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Bahraich News: बाघ-तेंदुओं के हमलों ने छीनी रोजी-रोटी

Tue, 14 Apr 2026 11:55 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Tue, 14 Apr 2026 11:55 PM IST
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Tiger and leopard attacks have taken away livelihoods.
बाघ के हमले में घायल सेमरी घटही की शांती देवी का परिवार।
मिहींपुरवा। कतर्नियाघाट के जंगलों से उठता खौफ अब गांवों के चूल्हों तक पहुंच चुका है। बाघ और तेंदुओं के बढ़ते हमलों से न केवल लोगों की जान पर खतरा मंडरा रहा है, बल्कि गरीब परिवारों की रोज़ी-रोटी भी संकट में पड़ गई है। मुर्तिहा वन रेंज के ग्राम सेमरी घटही के मजरा सुरजीपुरवा की शांति देवी (48) का परिवार इस भयावह स्थिति का जीता-जागता उदाहरण है।
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शुक्रवार को शांति देवी लकड़ी लेने जंगल गई थीं, तभी बाघ ने उन पर हमला कर दिया। हमले में उनके सिर पर गंभीर चोटें आईं और एक हाथ भी गंवाना पड़ा। उन्हें गंभीर हालत में मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया है, जहां उनका इलाज चल रहा है। इस घटना से परिवार पूरी तरह टूट गया है।
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पति शिवहरि, जो दो माह पहले पुणे मजदूरी करने गए थे, घटना की सूचना मिलते ही लौट आए और अब अस्पताल में पत्नी की देखभाल कर रहे हैं। उधर, उनकी तीन बेटियां रेनू (17), वंदनी (13) और रोशनी (10) गांव में पड़ोसियों के सहारे रह रही हैं। परिवार के सामने अब दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
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इलाज का खर्च और आजीविका का संकट परिवार पर भारी पड़ रहा है। वन विभाग की ओर से मिली 5,000 रुपये की सहायता इस बड़ी समस्या के सामने नाकाफी साबित हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि ऐसे मामलों में पर्याप्त आर्थिक मदद और सुरक्षा के ठोस इंतजाम जरूरी हैं।

ग्रामीण सत्येंद्र के अनुसार, गांव में आए एक अजनबी ने पौधरोपण के नाम पर जंगल में झाड़ियों की सफाई के लिए लोगों को जाने के लिए प्रेरित किया था। मजबूरी में शांति देवी जंगल गईं और हादसे का शिकार हो गईं।
कतर्नियाघाट से सटे गांवों में इस तरह की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। ग्रामीणों में भय का माहौल है और लोग खेतों व जंगल में जाने से डर रहे हैं। इससे मजदूरी और आजीविका के साधन भी प्रभावित हो रहे हैं।

ग्रामीणों ने मांग की है कि वन विभाग और प्रशासन इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान दे और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम के साथ प्रभावित परिवारों को पर्याप्त सहायता उपलब्ध कराए। अब हालात ऐसे हो गए हैं कि बाघ-तेंदुओं का खौफ जंगल से निकलकर गांवों की रसोई तक पहुंच गया है, जहां लोग हर दिन डर और भूख के बीच जंग लड़ने को मजबूर हैं। (संवाद)


जंगल में जाना खतरे से खाली नहीं
रिटायर्ड डीएफओ आनंद कुमार का कहना है कि जंगल में जाना खतरे से खाली नहीं है, लेकिन जंगल के किनारे बसे ग्रामीणों का चूल्हा भी जंगल की जलौनी लकड़ी के सहारे ही जलता है। यह कटु सत्य है, इस मामले में सरकार और प्रशासन को ठोस कदम उठाने की जरूरत है। जिससे कि ग्रामीणों के चूल्हे की लौ भी मंद न हो और सभी सुरक्षित भी रहें।
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