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पांच वर्ष में लिंगानुपात में आई चार फीसदी की कमी
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बलिया। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 में जिले में बेटियों के लिंगानुपात में एनएफएचएस-4 की बजाय करीब चार फीसदी कम हो गया है। अब प्रति हजार बेटों में 1009 बेटियां जन्म ले रही हैं। जबकि पांच साल पहले तक ये आंकड़ा 1064 था। सुधार के बावजूद जिला लिंगानुपात में पूर्व की बजाए इस वर्ष कुछ पिछड़ा है। इससे साफ है कि जनपद में गर्भपात जैसी वारदातों में इजाफा हुआ है। यहीं स्थिति रही तो आगे स्थिति और गंभीर हो सकती है।
हाल ही में नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे 2020-21 की रिपोर्ट जारी हुई है। रिपोर्ट ने साबित कर दिया है कि सरकार के प्रयासों ने प्रदेश में लिंगानुपात का ग्राफ सुधारा है। लेकिन जिले में लिंगानुपात वर्ष 2015-16 की बजाय कुछ कमजोर हुई हुई है। एनएफएचएस-4 2015-16 की रिपोर्ट में जिले में प्रति हजार बेटों पर लड़कियों की आबादी 6.4 फीसदी अधिक थीं, जो कि एनएफएचएच-5 की रिपोर्ट में यह संख्या घटकर 0.9 हो गई है। प्रति वर्ष एक फीसद की दर से गिरावट दर्ज की गई है। आंकड़ों पर गौर करें तो जिले में बेटियों के लिंग अनुपात में बीते पांच वर्षों में 5.5 फीसदी कमी आई है। अब यहां 1000 पुरुषों के सापेक्ष 1064 की जगह 1009 बेटियां जन्म ले रही हैं। पिछले पांच सालों में ग्राफ में 55 बेटियां प्रति हजार की कमी आई है।
जिले में बढ़ा संस्थागत प्रसव
एनएफएचएस-5 की रिपोर्ट में जिले में संस्थागत प्रसव बढ़ा है। पहले 73.6 प्रतिशत की जगह 90.0 फीसदी हो गया है। सरकारी संस्थानों में भी संस्थागत प्रसव 49.1 फीसदी की जगह 73.9 प्रतिशत हो गया है। इतना ही नहीं पूर्व घर पर होने वाले प्रसव की दर मं भी इस बार जिले में सुधार नजर आ रहा है। सर्वेक्षण की रिपोर्ट में पूर्व में 6.7 की जगह इस बार इसे 4.5 बताया गया है। हालांकि, सरकारी संस्थानों में संस्थागत प्रसव में कमी आई है और सर्वेघक्षण के मुताबिक अब भी निजी नर्सिंग होम लोगों की पहली पसंद बने है।
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डीपीएम, एनएचएम, डॉ.आरबी यादव ने बताया कि लिंगानुपात में कमी चिंताजनक अवश्य है, लेकिन अभी भी जिले में पुरुषों की बजाए महिलाओं की संख्या ज्यादा है। जिले के लोगों में नारी शक्ति के प्रति विश्वास का भाव बना हुआ है। बेटियों को बेटों के बराबर समझने की भीावना बढ़ी है। आगामी कुछ सालों में स्थिति और सुधरेगी।
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हाल ही में नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे 2020-21 की रिपोर्ट जारी हुई है। रिपोर्ट ने साबित कर दिया है कि सरकार के प्रयासों ने प्रदेश में लिंगानुपात का ग्राफ सुधारा है। लेकिन जिले में लिंगानुपात वर्ष 2015-16 की बजाय कुछ कमजोर हुई हुई है। एनएफएचएस-4 2015-16 की रिपोर्ट में जिले में प्रति हजार बेटों पर लड़कियों की आबादी 6.4 फीसदी अधिक थीं, जो कि एनएफएचएच-5 की रिपोर्ट में यह संख्या घटकर 0.9 हो गई है। प्रति वर्ष एक फीसद की दर से गिरावट दर्ज की गई है। आंकड़ों पर गौर करें तो जिले में बेटियों के लिंग अनुपात में बीते पांच वर्षों में 5.5 फीसदी कमी आई है। अब यहां 1000 पुरुषों के सापेक्ष 1064 की जगह 1009 बेटियां जन्म ले रही हैं। पिछले पांच सालों में ग्राफ में 55 बेटियां प्रति हजार की कमी आई है।
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जिले में बढ़ा संस्थागत प्रसव
एनएफएचएस-5 की रिपोर्ट में जिले में संस्थागत प्रसव बढ़ा है। पहले 73.6 प्रतिशत की जगह 90.0 फीसदी हो गया है। सरकारी संस्थानों में भी संस्थागत प्रसव 49.1 फीसदी की जगह 73.9 प्रतिशत हो गया है। इतना ही नहीं पूर्व घर पर होने वाले प्रसव की दर मं भी इस बार जिले में सुधार नजर आ रहा है। सर्वेक्षण की रिपोर्ट में पूर्व में 6.7 की जगह इस बार इसे 4.5 बताया गया है। हालांकि, सरकारी संस्थानों में संस्थागत प्रसव में कमी आई है और सर्वेघक्षण के मुताबिक अब भी निजी नर्सिंग होम लोगों की पहली पसंद बने है।
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डीपीएम, एनएचएम, डॉ.आरबी यादव ने बताया कि लिंगानुपात में कमी चिंताजनक अवश्य है, लेकिन अभी भी जिले में पुरुषों की बजाए महिलाओं की संख्या ज्यादा है। जिले के लोगों में नारी शक्ति के प्रति विश्वास का भाव बना हुआ है। बेटियों को बेटों के बराबर समझने की भीावना बढ़ी है। आगामी कुछ सालों में स्थिति और सुधरेगी।