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बांधों की सुरक्षा को लेकर विभाग रहता है उदासीन
Updated Thu, 15 Jun 2017 10:23 PM IST
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बलिया। बंधे को लेकर संबंधित विभाग जरा भी गंभीर नहीं हैं। जब बाढ़ व कटान शुरू होता है तो विभाग जागता है और उसे बचाने की कवायद करता है। कभी विभाग शासन को समय से प्रस्ताव नहीं भेजता है तो कई बंधों पर समय से मरम्मत कार्य भी नहीं कराया जाता है।
जिले में गंगा व घाघरा के कहर का सामना लोगों को हर साल सहना पड़ता है। लेकिन इसके बाद भी बंधों को लेकर विभाग की ओर से सुस्ती की जाती है। गंगा की कहर से बचाने के लिए दशकों पहले बीटी (बैरिया-थम्हनपुरा) बंधा का निर्माण कराया गया। हालंाकि वर्तमान में इस बंधे की ऊंचाई बढ़ाते हुए सड़क का निर्माण करा दिया गया है, लिहाजा यह बंधा कुछ हद तक सुरक्षित हो गया है। इसके अलावा गंगा से बचाव के लिए दुबेछपरा रिंग बंधा भी दशकों पहले बना था जो पिछले साल कमजोर होने के कारण गंगा के वेग को नहीं रोक सका और इसके टूटने से बड़े पैमाने पर तबाही हुई। घाघरा से जनपद के गांवों को बचाने के लिए करीब 75 किलोमीटर लंबा टीएस (तुर्तीपार-श्रीनगर) बंधे का निर्माण करीब 50 साल पहले हुआ। हालांकि समय-समय पर इस बंधे का मरम्मत तो कराई जात है लेकिन वह पर्याप्त नहीं। बाढ़ के दिनों में कई स्थानों पर इसके टूटने की आशंका बनी रहती है। बंधे के दिनों-दिन कमजोर होने के कारण तटवर्ती इलाके के लोगों में दहशत है। बताया जाता है कि टीएस बंधा पर 69.300 किमी से 70 किमी तक डेंजर जोन माना गया है। इसे गंगा ने अब तक दो बार तहस-नहस किया है। इन सबके बावजूद विभाग बाढ़ के दिनों में तो सक्रिय दिखता है लेकिन इसके बाद इसकी सुध नहीं लेता। इसके अलावा जिले में छोटे-छोटे दर्जनों बंधे हैं जिसकी मरम्मत को लेकर विभाग चुप्पी साधे रहता है।
द्वाबा के अधिकांश गांव हैं डूब क्षेत्र में
जिले के द्वाबा इलाके के अधिकांश गांव को डूब क्षेत्र में माना गया है। आलम यह है कि पिछले एक दशक में एक दर्जन से अधिक गांव तो गंगा व घाघरा में विलीन भी हो चुके हैं। खासकर गंगा किनारे के गंगापुर, केहरपुर, दुबेछपरा तथा घाघरा किनारे के जयप्रकाश नगर गांव डूब क्षेत्र में संवेदनशील माना गया है।
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125 लाख के प्रस्ताव को नहीं मिली हरी झंडी
बलिया। बाढ़ विभाग की ओर से हर साल प्रस्ताव शासन को भेजने का दावा किया जाता है और पर्याप्त धनराशि नहीं मिलने की बात कही जाती है। लेकिन सच्चाई यह है कि विभाग की भी रुचि बाढ़ व कटान शुरु होने पर ही काम कराने में होती है। विभाग की ओर से कभी भी समय से प्रोजेक्ट शासन को नहीं भेजा जाता है। गंगा व घाघरा की कटान से बचाने के लिए बाढ़ विभाग ने पिछले साल करीब 125 लाख की परियोजना बनाकर स्वीकृति के लिए शासन को भेजा था। इसमें मात्र दूबेछपरा में ही कार्य कराने के लिए शासन स्तर से 29 करोड़ की धनराशि मिली। बताया जाता है कि शासन ने अलग-अलग प्रस्ताव होने पर नाराजगी जाहिर की और प्रस्ताव को लौटाते हुए एकसाथ भेजने का निर्देश दिया।
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जिले में गंगा व घाघरा के कहर का सामना लोगों को हर साल सहना पड़ता है। लेकिन इसके बाद भी बंधों को लेकर विभाग की ओर से सुस्ती की जाती है। गंगा की कहर से बचाने के लिए दशकों पहले बीटी (बैरिया-थम्हनपुरा) बंधा का निर्माण कराया गया। हालंाकि वर्तमान में इस बंधे की ऊंचाई बढ़ाते हुए सड़क का निर्माण करा दिया गया है, लिहाजा यह बंधा कुछ हद तक सुरक्षित हो गया है। इसके अलावा गंगा से बचाव के लिए दुबेछपरा रिंग बंधा भी दशकों पहले बना था जो पिछले साल कमजोर होने के कारण गंगा के वेग को नहीं रोक सका और इसके टूटने से बड़े पैमाने पर तबाही हुई। घाघरा से जनपद के गांवों को बचाने के लिए करीब 75 किलोमीटर लंबा टीएस (तुर्तीपार-श्रीनगर) बंधे का निर्माण करीब 50 साल पहले हुआ। हालांकि समय-समय पर इस बंधे का मरम्मत तो कराई जात है लेकिन वह पर्याप्त नहीं। बाढ़ के दिनों में कई स्थानों पर इसके टूटने की आशंका बनी रहती है। बंधे के दिनों-दिन कमजोर होने के कारण तटवर्ती इलाके के लोगों में दहशत है। बताया जाता है कि टीएस बंधा पर 69.300 किमी से 70 किमी तक डेंजर जोन माना गया है। इसे गंगा ने अब तक दो बार तहस-नहस किया है। इन सबके बावजूद विभाग बाढ़ के दिनों में तो सक्रिय दिखता है लेकिन इसके बाद इसकी सुध नहीं लेता। इसके अलावा जिले में छोटे-छोटे दर्जनों बंधे हैं जिसकी मरम्मत को लेकर विभाग चुप्पी साधे रहता है।
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द्वाबा के अधिकांश गांव हैं डूब क्षेत्र में
जिले के द्वाबा इलाके के अधिकांश गांव को डूब क्षेत्र में माना गया है। आलम यह है कि पिछले एक दशक में एक दर्जन से अधिक गांव तो गंगा व घाघरा में विलीन भी हो चुके हैं। खासकर गंगा किनारे के गंगापुर, केहरपुर, दुबेछपरा तथा घाघरा किनारे के जयप्रकाश नगर गांव डूब क्षेत्र में संवेदनशील माना गया है।
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125 लाख के प्रस्ताव को नहीं मिली हरी झंडी
बलिया। बाढ़ विभाग की ओर से हर साल प्रस्ताव शासन को भेजने का दावा किया जाता है और पर्याप्त धनराशि नहीं मिलने की बात कही जाती है। लेकिन सच्चाई यह है कि विभाग की भी रुचि बाढ़ व कटान शुरु होने पर ही काम कराने में होती है। विभाग की ओर से कभी भी समय से प्रोजेक्ट शासन को नहीं भेजा जाता है। गंगा व घाघरा की कटान से बचाने के लिए बाढ़ विभाग ने पिछले साल करीब 125 लाख की परियोजना बनाकर स्वीकृति के लिए शासन को भेजा था। इसमें मात्र दूबेछपरा में ही कार्य कराने के लिए शासन स्तर से 29 करोड़ की धनराशि मिली। बताया जाता है कि शासन ने अलग-अलग प्रस्ताव होने पर नाराजगी जाहिर की और प्रस्ताव को लौटाते हुए एकसाथ भेजने का निर्देश दिया।