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Baghpat News: गांव-गांव तेंदुए की दहशत...बेखबर में अफसर

Sun, 28 Jan 2024 12:11 AM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बागपत
संवाद न्यूज एजेंसी, बागपत Updated Sun, 28 Jan 2024 12:11 AM IST
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Terror of leopard in every village... officers unaware
बड़ौत। जनपद के 50 से अधिक गांवों में तेंदुए की दहशत है। तेंदुआ लगातार शिकार कर रहा है, लेकिन अफसर बेखबर हैं। अभी तक बिल्ली बताकर तेंदुआ होने से इंकार करते रहे है। लेकिन जब वन विभाग को तेंदुए का सामना करना पड़ा, तो वन विभाग बेबस नजर आया। वन कर्मियों के हाथों में लाठी-डंडों के अलावा कुछ नहीं दिखा। शनिवार को भी 10 घंटे तक वन विभाग घायल तेंदुए को पकड़ने के लिए जूझता रहा। बाद में वाइल्ड लाइफ की टीम को बुलाकर तेंदुए का रेसक्यू कराया गया।
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वन विभाग के पास संसाधनों की इस कदर कमी है कि इसका खामियाजा वन्य जीवों को भुगतना पड़ रहा है। विभाग के पास लाठी-डंडों के अलावा कुछ नहीं है। ऐसे में वन्य जीवों काे बचाना महंगा सौदा साबित हो रहा है। शाहपुर बाणगंगा गांव के जंगल में शिकारियों के जाल में फंसे तेंदुए को पकड़ने में विभाग की हकीकत खुल गई। आधुनिक युग में भी वन विभाग संसाधन की कमी का रोना रो रहा है।
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- 50 से अधिक गांवों में तेंदुए की गुर्राहट से दहशत में है ग्रामीण
एक के बाद एक तेंदुआ आने की सूचना से यह साफ जाहिर होता है कि अभी भी बागपत जनपद के कृष्णा व हिंडन नदी के किनारे बसे खपराना, शाहपुर बाणगंगा, गल्हैता, बरनावा, रंछाड सहित तकरीबन 50 से अधिक गांवों के लोग दहशत में है, क्योंकि आए दिन अलग-अलग जगहों पर तेंदुआ देखे जाने की सूचना वन विभाग को मिल रही है, लेकिन अफसर बिल्ली बताकर हर बार पल्ला झाड़ लेते हैं। जब वन विभाग का तेंदुए से सामना होता है तो वन विभाग बेबस नजर आता है।
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- छह वन रक्षक व पांच वन दरोगा के भरोसे है वन्य जीवों का जिम्मा
विभागीय रिकार्ड के अनुसार जनपद बागपत में मात्र छह वन रक्षक हैं, जबकि 20 वन रक्षकों की आवश्यकता है। बात यदि वन दरोगा की करें तो मात्र पांच वन दरोगा हैं, जबकि जरूरत 15 वन दरोगा की है। इसके अलावा जनपद में दो वन क्षेत्राधिकारी सहित एक डीएफओ है। तेंदुए जैसे खूंखार जानवर की सूचना मिलने पर आज भी वन विभाग लाठी-डंडे लेकर ही दौड़ता है। उसके पास मात्र एक पिंजरा है, जो काफी जर्जर है। आवश्यकता पड़ने पर मेरठ, सरधना या हस्तिनापुर से ही पिंजरा मंगाना पड़ता है। इसके अलावा तेंदुए जैसे जानवर को बेहोश करने के लिए ट्रेंकुलाइजर गन तक उपलब्ध नहीं है। यहीं कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में कई तेंदुए बेमौत अपनी जान गंवा चुके हैं।

केस नंबर-एक

- नौ जनवरी 2021 को बड़ौत में दिल्ली-सहारनपुर रेलवे लाइन पर बावली अंडरपास के पास डेढ़ साल के मादा तेंदुए की मौत हो गई थी। तेंदुए की मौत की अब तक जांच चल रही है।

केस नंबर-दो

- 15 दिसंबर 2020 को बरनावा वन क्षेत्र के शाहपुर बाणगंगा गांव के जंगल में तेंदुए को मौत के घाट उतार दिया गया था। तेंदुए के सिर पर कई प्रहार किए गए थे। मगर, अभी शिकारी नहीं पकड़े गए।



केस नंबर-तीन

- 23 अक्तूबर 2018 को ककौरकलां गांव में भी शिकारियों की ओर से लगाए गए खटके में तेंदुआ फंस गया था। वन विभाग की देरी के कारण तेंदुए की मौत हो गई थी।



केस नंबर-चार

- निरपुड़ा और हिसावदा गांव में तेंदुए को मौत के घाट उतार दिया गया था। वर्ष 2002 में पुसार गांव में भी ग्रामीणों द्वारा तेंदुए को मौत के घाट उतार दिया गया था।


- मिलन के समय निकलते हैं जंगल से बाहर

वन्यजीव विशेषज्ञ जीएस खुशारिया ने मुताबिक दहशरा, दीपावली से शुरू हुए मिलन की प्रक्रिया के तहत तेंदुआ जंगल से बाहर निकलता है और होली तक उनके मिलन की प्रक्रिया चलती है। तेंदुआ बहुत ही शर्मीला जानवर होता है।

- 20 फुट लंबी व 15 फुट ऊंची लगाता है छलांग

वन क्षेत्राधिकारी सुनेन्द्र सिंह के अनुसार तेंदुआ 20 फुट लंबी और 15 फुट की ऊंची छलांग लगा सकता है। वह खरगोश, शेह, कुत्ता आदि का अधिक शिकार करता है।

यह बात सही है कि विभाग स्टाफ की कमी व संसाधन से जूझ रहा है, इस संबंध में कई बार उच्चाधिकारियों को अवगत कराया जा चुका है, हमारी कोशिश प्रत्येक वन्यजीव को बचाने की रहती है। - वंदना फोगाट डीएफओ बागपत।
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