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वॉल की जगह फेसबुक वॉल, नारे जमाने ने बिसारे
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बलिया। विधानसभा चुनाव में जनपद में छठे चरण में तीन मार्च को चुनाव है। अब चुनावी माहौल वह नहीं है जो दो-तीन दशक पहले तक हुआ करता था। न दीवारों पर नारे दिखाई देते हैं, न खंभों और घरों पर झंडे। दुकानों से पोस्टर और सीने पर सजने वाले बिल्ले भी गायब हो गए हैं। बदलते युग में चुनाव प्रचार का तरीका भी बदल गया है। इस बार तो कोविड-19 के कारण चुनाव सोशल मीडिया, ट्विटर, व्हाटसअप और फेसबुक तक ही सिमटता नजर आ रहा है।
चुनाव के संबंध में बुजुर्गों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि गली-मोहल्ले में पर्चे, झंडे और बैनर व दीवारों पर चुनावी नारे लिखना अब बीते जमाने की बात हो गई है। चुनावी जंग गली-मोहल्लों से दूर सोशल मीडिया मसलन ट्विटर, इंस्ट्राग्राम, व्हाट्सअप और फेसबुक वाल पर दिखाई पड़ रही है। सबकुछ मोबाइल पर हो रहा है। जिनके पास मोबाइल है वही इस बारे में बताते रहते हैं। विजयीपुर के अजय सिंह ने बताया कि एक दौर था जब मोहल्लों में चुनाव प्रचार की गाड़ी आती थी। पीछे-पीछे गली के बच्चे बिल्ले लेने के लिए दौड़ते थे। कई दिनों तक सीने पर लगाकर घूमते थे। शारदानंद श्रीवास्तव ने बताया कि चुनाव आयोग ने दीवारों पर वाल राइटिंग को बंद कराया। घर के ऊपर किसी प्रकार का झंडा भी मना हो गया। पहले गांवों में झंडे को देख पता चल जाता था कि किसका जोर है। प्रत्याशियों में स्पर्धा रहती थी कि किसका बैनर-पोस्टर कितना बड़ा और ज्यादा है।
खत्म हुआ बैनर-पोस्टर का बाजार
बलिया। सौभाग्य कंप्यूटर के सुशील यादव ने कहा कि पहले विधानसभा चुनाव में बैनर, पोस्टर को लेकर होड़ लग जाती थी। मांग पूरी करना मुश्किल होती थी। इस विधानसभा चुनाव में व्यापार शून्य प्रतिशत है। अंकित कंप्यूटर के प्रमोद सिंह ने बताया की पिछले विधानसभा में अलग-अलग क्षेत्रों से पोस्टर, हैंडबिल छापे गए थे। इस विधानसभा चुनाव में कोई हिसाब ही नहीं है। हर्षित कंप्यूटर के सुनील कुमार यादव ने कहा कि इस विधानसभा चुनाव में डिजिटल रूप से प्रचार प्रसार हो रहे हैं। पहले के विधानसभा चुनाव में लगभग पांच हजार से दस हजार तक के बैनर, पोस्टर छापे जाते थे। अबकी कारोबार ही नहीं है।
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चुनाव के संबंध में बुजुर्गों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि गली-मोहल्ले में पर्चे, झंडे और बैनर व दीवारों पर चुनावी नारे लिखना अब बीते जमाने की बात हो गई है। चुनावी जंग गली-मोहल्लों से दूर सोशल मीडिया मसलन ट्विटर, इंस्ट्राग्राम, व्हाट्सअप और फेसबुक वाल पर दिखाई पड़ रही है। सबकुछ मोबाइल पर हो रहा है। जिनके पास मोबाइल है वही इस बारे में बताते रहते हैं। विजयीपुर के अजय सिंह ने बताया कि एक दौर था जब मोहल्लों में चुनाव प्रचार की गाड़ी आती थी। पीछे-पीछे गली के बच्चे बिल्ले लेने के लिए दौड़ते थे। कई दिनों तक सीने पर लगाकर घूमते थे। शारदानंद श्रीवास्तव ने बताया कि चुनाव आयोग ने दीवारों पर वाल राइटिंग को बंद कराया। घर के ऊपर किसी प्रकार का झंडा भी मना हो गया। पहले गांवों में झंडे को देख पता चल जाता था कि किसका जोर है। प्रत्याशियों में स्पर्धा रहती थी कि किसका बैनर-पोस्टर कितना बड़ा और ज्यादा है।
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खत्म हुआ बैनर-पोस्टर का बाजार
बलिया। सौभाग्य कंप्यूटर के सुशील यादव ने कहा कि पहले विधानसभा चुनाव में बैनर, पोस्टर को लेकर होड़ लग जाती थी। मांग पूरी करना मुश्किल होती थी। इस विधानसभा चुनाव में व्यापार शून्य प्रतिशत है। अंकित कंप्यूटर के प्रमोद सिंह ने बताया की पिछले विधानसभा में अलग-अलग क्षेत्रों से पोस्टर, हैंडबिल छापे गए थे। इस विधानसभा चुनाव में कोई हिसाब ही नहीं है। हर्षित कंप्यूटर के सुनील कुमार यादव ने कहा कि इस विधानसभा चुनाव में डिजिटल रूप से प्रचार प्रसार हो रहे हैं। पहले के विधानसभा चुनाव में लगभग पांच हजार से दस हजार तक के बैनर, पोस्टर छापे जाते थे। अबकी कारोबार ही नहीं है।
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