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दस वर्ष से झेल रहे कटान का दंश, कोई नहीं आया पूछने

Thu, 23 Jul 2020 11:24 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 23 Jul 2020 11:24 PM IST
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Ten years of bruising, no one came to ask
लालगंज। दस साल से कटान का दंश झेल रहे जगदीश पुर, भुसौला दक्षिणी, नरदरा दक्षिणी के लोगों के साथ ही मुरार पट्टी, बहुआरा व शिवपुर कपूर दियर के किसान कटान से निजात दिलाने के लिए स्थायी समाधान नहीं होने पर सरकार पर ही सवाल उठाने लगे हैं। कटान के मुहाने पर रह रहे लोग बताते हैं कि गंगा नदी का पानी बढ़ जाने के बाद विभाग की नींद खुलती है और पानी में काम कराने के नाम पर लूट खसोट करते हैं।
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बता दें कि भुसौला गांव के सामने वर्ष 2011 में गंगा नदी ने कटान की शुरुआत की और हर साल लोगों के आशियाने उजाड़ती रही। सरकार मूकदर्शक बनी रही। किसी ने स्थायी समाधान की बात नहीं की। इससे दक्षिणी भुसौला के दर्जनों मकान गंगा में विलीन हो गए और देखते ही देखते गांव का अस्तित्व मिट गया। नरदरा गांव व जगदीशपुर की आधी से अधिक आबादी का आशियाना गंगा में समाहित हो गया पर किसी ने समाधान की कोशिश तक नहीं की। इसके साथ ही मुरारपट्टी, बहुआरा व शिवपुर कपूर दियर की सैकड़ों एकड़ भूमि गंगा में समाहित होने के बाद कई सरकारें आईं और गईं पर किसी ने मुआवजा के रूप में एक धेला तक नहीं दिया। जो लोग कटान के मुहाने पर हैं उनका कहना है कि अब सरकारों से विश्वास उठ गया है। गंगा मइया का ही आसरा रह गया है। बाढ़ विभाग के सहायक अभियंता कमलेश कुमार का कहना है कि शासन से इन गांवों को बचाने के लिए किसी प्रकार का धन आवंटित नहीं है। यदि इन गांवों में कटान शुरू होता है तो आपदा प्रबंधन कोष से अवश्य ही कार्य कराया जाएगा।
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पानी के बढ़ाव के बाद परिवार व बच्चों संग लगभग तीन महीनों तक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। पत्रकारों के सिवा यहां कोई अधिकारी कर्मचारी झांकने तक नहीं आता इसलिए सरकारों से विश्वास उठ गया है। - श्रीभगवान पांडेय, जगदीशपुर
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हमारा घर 2016 में ही गंगा में समाहित हो गया है। कटान के मुहाने पर शेष बचे दरवाजे पर किसी तरह जीवन यापन करते हैं। जब से हमारा घर गिरा है तब से भी यदि कटान रोकने का स्थाई समाधान किया गया होता तो गांव का अस्तित्व बचाया जा सकता था। - रामबदन पांडेय, जगदीशपुर
सरकार जो पैसे गंगा का पानी बढ़ने के बाद खर्च करती है यदि वही पैसा पानी तलहटी में होने के समय करती तो कुछ हद तक इस क्षेत्र में कटान को रोका जा सकता था लेकिन अधिकारी हों या जन प्रतिनिधि सिर्फ बातें करते हैं। किसी ने स्थायी समाधान नहीं किया। - हरिनारायण मिश्र, नरदरा

10 साल में कई किसानों की सैकड़ों एकड़ कृषि योग्य भूमि गंगा नदी में समाहित हो गई। इन किसानों को मुआवजा आज तक नहीं मिला। अब से भी यदि सरकार कटान रोकने की कोशिश करती तो किसान भविष्य में खाने को मोहताज नहीं होते। - शंकर सिंह, बहुआरा
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