UP Politics: पहली बार भगवा रंग में रंगा समाजवादी कुनबा, जानें- 1977 से अब तक बलिया लोकसभा सीट का हाल
UP Politics: लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। बलिया संसदीय सीट पर अंतिम चरण में एक जून को मतदान होना है। सीट पर भाजपा ने वर्तमान सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त का टिकट काटकर राज्यसभा सांसद नीरज शेखर पर दांव लगाया है।
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बलिया में पहली बार होगा जब समाजवादी विचारधारा वाले पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर कापूरा कुनबा आम चुनाव में भगवा रंग में रंगा नजर आएगा। हालांकि, नीरज शेखर वर्तमान में भाजपा से ही राज्यसभा सदस्य हैं, लेकिन वे पहली बार भाजपा के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। उनका मुकाबला सपा के सनातन पांडेय और बसपा के लल्लन यादव से है।
बलिया लोकसभा सीट पर 1977 के लोकसभा चुनाव से चंद्रशेखर के परिवार का कब्जा रहा है। इमरजेंसी की घोषणा के बाद चंद्रशेखर कांग्रेस से अलग होकर 1977 में जनता पार्टी से पहली बार चुनाव मैदान में उतरे थे और कांग्रेस के सांसद चंद्रिका प्रसाद को हराया था।
इसके बाद 1984 की इंदिरा लहर को छोड़ दें तो उन्होंने कभी भी बलिया लोकसभा सीट पर समाजवाद के रंग को फीका नहीं पड़ने दिया। 1991 से भारतीय जनता पार्टी भी उनके खिलाफ लगातार प्रत्याशी उतारते आई है। सिर्फ 1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उनके खिलाफ अपना प्रत्याशी नहीं दिया था।
उस चुनाव से पहले भाजपा ने घोषणा की थी भाजपा किसी उत्कृष्ठ सांसद के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारेगी। उस चुनाव में चंद्रशेखर समता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े थे। उस चुनाव में चंद्रशेखर ने कांग्रेस के जगन्नाथ चौधरी को 1,86,605 मतों से हराया था, जो उनकी सबसे बड़ी जीत भी थी।
पंकज के भाजपा में शामिल होने की थी चर्चाएं : पूर्व पीएम चंंद्रशेखर के निधन के बाद 2007 में हुए उपचुनाव से पहले चंद्रशेखर के बड़े पुत्र पंकज शेखर के भाजपा में शामिल होने और बलिया से चुनाव लड़ने की जोरदार चर्चाएं हुई थी, लेकिन उनके छोटे पुत्र नीरज शेखर सपा में शामिल हो गए और सपा के टिकट पर उपचुनाव लड़ा।
इस चुनाव में उन्होंने बसपा के विनय शंकर तिवारी को बड़े अंतर से हराया था। इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने सपा के टिकट पर बसपा के संग्राम सिंह यादव को हराया था।
2014 के चुनाव में नीरज शेखर भाजपा के भरत सिंह से पराजित हुए। 2019 के चुनाव में उन्होंने सपा छोड़ भाजपा का साथ पकड़ लिया, लेकिन भाजपा ने उन्हें चुनाव लड़ाने के बजाय राज्यसभा भेज दिया। चंद्रशेखर के पौत्र रविशंकर सिंह पप्पू वर्तमान में भाजपा से एमएलसी हैं।
वे दो बार सलेमपुर लोकसभा सीट से बसपा और जदयू के बैनर तले चुनाव भी लड़ चुके हैं। चंद्रशेखर के भतीजे प्रवीण सिंह बब्बू ने भी विधानसभा चुनाव में सजपा के बैनर तले बांसडीह विधानसभा से किस्मत आजमाई, लेकिन सफलता नहीं मिली।
भाजपा ने रोकी थी परिवार के जीत की राह
1977 से लेकर 2004 तक (1984 छोड़कर) चंद्रशेखर ने लगातार इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद 2007 के उपचुनाव और 2009 के आम चुनाव में नीरज शेखर सांसद बने। 2014 में पहली बार भाजपा के भरत सिंह ने नीरज शेखर को हराकर इस परिवार के बर्चस्व को तोड़ा था। 2019 में परिवार से कोई लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा। अब 2024 में नीरज भाजपा से ही मैदान में हैं।
एंटी इनकंबेंसी से मिलेगी राहत?
जाति के हिसाब से देखें तो टिकट काटने के बावजूद बीजेपी ने बलिया में राजपूत वोटों के समीकरण का ख्याल रखा है। वीरेंद्र सिंह मस्त और नीरज शेखर, दोनों ही राजपूत बिरादरी से आते हैं। बलिया लोकसभा सीट पर राजपूतों के साथ भूमिहार और ब्राह्मण वोट प्रमुखता में हैं।
पिछले कुछ दिनों से बीजेपी को पश्चिमी यूपी में राजपूतों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में कम से कम बलिया सीट पर बीजेपी ने राजपूत समीकरण को ध्यान में रखकर फैसला लेने का काम किया है।