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घुट रही पृथ्वी की सांसें...जिम्मेदार हैं हम

Fri, 22 Apr 2016 10:19 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला,बलिया
ब्यूरो/अमर उजाला,बलिया Updated Fri, 22 Apr 2016 10:19 PM IST
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Pritthwi Diwas
इक्वाडोर में फिर आया भूकंप
जनपद में सिंचित भूमि घटती जा रही है। दिनोंदिन खेती के लिए जमीन घटती जा रही है। बीते पांच वर्षों के आंकड़ों पर गौर फरमाया जाए तो सड़क, मकान आदि बनाने के कारण खेती की जमीन 10 से 12 प्रतिशत तक घटी है।
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हालांकि जिला कृषि अधिकारी की मानें तो फिलहाल जनपद में खेती की जमीन पर शहरीकरण का कुछ खास असर नहीं पड़ा है। लेकिन आने वाले दिनों में इसका असर देखने को जरूर मिलेगा। एक दशक पहले जब जनपद में खेती के लिए अकूत जमीन थी। इसके बाद विभिन्न प्राकृतिक आपदा के कारण खेती आदि से लोगों का मोहभंग होता गया।
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लोगों को खेती छोड़ नौकरी रास आने लगी। फलस्वरूप 20 फीसदी लोग अपने खेती की जमीन को बेचने लगे हैं। खेती को बचाने के ऊसर विभाग द्वारा असिंिचत तथा ऊसर भूमि को उपजाऊ बनाकर खेती को जहां बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ आबादी बढ़ने से सिंचित तथा खेती की जमीन दिनों-दिन कम होती गई है।
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वर्तमान में बहुत सारी उपजाऊ भूमि में खेती के बजाय आवास बने हुए हैं। कहीं औद्योगिक नगरी बसी है, तो कहीं बिजली का पावर हाउस बैठ रहा है। आलम यह है कि खेती वाली जमीन भी दिनो-दिन आवासीय रूप धारण करती जा रही है।


पहले जहां हजारों बीघे जमीन परती रह जाती थी, वहीं अब करीब 12 से 15 फीसदी भूमि आवासीय इलाके के रूप में तब्दील हो चुकी है। इतना ही नहीं कई दूधारू पशुओं की नस्लें भी विलुप्त होती जा रही है। जनपद  के गंगातीरी गाय में 40 फीसदी की कमी आई है। जिससे दूध उत्पादन भी पहले की अपेक्षा काफी कम हो गया है।

 
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