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फिगर मेनटेन करने में माताओं का स्तनपान कराने से तौबा
अमर उजाला ब्यूरो/बहराइच
Updated Mon, 20 Jul 2015 10:42 PM IST
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बहराइच। नवजात शिशुओं के लिए मां का दूध अमृत से कम नहीं है लेकिन छह माह में 3588 नवजातों को तिरस्कार झेलना पड़ा है।
यह बात स्वास्थ्य महकमे की स्टिल बर्थ रिपोर्ट से सामने आई है। इसके पीछे महिलाओं की रूढ़िवादी सोच व फिगर बिगड़ने की मानसिकता का हावी होना माना जा रहा है।
तमाम कोशिशों के बावजूद महिलाओं में स्तनपान के प्रति रुझान नहीं बढ़ रहा है। यही कारण है शिशु मृत्युदर पर प्रभावी सफलता हाथ नहीं लग रही है।
शिशु मृत्युदर पर रोकथाम के लिए स्वास्थ्य महकमे की तरफ से प्रतिवर्ष अगस्त के पहले पखवारे में विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाता है। वहीं समय-समय पर कई गतिविधियां भी संचालित होती हैं।
विशेषज्ञों की मानें तो नवजात शिशुओं के मां का दूध अमृत से कम नहीं है। जन्म के पहले घंटे के भीतर स्तनपान कराने और छह माह यह सिलसिला जारी रखने से नवजात को कई बीमारियों से बचाया जा सकता है।
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इतना ही नहीं, बाल विकास विभाग, स्वास्थ्य विभाग और बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था यूनिसेफ ने मिलकर सालभर में कई गतिविधियां कराईं, ताकि स्तनपान के महत्व को बताया जा सके।
लेकिन, कई वर्षों से जारी कोशिशों के बाद भी कई महिलाओं को यह बात नहीं समझाई जा सकी है कि मां का दूध बच्चे के लिए बहुत जरूरी तथा फायदेमंद है।
हाल ही में छह माह की जारी स्टिल बर्थ रिपोर्ट के अनुसार जिले के 3588 बच्चों को प्रसव के आधे घंटे के भीतर स्तनपान नहीं कराया गया है।
इसके अलावा 415 नौनिहाल ऐसे थे, जिन्हें प्रसव के दौरान जटिलता आने पर मां का पहला प्यार नसीब नहीं हुआ है। इन नौनिहालों की मौत मां के गर्भ में ही हो गई।
विभाग की मानें तो महिलाओं में उनकी शारीरिक बनवाट बिगड़ने की चिंता रहती हैै, जिससे वे स्तनपान कराने में संकोच करती हैं।
वहीं, रुढ़िवादी सोच भी नौनिहालों को मां से दूर कर रही है। वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि स्तनपान कराने से कैंसर, मधुमेह व अन्य रोगों का खतरा कम हो जाता है। यह महिलाओं के लिए हर दशा में फायदेमंद है।
37 फीसदी महिलाएं जारी रखती हैं स्तनपान का सिलसिला
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ एहतिशाम अली कहते हैं कि वर्ष 2011-12 के स्वास्थ्य सर्वेक्षण से पुष्ट हो चुका है कि 62 फीसदी महिलाएं नवजात को जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान करा तो देती हैं, मगर छह माह तक यह सिलसिला जारी नहीं रखती हैं। लगातार छह माह तक स्तनपान कराने का सिलसिला सिर्फ 37 फीसदी महिलाएं की रख पाती हैं।
मां का दूध शिशुओं के लिए अमृत
वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केके वर्मा कहते हैं कि जन्म के तुरंत बाद शिशु को स्तनपान कराने से 20 फीसदी तक शिशु मृत्यु दर में कमी आ सकती है। उन्होंने कहा कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में जन्म के तीन दिन बाद तक नवजात को मां का दूध नहीं पिलाया जाता है।
जन्म के बाद नवजातों को मधु, बकरी का दूध या पानी पिलाया जाता है, जो बच्चे के लिए जानलेवा है। वहीं, नवजात के लिए मां का गाढ़ा दूध अमृत है। छह माह तक उसे मां के दूध के अलावा कुछ नहीं देना चाहिए।
जागरूकता के लिए हो रहा प्रयास
जिला महिला अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ अजय वर्मा कहते हैं कि प्रसव के बाद महिलाओं को स्तनपान कराने के लिए प्रेरित किया जाता है। लेकिन, तराई में रुढ़िवादी सोच ज्यादा हावी है।
जन्म के कुछ घंटों तक नवजात को परिवारीजन मधु चटाते हैं या सिर्फ पानी देते हैं। इससे नवजात के जीवन को खतरा रहता है लेकिन धीरे-धीरे बदलाव दिख रहा है। किसी सोच को बदलने में वक्त लगता है।
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यह बात स्वास्थ्य महकमे की स्टिल बर्थ रिपोर्ट से सामने आई है। इसके पीछे महिलाओं की रूढ़िवादी सोच व फिगर बिगड़ने की मानसिकता का हावी होना माना जा रहा है।
तमाम कोशिशों के बावजूद महिलाओं में स्तनपान के प्रति रुझान नहीं बढ़ रहा है। यही कारण है शिशु मृत्युदर पर प्रभावी सफलता हाथ नहीं लग रही है।
शिशु मृत्युदर पर रोकथाम के लिए स्वास्थ्य महकमे की तरफ से प्रतिवर्ष अगस्त के पहले पखवारे में विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाता है। वहीं समय-समय पर कई गतिविधियां भी संचालित होती हैं।
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विशेषज्ञों की मानें तो नवजात शिशुओं के मां का दूध अमृत से कम नहीं है। जन्म के पहले घंटे के भीतर स्तनपान कराने और छह माह यह सिलसिला जारी रखने से नवजात को कई बीमारियों से बचाया जा सकता है।
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इतना ही नहीं, बाल विकास विभाग, स्वास्थ्य विभाग और बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था यूनिसेफ ने मिलकर सालभर में कई गतिविधियां कराईं, ताकि स्तनपान के महत्व को बताया जा सके।
लेकिन, कई वर्षों से जारी कोशिशों के बाद भी कई महिलाओं को यह बात नहीं समझाई जा सकी है कि मां का दूध बच्चे के लिए बहुत जरूरी तथा फायदेमंद है।
हाल ही में छह माह की जारी स्टिल बर्थ रिपोर्ट के अनुसार जिले के 3588 बच्चों को प्रसव के आधे घंटे के भीतर स्तनपान नहीं कराया गया है।
इसके अलावा 415 नौनिहाल ऐसे थे, जिन्हें प्रसव के दौरान जटिलता आने पर मां का पहला प्यार नसीब नहीं हुआ है। इन नौनिहालों की मौत मां के गर्भ में ही हो गई।
विभाग की मानें तो महिलाओं में उनकी शारीरिक बनवाट बिगड़ने की चिंता रहती हैै, जिससे वे स्तनपान कराने में संकोच करती हैं।
वहीं, रुढ़िवादी सोच भी नौनिहालों को मां से दूर कर रही है। वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि स्तनपान कराने से कैंसर, मधुमेह व अन्य रोगों का खतरा कम हो जाता है। यह महिलाओं के लिए हर दशा में फायदेमंद है।
37 फीसदी महिलाएं जारी रखती हैं स्तनपान का सिलसिला
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ एहतिशाम अली कहते हैं कि वर्ष 2011-12 के स्वास्थ्य सर्वेक्षण से पुष्ट हो चुका है कि 62 फीसदी महिलाएं नवजात को जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान करा तो देती हैं, मगर छह माह तक यह सिलसिला जारी नहीं रखती हैं। लगातार छह माह तक स्तनपान कराने का सिलसिला सिर्फ 37 फीसदी महिलाएं की रख पाती हैं।
मां का दूध शिशुओं के लिए अमृत
वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केके वर्मा कहते हैं कि जन्म के तुरंत बाद शिशु को स्तनपान कराने से 20 फीसदी तक शिशु मृत्यु दर में कमी आ सकती है। उन्होंने कहा कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में जन्म के तीन दिन बाद तक नवजात को मां का दूध नहीं पिलाया जाता है।
जन्म के बाद नवजातों को मधु, बकरी का दूध या पानी पिलाया जाता है, जो बच्चे के लिए जानलेवा है। वहीं, नवजात के लिए मां का गाढ़ा दूध अमृत है। छह माह तक उसे मां के दूध के अलावा कुछ नहीं देना चाहिए।
जागरूकता के लिए हो रहा प्रयास
जिला महिला अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ अजय वर्मा कहते हैं कि प्रसव के बाद महिलाओं को स्तनपान कराने के लिए प्रेरित किया जाता है। लेकिन, तराई में रुढ़िवादी सोच ज्यादा हावी है।
जन्म के कुछ घंटों तक नवजात को परिवारीजन मधु चटाते हैं या सिर्फ पानी देते हैं। इससे नवजात के जीवन को खतरा रहता है लेकिन धीरे-धीरे बदलाव दिख रहा है। किसी सोच को बदलने में वक्त लगता है।