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Baghpat News: अहोई अष्टमी पर बन रहा रवि पुष्प योग, व्रत का दोगुना फल मिलेगा
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फोटो - 2
संवाद न्यूज एजेंसी
बागपत। अहोई अष्टमी व्रत पर इस बार रवि पुष्य योग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र में इस योग का विशेष महत्व बताया गया है। इस योग में किए गए प्रत्येक कार्य में सफलता मिलती है। अहोई पर इस बार रविपुष्य योग के अलावा सर्वार्थ सिद्धि योग, शुभ योग और शुक्ल योग बनने से बच्चों को आरोग्यता का वरदान और दीर्घायु का लाभ मिलेगा।
ज्योतिषाचार्य पंडित राजकुमार शास्त्री ने बताया कि नारदपुराण के अनुसार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कर्काष्टमी व्रत का विधान है। इसी व्रत को अहोई अष्टमी का व्रत कहा जाता है। अहोई का शाब्दिक अर्थ है-अनहोनी को होनी में बदलने वाली माता से है। सृष्टि में अनहोनी या दुर्भाग्य को टालने वाली आदिशक्ति देवी पार्वती हैं। इस दिन माता पार्वती की पूजा अहोई माता के रूप में की जाती है। अहोई अष्टमी का व्रत पांच नवंबर को रखा जाएगा। अष्टमी तिथि चार नवंबर की रात्रि 1 बजे से शुरू होगी और पांच नवंबर रात 3 बजकर 19 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार अष्टमी तिथि पांच नवंबर को है। पांच नवंबर को रवि पुष्य योग का शुभ संयोग बनने से व्रत का दोगुना फल मिलेगा। मान्यता है कि विधि-विधान से अहोई अष्टमी का व्रत करने से माता और संतान दोनों के जीवन में सुख की प्राप्ति होती है। अहोई अष्टमी की पूजा का विधान सांयकाल प्रदोष बेेला में करना श्रेष्ठ बताया गया है। इस बार शाम को पांच बजकर 35 से शाम छह बजकर 35 तक का समय पूजन के लिए उत्तम है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
बागपत। अहोई अष्टमी व्रत पर इस बार रवि पुष्य योग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र में इस योग का विशेष महत्व बताया गया है। इस योग में किए गए प्रत्येक कार्य में सफलता मिलती है। अहोई पर इस बार रविपुष्य योग के अलावा सर्वार्थ सिद्धि योग, शुभ योग और शुक्ल योग बनने से बच्चों को आरोग्यता का वरदान और दीर्घायु का लाभ मिलेगा।
ज्योतिषाचार्य पंडित राजकुमार शास्त्री ने बताया कि नारदपुराण के अनुसार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कर्काष्टमी व्रत का विधान है। इसी व्रत को अहोई अष्टमी का व्रत कहा जाता है। अहोई का शाब्दिक अर्थ है-अनहोनी को होनी में बदलने वाली माता से है। सृष्टि में अनहोनी या दुर्भाग्य को टालने वाली आदिशक्ति देवी पार्वती हैं। इस दिन माता पार्वती की पूजा अहोई माता के रूप में की जाती है। अहोई अष्टमी का व्रत पांच नवंबर को रखा जाएगा। अष्टमी तिथि चार नवंबर की रात्रि 1 बजे से शुरू होगी और पांच नवंबर रात 3 बजकर 19 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार अष्टमी तिथि पांच नवंबर को है। पांच नवंबर को रवि पुष्य योग का शुभ संयोग बनने से व्रत का दोगुना फल मिलेगा। मान्यता है कि विधि-विधान से अहोई अष्टमी का व्रत करने से माता और संतान दोनों के जीवन में सुख की प्राप्ति होती है। अहोई अष्टमी की पूजा का विधान सांयकाल प्रदोष बेेला में करना श्रेष्ठ बताया गया है। इस बार शाम को पांच बजकर 35 से शाम छह बजकर 35 तक का समय पूजन के लिए उत्तम है।
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