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Balrampur News: अवध की माटी से उपजा साहित्य बनेगा अकादमिक विरासत

Mon, 27 Oct 2025 09:28 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 27 Oct 2025 09:28 PM IST
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Literature born from the soil of Awadh will become academic heritage.
बलरामपुर में ​स्थित मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय ।-संवाद
बलरामपुर। मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अवधी साहित्य को अकादमिक पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया है। अब विश्वविद्यालय में विद्यार्थी केवल कविताओं तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि अवधी गद्य की समृद्ध परंपरा, उसकी संवेदना, विचारधारा और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को भी पढ़ेंगे। विश्वविद्यालय ने अवधी साहित्य शीर्षक से एक नया पाठ्यक्रम तैयार किया है, जिसमें अवधी के कवि, लेखक और पत्रकारों की रचनाओं को शामिल किया गया है।
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विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रविशंकर सिंह की पहल पर तैयार किए गए इस पाठ्यक्रम को हिंदी विभाग की पाठ्यक्रम समिति ने तैयार किया है। समिति के पूर्व संयोजक प्रो. शैलेंद्र नाथ मिश्र ने बताया कि कुलपति की मंशा है कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाला संस्थान न रहकर क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृति के संवर्धन का केंद्र बने। उन्होंने कहा कि अवध की आत्मा उसकी भाषा में बसती है। इस भाषा की मिठास, लोकभावना और आध्यात्मिक गहराई को नई पीढ़ी तक पहुंचाना ही उद्देश्य है। बलरामपुर, गोंडा, अयोध्या, बहराइच और श्रावस्ती जैसे जिलों की भूमि अवधी की जननी रही है। यहां की लोकभाषा में संस्कृत की शुद्धता, हिंदी की सहजता और लोकगीतों की भावनात्मकता का अद्भुत संगम मिलता है। विश्वविद्यालय की यह पहल न केवल स्थानीय साहित्य को सम्मान देगी, बल्कि नई पीढ़ी में अपनी मातृभाषा के प्रति गौरव और जुड़ाव भी बढ़ाएगी। (संवाद)
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अब गद्य से जुड़ेगा अवधी का नया अध्याय
अब तक विश्वविद्यालयों में अवधी साहित्य को केवल भक्तिकालीन कविताओं तक सीमित कर दिया गया था, परंतु मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय ने पहली बार अवधी गद्य को शामिल कर नया अध्याय शुरू किया है। इसमें कहानी, उपन्यास, निबंध, एकांकी, डायरी और बाल साहित्य जैसी गद्य विधाओं को विशेष रूप से स्थान दिया गया है। प्रो. मिश्र ने बताया कि पाठ्यक्रम में भारतेंदु मिश्र का प्रसिद्ध उपन्यास ‘चंदावती’, सुधेंद्र ओझा का ‘के सही के गलत’, गंगा प्रसाद गुणशेखर की कहानियां तथा रस्मशील शुक्ल, विनय दास, ज्ञानवती दीक्षित और त्रिलोचन शास्त्री जैसी विभूतियों की रचनाएं शामिल की गई हैं। ये रचनाएं न केवल भाषा का सौंदर्य प्रस्तुत करती हैं बल्कि अवध के समाज, लोकसंस्कृति और मूल्यबोध को भी उजागर करती हैं।
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भक्तिकाल से आधुनिक काल तक की कड़ी बनेगा पाठ्यक्रम
अवधी कविता के अध्ययन के लिए पाठ्यक्रम में गुरु गोरखनाथ की अवधी कविताओं के साथ गोस्वामी तुलसीदास और मलिक मोहम्मद जायसी की रचनाओं को भी शामिल किया गया है। वहीं, आधुनिक अवधी कविता में बलभद्र प्रसाद दीक्षित ‘पढ़ीस’, बंशीधर शुक्ल, विश्वनाथ पाठक, रमई काका, और मृगेश जी जैसे कवियों को स्थान मिला है। पाठ्यक्रम में अवधी साहित्य की पत्रकारिता को भी स्थान दिया गया है। विद्यार्थियों को अवधी के संपादकीय लेखन, साहित्यिक डायरी लेखन, एकांकी नाटक, और बाल कहानियों से परिचित कराया जाएगा। इससे छात्रों को क्षेत्रीय साहित्य की बारीकियों और उसके विकासक्रम को समझने में मदद मिलेगी।


नई शिक्षा नीति के अनुरूप नवाचार
यह पाठ्यक्रम नई शिक्षा नीति (एनईपी-2020) के अनुरूप तैयार किया गया है। स्नातक के चतुर्थ वर्ष में इसे शामिल किया गया है, जिसे परास्नातक के प्रथम वर्ष के समकक्ष माना गया है। इस प्रकार विद्यार्थी स्नातक और परास्नातक दोनों स्तरों पर अवधी साहित्य का गहन अध्ययन कर सकेंगे। विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि यह पहल क्षेत्रीय भाषाओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाने में मील का पत्थर साबित होगी। कुलपति प्रो. रविशंकर सिंह ने कहा कि अवधी केवल भाषा नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। यह पहल हमारी जड़ों से जुड़ने का माध्यम बनेगी। आने वाले वर्षों में विश्वविद्यालय अवधी शोध और लेखन को वैश्विक मंच तक पहुंचाने की दिशा में भी कार्य करेगा।
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