुनाव जीतकर लोकसभा भी पहुंचे। उनकी पत्नी शकुंतला नायर भी कैसरगंज से तीन बार जनसंघ के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीत चुकी हैं।
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