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बेनूर हो गई गुलाबों की नगरी
ब्यूरो/अमर उजाला,बलिया
Updated Tue, 15 Mar 2016 10:29 PM IST
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अभी ज्यादा पुरानी बात नहीं है करीब 25-30 वर्ष पहले देने के कोने-कोने में सिकंदरपुर में बने गुलाब जल, गुलाब सकरी, इत्र आदि की खूब पूछ थी। गुलाबों की नगरी के नाम से मशहूर सिकंदरपुर में फूलों की खेती के उद्योग में सैकड़ों परिवार लगे थे।
पुराने लोगों की बातों को माने तो गुलाब, चमेली तथा बेला की समृद्ध खेती वाले इस इलाके में नालियों से भी फूलों की खुशबू आती थी। लेकिन समय की मार और शासन की उदासीनता ने महज कुछ ही समय में फू लों के इस शहर को बर्बाद कर दिया। अब तो हालात इतने बुरे हो चुके हैं कि किसान फूलों की खेती से न सिर्फ मुंह मोड़ते जा रहे हैं बल्कि फूलों की खेती दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है।
सिकंदरपुर का गुलाब जल, केवड़ा, गुलाब सकरी और इत्र भारत में ही नहीं, बल्कि बांग्लादेश, पाकिस्तान, सऊदी अरब समेत अन्य देशों में अपनी खुशबू बिखेरता था। लेकिन आज यह शासन व राजनेताओं की उदासीनता के कारण धीरे-धीरे दम तोड़ता नजर आ रहा है।
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हालात से निराश हो चुके किसान भी मानते है कि फूलों की खेती करने से अच्छा अब मजदूरी करना है। मौजूदा हालात में फूलों की खेती से मेहनत करने के बाद भी मजदूरी तक नहीं निकल पा रही है।
हालांकि सरकारी स्तर पर फूलों की खेती करने वाले किसानों को अनुदान तथा खेती में उपयोग आने वाले यंत्र के लिए पैसा शासन स्तर से मिलता है, लेकिन यह किसानों तक न पहुंचकर बिचोलियों के हाथ लग जाता है। इसके लिए किसानों ने कई बार आवाज भी उठाई। लेकिन अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगा। जिसका नतीजा आज यह है की अब लोग फूलों की खेती करने के बजाए अन्य धंधे को बेहतर मान रहे हैं।
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पुराने लोगों की बातों को माने तो गुलाब, चमेली तथा बेला की समृद्ध खेती वाले इस इलाके में नालियों से भी फूलों की खुशबू आती थी। लेकिन समय की मार और शासन की उदासीनता ने महज कुछ ही समय में फू लों के इस शहर को बर्बाद कर दिया। अब तो हालात इतने बुरे हो चुके हैं कि किसान फूलों की खेती से न सिर्फ मुंह मोड़ते जा रहे हैं बल्कि फूलों की खेती दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है।
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सिकंदरपुर का गुलाब जल, केवड़ा, गुलाब सकरी और इत्र भारत में ही नहीं, बल्कि बांग्लादेश, पाकिस्तान, सऊदी अरब समेत अन्य देशों में अपनी खुशबू बिखेरता था। लेकिन आज यह शासन व राजनेताओं की उदासीनता के कारण धीरे-धीरे दम तोड़ता नजर आ रहा है।
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हालात से निराश हो चुके किसान भी मानते है कि फूलों की खेती करने से अच्छा अब मजदूरी करना है। मौजूदा हालात में फूलों की खेती से मेहनत करने के बाद भी मजदूरी तक नहीं निकल पा रही है।
हालांकि सरकारी स्तर पर फूलों की खेती करने वाले किसानों को अनुदान तथा खेती में उपयोग आने वाले यंत्र के लिए पैसा शासन स्तर से मिलता है, लेकिन यह किसानों तक न पहुंचकर बिचोलियों के हाथ लग जाता है। इसके लिए किसानों ने कई बार आवाज भी उठाई। लेकिन अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगा। जिसका नतीजा आज यह है की अब लोग फूलों की खेती करने के बजाए अन्य धंधे को बेहतर मान रहे हैं।