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Baghpat News: योजना धन में नहीं, धर्म में व्यय करो
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-जैनमुनि बृहस्पतिवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे
फोटो संख्या 10
बड़ौत। आचार्य विशुद्धसागर महाराज ने कहा कि प्रभु दर्शन से निज का दर्शन होता है। मनुष्य जीवन प्राप्त कर जिसने यथार्थ वस्तु स्वरूप नहीं समझा, ज्ञान प्राप्त नहीं किया, सम्पक सम्पत्ति प्राप्त नहीं की, गुरु सेवा, प्रभु भक्ति और संयम स्वीकार नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ है।
जैनमुनि बृहस्पतिवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि तन को वेतन में नहीं, धर्म में लगाओ। वैभव छोड़ो, के भव होने का पुरुषार्थ करो। संघनित जीवन ही श्रेष्ठ है। इस भव में ऐसा पुरुषार्थ करो, जिससे अगला-भव सुखद, आनन्दपूर्ण एवं शान्तिमय हो। वर्तमान-भव ही भविष्य के निर्माता होते हैं। भावों से ही बंध होता है, भावों से ही निर्बन्ध होता है। भावों से ही जीव संसार भ्रमण करता है और भावों से ही कर्मों का क्षय कर शांति प्राप्त करता है। जीवन का पल-पल मूल्यवान है, क्षण-क्षण सावधानी पूर्वक जीवन जियो। स्वयं के भाव ही विशुद्धि के कारण हैं और स्वयं के कु-भाव ही अशुद्धि में सहायक हैं। चित्त विशुद्ध करो, चारित्र पवित्र करो, पवित्र मार्ग पर चलो। जियो और जीने दो। यही मनुष्य जीवन का सार है। संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में आनंद जैन, अतुल जैन, सुभाष जैन, प्रदीप जैन, धनेंद्र जैन, विनोद एडवोकेट, विमल जैन शामिल रहे।
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फोटो संख्या 10
बड़ौत। आचार्य विशुद्धसागर महाराज ने कहा कि प्रभु दर्शन से निज का दर्शन होता है। मनुष्य जीवन प्राप्त कर जिसने यथार्थ वस्तु स्वरूप नहीं समझा, ज्ञान प्राप्त नहीं किया, सम्पक सम्पत्ति प्राप्त नहीं की, गुरु सेवा, प्रभु भक्ति और संयम स्वीकार नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ है।
जैनमुनि बृहस्पतिवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि तन को वेतन में नहीं, धर्म में लगाओ। वैभव छोड़ो, के भव होने का पुरुषार्थ करो। संघनित जीवन ही श्रेष्ठ है। इस भव में ऐसा पुरुषार्थ करो, जिससे अगला-भव सुखद, आनन्दपूर्ण एवं शान्तिमय हो। वर्तमान-भव ही भविष्य के निर्माता होते हैं। भावों से ही बंध होता है, भावों से ही निर्बन्ध होता है। भावों से ही जीव संसार भ्रमण करता है और भावों से ही कर्मों का क्षय कर शांति प्राप्त करता है। जीवन का पल-पल मूल्यवान है, क्षण-क्षण सावधानी पूर्वक जीवन जियो। स्वयं के भाव ही विशुद्धि के कारण हैं और स्वयं के कु-भाव ही अशुद्धि में सहायक हैं। चित्त विशुद्ध करो, चारित्र पवित्र करो, पवित्र मार्ग पर चलो। जियो और जीने दो। यही मनुष्य जीवन का सार है। संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में आनंद जैन, अतुल जैन, सुभाष जैन, प्रदीप जैन, धनेंद्र जैन, विनोद एडवोकेट, विमल जैन शामिल रहे।
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