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मालिकों ने खड़े किए हाथ तो आसपास के लोगों से रुपये लेकर निकले घरों के लिए

Sat, 23 May 2020 08:54 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sat, 23 May 2020 08:54 PM IST
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Missed work, if not paid, then return to homes
बैरिया। लॉकडाउन की अवधि बढ़ने के बाद काम छूट गया। मालिक ने पगार देने में भी असमर्थता जताई। भोजन के लिए मोहताज होना पड़ गया। ऐसे में मजदूर होकर गांव लौटना पड़ा। ये कहना है दिल्ली और आजमगढ़ से बिहार स्थित अपने गांव जा रही दो महिलाओं का। एनएच 31 पर महिलाओं ने अपनी व्यथा सुनाई।
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दिल्ली के अलावा अन्य महानगरों और जनपदों में सिर्फ पुरुष ही नहीं बल्कि बड़ी संख्या में महिलाएं भी कोई न कोई काम करके अपने परिवार का गुजारा कर रही थी लेकिन लाकडाउन में काम छूटने पर उन्हें लौटना पड़ा। दिल्ली एनसीआर में एक छोटी से खोली में रहकर अमीरों के घर के बच्चों को स्कूल पहुंचाने व स्कूल से घर लाने का काम करने वाली बिहार के सिवान निवासिनी आशा देवी पत्नी जितेंद्र साहनी ने बताया कि लॉकडाउन के एक पखवाड़े तक हमें कोई दिक्कत नहीं हुई लेकिन लॉकडाउन बढ़ा तो सेठों ने कह दिया कि अभी पता नहीं कितने दिन स्कूल बंद रहेंगे तब तक तुम घर चली जाओ। जब स्कूल खुलेगा तब आ जाना। जब मैंने घर जाने के लिए कुछ पैसे मांगे तो कहा कि अभी हाथ खाली है और दरवाजा बंद कर लिया। आसपास के कई लोगों से पैसे मांगी। किसी ने 50 रुपये तो किसी ने 10 रुपये दिए और किसी तरह 475 रुपये एकत्रित होने पर वह पैदल ही घर के लिए निकल गई। रास्ते में कहीं-कहीं सब्जी फल की गाड़ी वालों से आगे तक छोड़ने में मदद की।
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बिहार के एकमा निवासी विमलावती देवी ने बताया कि आजमगढ़ में झाड़ू पोछा लगाने का काम करती थी। लॉकडाउन में कोरोना के डर से पैसे वालों ने झाड़ू पोछा के लिए मना कर दिया। दो माह तक किसी तरह आसरे में पड़ी रही कि शायद अब लॉकडाउन खत्म होगा और लोग फिर से झाड़ू पोछा के लिए बुलाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो घर के लिए पैदल निकल गई।
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एनएच 31 से होकर गुजरने वाले अधिकतर लोग दिल्ली, मुंबई, पुणे, कानपुर, लखनऊ, जोधपुर, उदयपुर, इंदौर, जबलपुर, सूरत, अंकलेश्वर, बंगलुरू रहते थे जो अब अपने-अपने गांवों को लौट रहे हैं। इनमें विद्यार्थी, कारीगर, चालक, मैकेनिक, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, राजगीर, रिक्शा चालक, धोबी, मोची, माली, घरों, मंदिरों, कार्यालयों और कल-कारखानों में काम करने वाले कामगार शामिल हैं।
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