{"_id":"5749ee004f1c1b3207692161","slug":"revolution-site","type":"story","status":"publish","title_hn":"क्रांति स्थल की बेकदरी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
क्रांति स्थल की बेकदरी
ब्यूरो/अमर उजाला, बड़ौत
Updated Sun, 29 May 2016 12:44 AM IST
विज्ञापन
बड़ौत में खस्ताहाल पुरानी तहसील।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने का आधारभूत बनी 1857 की प्रथम जंग-ए-आजादी के प्रारंभ होते ही वर्तमान जनपद बागपत के बड़ौत क्षेत्र में क्रांति की मसाल जली, लेकिन सरकारी मशीनरी की अपेक्षा के कारण 158 साल बाद भी क्रांति स्थल, गांव और शहीदों के शाहदत स्थल गुमनामी में गुम होते नजर आ रहे हैं।
बाबा शाहमल सिंह के जन्म स्थान बिजरौल गांव, तत्कालीन देश खाप के मुखिया अमर शहीद चौधरी श्यो सिंह का शहादत स्थल, बागपत में यमुना नदी का वह किनारा जहां शाहमल एवं उनके साथियों ने अंग्रेजी सरकार द्वारा निर्मित नाव के पुल को उड़ा दिया गया था, वह स्थल, बासौद गांव की जामा मस्जिद जहां 180 मुसलमान क्रांतिकारी अंग्रेजी फौज से लड़ते शहीद हुए, बाबा शाहमल का शहादत स्थल आदि अनेकों स्थान सरकारी मशीनरी की उपेक्षा का शिकार बने हैं।
सूत्रों के अनुसार जंग- ए - आजादी के ऐतिहासिक स्थानों पर किसी भी सरकारी या अर्द्ध सरकारी तंत्र के अफसर ने जाने की जहमत तक नहीं उठाई।
10 मई 1857 के दो दिन पश्चात 12 मई को बाबा शाहमल सिंह के नेतृत्व में हजारों क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकुमरानों द्वारा बनाई गई बड़ौत तहसील (जहां आज वर्तमान में पुरानी तहसील के खंडहर स्थित है) को अंग्रेजों से मुक्त कराकर आजाद घोषित कर दिया।
विज्ञापन
तत्कालीन बागपत कोतवाल महान क्रांतिकारी वजीर खां और महताब खां के प्रस्ताव पर अंतिम मुगल बादशाह क्रांतिकारी बहादुर शाह जफर ने उस समय बाबा शाहमल सिंह को बड़ौत क्षेत्र का सूबेदार नियुक्त किया।
इसके पश्चात समस्त क्षेत्र की जनता को न्याय सुलभ कराने और उनके झगड़ों और समस्याओं के निपटाने के लिए वर्तमान में बड़ौत के पश्चिमी छोर पर पूर्वी यमन नहर के किनारे पर स्थित सिंचाई बंगले को अपना न्यायालय बना लिया था। बड़ौत में पूर्वी यमन नहर के किनारे स्थित यह बंगला 1857 की क्रांति का एक अहम हिस्सा रहा है।
इसमें बाबा शाहमल समेत हजारों क्रांतिकारियों की अनगिनत यादें सिमटी हैं। यहां बैठकर बाबा शाहमल ने लगभग दो माह तक अपना न्यायालय स्थापित किया।
लोगों की मांग पर आज तक इस सिंचाई बंगले के मुख्य द्वार या इस परिसर का नाम 1857 क्रांति के अमर शहीद बाबा शाहमल सिंह के नाम पर घोषित नहीं किया गया। यह वर्तमान सरकारी तंत्र और जन प्रतिनिधियों का अपने शहीदों के प्रति असम्मान का भाव प्रकट करता है। यह मांग लगातार उठाई जाती रही है।
जुल्म की कहानी कहता बरगद का पेड़
बड़ौत। बिजरौल गांव जहां अमर शहीद बाबा शाहमल का जन्म हुआ, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ने और 1857 क्रांति में हिस्सा लेने के कारण अंग्रेजों द्वारा पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया। एतिहासिक तथ्य है कि 18 जुलाई 1857 को बड़का अंग्रेजों से हुए युद्ध में बाबा शाहमल सिंह की शहादत के बाद भी शाहमल के वंशज और उनके बिजरौल थांबा के आम निवासियों का उत्साह कम नहीं हुआ।
अंग्रेजी सरकार ने जुल्म की हद पार कर पूरे बिजरौल गांव को बागी करार कर यहां के 32 नौजवान क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर बिजरौल गांव के दक्षिणी छोर पर मौजूद बरगद के पेड़ पर फांसी लगाकर मार डाला था और जुल्मों सितम की हद यह थी कि उनके पार्थिव शरीर को एक सप्ताह तक पेड़ों से उतरने नहीं दिया और उन्हें जंगली जानवर नौंचते रहे थे।
आज भी वह बड़ का पेड़ बिजरौल गांव के 32 नौजवान क्रांतिकारियों की शहादत का प्रतीक बन अंग्रेजों की जुल्म की कहानी को बयां कर रहा है।
विज्ञापन
बाबा शाहमल सिंह के जन्म स्थान बिजरौल गांव, तत्कालीन देश खाप के मुखिया अमर शहीद चौधरी श्यो सिंह का शहादत स्थल, बागपत में यमुना नदी का वह किनारा जहां शाहमल एवं उनके साथियों ने अंग्रेजी सरकार द्वारा निर्मित नाव के पुल को उड़ा दिया गया था, वह स्थल, बासौद गांव की जामा मस्जिद जहां 180 मुसलमान क्रांतिकारी अंग्रेजी फौज से लड़ते शहीद हुए, बाबा शाहमल का शहादत स्थल आदि अनेकों स्थान सरकारी मशीनरी की उपेक्षा का शिकार बने हैं।
विज्ञापन
सूत्रों के अनुसार जंग- ए - आजादी के ऐतिहासिक स्थानों पर किसी भी सरकारी या अर्द्ध सरकारी तंत्र के अफसर ने जाने की जहमत तक नहीं उठाई।
10 मई 1857 के दो दिन पश्चात 12 मई को बाबा शाहमल सिंह के नेतृत्व में हजारों क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकुमरानों द्वारा बनाई गई बड़ौत तहसील (जहां आज वर्तमान में पुरानी तहसील के खंडहर स्थित है) को अंग्रेजों से मुक्त कराकर आजाद घोषित कर दिया।
विज्ञापन
तत्कालीन बागपत कोतवाल महान क्रांतिकारी वजीर खां और महताब खां के प्रस्ताव पर अंतिम मुगल बादशाह क्रांतिकारी बहादुर शाह जफर ने उस समय बाबा शाहमल सिंह को बड़ौत क्षेत्र का सूबेदार नियुक्त किया।
इसके पश्चात समस्त क्षेत्र की जनता को न्याय सुलभ कराने और उनके झगड़ों और समस्याओं के निपटाने के लिए वर्तमान में बड़ौत के पश्चिमी छोर पर पूर्वी यमन नहर के किनारे पर स्थित सिंचाई बंगले को अपना न्यायालय बना लिया था। बड़ौत में पूर्वी यमन नहर के किनारे स्थित यह बंगला 1857 की क्रांति का एक अहम हिस्सा रहा है।
इसमें बाबा शाहमल समेत हजारों क्रांतिकारियों की अनगिनत यादें सिमटी हैं। यहां बैठकर बाबा शाहमल ने लगभग दो माह तक अपना न्यायालय स्थापित किया।
लोगों की मांग पर आज तक इस सिंचाई बंगले के मुख्य द्वार या इस परिसर का नाम 1857 क्रांति के अमर शहीद बाबा शाहमल सिंह के नाम पर घोषित नहीं किया गया। यह वर्तमान सरकारी तंत्र और जन प्रतिनिधियों का अपने शहीदों के प्रति असम्मान का भाव प्रकट करता है। यह मांग लगातार उठाई जाती रही है।
जुल्म की कहानी कहता बरगद का पेड़
बड़ौत। बिजरौल गांव जहां अमर शहीद बाबा शाहमल का जन्म हुआ, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ने और 1857 क्रांति में हिस्सा लेने के कारण अंग्रेजों द्वारा पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया। एतिहासिक तथ्य है कि 18 जुलाई 1857 को बड़का अंग्रेजों से हुए युद्ध में बाबा शाहमल सिंह की शहादत के बाद भी शाहमल के वंशज और उनके बिजरौल थांबा के आम निवासियों का उत्साह कम नहीं हुआ।
अंग्रेजी सरकार ने जुल्म की हद पार कर पूरे बिजरौल गांव को बागी करार कर यहां के 32 नौजवान क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर बिजरौल गांव के दक्षिणी छोर पर मौजूद बरगद के पेड़ पर फांसी लगाकर मार डाला था और जुल्मों सितम की हद यह थी कि उनके पार्थिव शरीर को एक सप्ताह तक पेड़ों से उतरने नहीं दिया और उन्हें जंगली जानवर नौंचते रहे थे।
आज भी वह बड़ का पेड़ बिजरौल गांव के 32 नौजवान क्रांतिकारियों की शहादत का प्रतीक बन अंग्रेजों की जुल्म की कहानी को बयां कर रहा है।