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Bahraich News: इमीग्रेशन सर्टिफिकेट के लिए नेपाली बहुओं को लगाने होंगे दूतावास के चक्कर

Sun, 25 Jan 2026 12:08 AM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बहराइच
संवाद न्यूज एजेंसी, बहराइच Updated Sun, 25 Jan 2026 12:08 AM IST
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Nepali daughters-in-law will have to visit the embassy for immigration certificate.
बहराइच। भारत-नेपाल के बीच सदियों से चले आ रहे रोटी–बेटी के रिश्तों पर अब प्रशासनिक प्रक्रियाओं की नई परत चढ़ गई है। एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) के तहत चल रहे मतदाता सत्यापन अभियान में नेपाली बहुओं से इमीग्रेशन सर्टिफिकेट की मांग ने सीमावर्ती जिलों में हलचल बढ़ा दी है।
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स्थिति यह है कि अब इस प्रमाणपत्र के लिए नेपाली बहुओं को स्थानीय कार्यालय नहीं, बल्कि सीधे नेपाल सरकार के दूतावास या कांसुलेट कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ेंगे।
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दरअसल एसआईआर पोर्टल में पहचान के लिए सिर्फ नागरिकता प्रमाणपत्र का ही कॉलम उपलब्ध है, जबकि भारत-नेपाल की खुली सीमा के चलते ज्यादातर नेपाली बहुएं बिना किसी औपचारिक इमीग्रेशन दस्तावेज के ही विवाह कर भारत में बसती रही हैं।
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ऐसे में जब सत्यापन के दौरान इमीग्रेशन सर्टिफिकेट मांगा जाता है, तो न केवल बहुएं, बल्कि उनके ससुराल और मायका पक्ष के लोग भी असमंजस में पड़ जाते हैं। इस बारे में अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। वे सिर्फ इतना कहते हैं कि इमीग्रेशन सर्टिफिकेट अनिवार्य है।

बहराइच, लखीमपुर खीरी, श्रावस्ती, बलरामपुर, गोंडा और सिद्धार्थनगर जैसे सीमावर्ती जिलों में हजारों नेपाली बहुएं एसआईआर नोटिस के दायरे में आई हैं। बहराइच जिले में ही 22 हजार से अधिक नेपाली बहुएं इस प्रक्रिया से प्रभावित बताई जा रही हैं। कई परिवार ब्लॉक, तहसील और निर्वाचन कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन स्पष्ट दिशा-निर्देश न मिलने से परेशानी कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है।


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दूतावास स्तर पर ही बनेगा सर्टिफिकेट
रुपईडीहा इमीग्रेशन चेक पोस्ट के अधीक्षक राम अवध सिंह का कहना है कि अब इमीग्रेशन सर्टिफिकेट का सत्यापन और निर्गमन नेपाल सरकार के दूतावास या अधिकृत कांसुलेट कार्यालय के माध्यम से ही होता है। स्थानीय स्तर पर इसे बनवाने या सत्यापित कराने की कोई व्यवस्था नहीं है।



पारदर्शिता बनाम व्यावहारिक कठिनाई
जानकारों का कहना है कि इस प्रक्रिया से विवाह और नागरिकता संबंधी मामलों में पारदर्शिता तो बढ़ेगी, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर बेहद जटिल होगा। सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले ज्यादातर परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं। बार-बार दूतावास या कांसुलेट कार्यालय के चक्कर लगाना, दस्तावेज जुटाना और शुल्क जमा करना उनके लिए आसान नहीं है।




सामाजिक जीवन भारत में फिर कहां जाएं
नेपाली बहुओं का कहना है कि उन्होंने वर्षों पहले विवाह कर भारत में घर बसाया, बच्चे यहीं पढ़ रहे हैं और सामाजिक जीवन भी यहीं है। अब अचानक इमीग्रेशन सर्टिफिकेट की शर्त ने उनके मताधिकार और पहचान पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कई महिलाओं को डर है कि यदि समय पर दस्तावेज पूरे नहीं हुए, तो उनका नाम मतदाता सूची से बाहर हो सकता है।
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