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पुरातत्व विभाग की टीम ने किया सर्वे
ब्यूरो/अमर उजाला, बिनौली
Updated Thu, 21 Dec 2017 01:19 AM IST
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उत्खनन के लिए सर्वे करती भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान की टीम।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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बरनावा में लाक्षागृह टीले के राज जानने के लिए उत्खनन को मंजूरी मिल चुकी है। पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल के नेतृत्व में छह सदस्यीय टीम ने बरनावा टीले का सर्वे किया। मंजुल ने बताया जनवरी के पहले सप्ताह में यहां उत्खनन शुरू कराया जाएगा।
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने बरनावा में उत्खनन की मंजूरी दी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन शाखा द्वितीय और भारतीय पुरातत्व संस्थान लाल किला की संयुक्त टीम उत्खनन करेगी।
बुधवार को पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ एसके मंजुल के नेतृत्व में छह सदस्यीय टीम ने बरनावा टीले का सर्वे किया। मंजुल ने बताया कि बरनावा का टीला लंबे समय से लोगों के लिए उत्सुकता का केंद्र है। पुरातत्व विभाग ने इसे संरक्षित किया है। पहले करीब एक सप्ताह तक यहां सर्वेयर टीम उत्खनन की जगह का सर्वे कर तैयारी करेगी। इसके बाद एक सप्ताह में उत्खनन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
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इतिहास से क्या है जुड़ाव?
बागपत। बरनावा का पूरा क्षेत्र ही नहीं बल्कि मुजफ्फरनगर, शामली में भी महाभारत काल के अवशेष हैं। इसकी पुष्टि इस वजह से भी होती है, क्योंकि यह पूरा एरिया कुुरुक्षेत्र और हस्तिनापुर के बीच पड़ता है। उत्खनन का कार्य शुरू हो जाने से यहां लाक्षागृह की हकीकत भी सामने आएगी।
सिनौली, चंदायन और अब बरनावा
वर्ष 2005 के सितंबर माह में सिनौली में खुदाई का कार्य कराया । यहां हड़प्पा कालीन शवा दान गृह मिला । इससे इस क्षेत्र में हड़प्पा कालीन सभ्यता की पुष्टि हो गई । इसके बाद वर्ष 2015 में चंदायन गांव में उत्खनन का कार्य केंद्र सरकार करा चुकी है। चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति, कुषाण काल, गुप्त और राजपूत सभ्यता के प्रमाण भी मिल चुके हैं। निदेशक पुरावशेष डॉ. डीएन डिमरी ने बताया उत्खनन का उद्देश्य यह जानना है कि इस क्षेत्र में किन-किन सभ्यताओं के अवशेष हो सकते हैं।
यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि बरनावा का महा भारत काल से कितना और कैसा संबंध रहा है। पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल के निर्देशन में खुदाई का कार्य किया जाएगा।
हिंडन-कृष्णा से घिरा है बरनावा
बिनौली। बरनावा का स्थल हिंडन और कृष्णा नदी से घिरा हुआ है। इसके पास ही शेखपुरा में दोनों नदियां एक हो जाती है। टीले पर गुबंद हैं और यहीं से एक गुफा निकलती है।
दूसरी बार खुदाई, खुल चुके कई राज
बिनौली। वर्ष 2005 में शहजाद राय शोध संस्थान के इतिहासकारों के प्रयासों से सिनौली और वर्ष 2015 में चंदायन गांव में उत्खनन का कार्य केंद्र सरकार करा चुकी है। बरनावा गांव की जमीन में दफन गुत्थियों को भी अब बाहर निकाला जाएगा।
बरनावा टीला पहले ही संरक्षित गुफा की लिस्ट में शामिल है। बरनावा टीले पर करीब 22 बार शोध संस्थान के शोधार्थियों और इतिहासकारों की टीम सर्वेक्षण पूर्व में कर चुकी है। यहां से चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति, कुषाण, गुप्त और राजपूत सभ्यता के प्रमाण पहले से प्राप्त होते रहे हैं।
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केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने बरनावा में उत्खनन की मंजूरी दी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन शाखा द्वितीय और भारतीय पुरातत्व संस्थान लाल किला की संयुक्त टीम उत्खनन करेगी।
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बुधवार को पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ एसके मंजुल के नेतृत्व में छह सदस्यीय टीम ने बरनावा टीले का सर्वे किया। मंजुल ने बताया कि बरनावा का टीला लंबे समय से लोगों के लिए उत्सुकता का केंद्र है। पुरातत्व विभाग ने इसे संरक्षित किया है। पहले करीब एक सप्ताह तक यहां सर्वेयर टीम उत्खनन की जगह का सर्वे कर तैयारी करेगी। इसके बाद एक सप्ताह में उत्खनन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
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इतिहास से क्या है जुड़ाव?
बागपत। बरनावा का पूरा क्षेत्र ही नहीं बल्कि मुजफ्फरनगर, शामली में भी महाभारत काल के अवशेष हैं। इसकी पुष्टि इस वजह से भी होती है, क्योंकि यह पूरा एरिया कुुरुक्षेत्र और हस्तिनापुर के बीच पड़ता है। उत्खनन का कार्य शुरू हो जाने से यहां लाक्षागृह की हकीकत भी सामने आएगी।
सिनौली, चंदायन और अब बरनावा
वर्ष 2005 के सितंबर माह में सिनौली में खुदाई का कार्य कराया । यहां हड़प्पा कालीन शवा दान गृह मिला । इससे इस क्षेत्र में हड़प्पा कालीन सभ्यता की पुष्टि हो गई । इसके बाद वर्ष 2015 में चंदायन गांव में उत्खनन का कार्य केंद्र सरकार करा चुकी है। चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति, कुषाण काल, गुप्त और राजपूत सभ्यता के प्रमाण भी मिल चुके हैं। निदेशक पुरावशेष डॉ. डीएन डिमरी ने बताया उत्खनन का उद्देश्य यह जानना है कि इस क्षेत्र में किन-किन सभ्यताओं के अवशेष हो सकते हैं।
यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि बरनावा का महा भारत काल से कितना और कैसा संबंध रहा है। पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल के निर्देशन में खुदाई का कार्य किया जाएगा।
हिंडन-कृष्णा से घिरा है बरनावा
बिनौली। बरनावा का स्थल हिंडन और कृष्णा नदी से घिरा हुआ है। इसके पास ही शेखपुरा में दोनों नदियां एक हो जाती है। टीले पर गुबंद हैं और यहीं से एक गुफा निकलती है।
दूसरी बार खुदाई, खुल चुके कई राज
बिनौली। वर्ष 2005 में शहजाद राय शोध संस्थान के इतिहासकारों के प्रयासों से सिनौली और वर्ष 2015 में चंदायन गांव में उत्खनन का कार्य केंद्र सरकार करा चुकी है। बरनावा गांव की जमीन में दफन गुत्थियों को भी अब बाहर निकाला जाएगा।
बरनावा टीला पहले ही संरक्षित गुफा की लिस्ट में शामिल है। बरनावा टीले पर करीब 22 बार शोध संस्थान के शोधार्थियों और इतिहासकारों की टीम सर्वेक्षण पूर्व में कर चुकी है। यहां से चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति, कुषाण, गुप्त और राजपूत सभ्यता के प्रमाण पहले से प्राप्त होते रहे हैं।