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करोड़ों खर्च पर नहीं आया नहर में पानी
Updated Mon, 30 May 2016 10:16 PM IST
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सूखी पड़ी पंप कैनाल की नहर।
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विकास खण्ड मैरीटार स्थित चौधरी चरण सिंह पम्पकैनाल करीब तीन साल से बंद पड़ा है। इस कैनाल से निकली करीब 52 किलोमीटर लम्बी नहर में धूल उड़ रही है। इस नहर के आसपास के करीब 25 गांवों के 700 किसानों की किसानी इसी नहर पर निर्भर करती है।
इस क्षेत्र में सरकारी नलकूप भी हैं लेकिन उनसे सभी किसानों के खेतों में पानी नहीं पहुंच पाता है जिससे खेती प्रभावित हो रही है। प्रथम पंचवर्षीय योजना के तहत मैरीटार स्थित चौधरी चरण सिंह पंपकैनाल की नींव वर्ष 1952 में रखी गई थी।
इसके पीछे तत्कालीन विधायक स्व. ठाकुर बैजनाथ सिंह की मंशा थी कि इससे जुड़ी 52 किलोमीटर लम्बी नहर में पानी सुलभ हो सके। पम्प कैनाल से मैरीटार, आदर, पिंडहरा, दरांव, बकवा, जितौरा, केवरा, बेेउर, सुरहियां, सेरियां, सुबहल, धरवार, राजागांव, हुसैनाबाद कीर्तूपुर देवढ़ी, डुहियां आदि गांवों के करीब 700 किसानों की एक हजार एकड़ से अधिक खेतों की सिंचाई होती थी।
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शुरूआती दौर में पम्पकैनाल के माध्यम से नहर में बराबर पानी रहता था। लेकिन धीरे-धीरे पम्पकैनाल की स्थिति खराब होती गई। तकनीकी गड़बड़ी के चलते पम्पकैनाल बंद होने लगा। पम्पकैनाल की तकनीकी गड़बड़ी दूर करने के लिए वर्ष 1998 में सिचाई विभाग द्वारा करीब 2 करोड़ 65 लाख रुपये खर्च किए गये। उसके बाद कुछ सालों तक पम्पकैनाल ठीक चला। लेकिन कुछ ही सालों बाद एक बार फिर से पम्पकैनाल में तकनीकी गड़बडिय़ां आनी शुरू हो गई।
नहरों में पानी की कमी होने लगी। अब हालात यह है कि करीब तीन साल से पम्पकैनाल बिल्कुल बंद हो गया है। नहर मे पानी की जगह धूल उड़ रहे हैं। नहर से कभी हरा भरा रहने वाले इलाके की सिंचाई ठप हो गई। क्षेत्र के किसानों ने पम्पकैनाल की तकनीकी गड़बड़ी ठीक कराने के लिए प्रशासन से कई बार गुहार लगाई गई लेकिन प्रशासन द्वारा हर बार उनकी आवाज को अनसुनी की गई।
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इस क्षेत्र में सरकारी नलकूप भी हैं लेकिन उनसे सभी किसानों के खेतों में पानी नहीं पहुंच पाता है जिससे खेती प्रभावित हो रही है। प्रथम पंचवर्षीय योजना के तहत मैरीटार स्थित चौधरी चरण सिंह पंपकैनाल की नींव वर्ष 1952 में रखी गई थी।
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इसके पीछे तत्कालीन विधायक स्व. ठाकुर बैजनाथ सिंह की मंशा थी कि इससे जुड़ी 52 किलोमीटर लम्बी नहर में पानी सुलभ हो सके। पम्प कैनाल से मैरीटार, आदर, पिंडहरा, दरांव, बकवा, जितौरा, केवरा, बेेउर, सुरहियां, सेरियां, सुबहल, धरवार, राजागांव, हुसैनाबाद कीर्तूपुर देवढ़ी, डुहियां आदि गांवों के करीब 700 किसानों की एक हजार एकड़ से अधिक खेतों की सिंचाई होती थी।
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शुरूआती दौर में पम्पकैनाल के माध्यम से नहर में बराबर पानी रहता था। लेकिन धीरे-धीरे पम्पकैनाल की स्थिति खराब होती गई। तकनीकी गड़बड़ी के चलते पम्पकैनाल बंद होने लगा। पम्पकैनाल की तकनीकी गड़बड़ी दूर करने के लिए वर्ष 1998 में सिचाई विभाग द्वारा करीब 2 करोड़ 65 लाख रुपये खर्च किए गये। उसके बाद कुछ सालों तक पम्पकैनाल ठीक चला। लेकिन कुछ ही सालों बाद एक बार फिर से पम्पकैनाल में तकनीकी गड़बडिय़ां आनी शुरू हो गई।
नहरों में पानी की कमी होने लगी। अब हालात यह है कि करीब तीन साल से पम्पकैनाल बिल्कुल बंद हो गया है। नहर मे पानी की जगह धूल उड़ रहे हैं। नहर से कभी हरा भरा रहने वाले इलाके की सिंचाई ठप हो गई। क्षेत्र के किसानों ने पम्पकैनाल की तकनीकी गड़बड़ी ठीक कराने के लिए प्रशासन से कई बार गुहार लगाई गई लेकिन प्रशासन द्वारा हर बार उनकी आवाज को अनसुनी की गई।