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Baghpat News: कमीशन की रिपोर्ट में भी महाभारत कालीन लाक्षागृह, फैसले में अहम आधार बना
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अंकित चौहान
बागपत। बरनावा में महाभारत कालीन लाक्षागृह व शिव मंदिर मानते हुए दिए फैसले में न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष के दस्तावेजों पर भी सवाल उठाए हैं। इसके साथ ही न्यायालय ने निष्कर्ष में 104 बिंदुओं को शामिल किया है, जिनमें विभिन्न कोर्ट के दस फैसलों का उदाहरण भी दिया गया है। वहीं कमीशन की रिपोर्ट भी सार्वजनिक की गई है, जिसमें उसे लाक्षागृह माना गया है।
बरनावा में मुस्लिम पक्ष के मुकीम खान की तरफ से बरनावा में प्राचीन टीले पर शेख बदरूद्दीन की मजार व कब्रिस्तान होने का दावा करते हुए खसरा संख्या 3377 की 36 बीघा 6 बिस्से 8 बिस्वांसी जमीन पर मालिकाना हक को याचिका दायर की गई थी। न्यायाधीश शिवम द्विवेदी ने इसे ऐतिहासिक टीला महाभारत कालीन लाक्षागृह मानते हुए वहां गुफा व शिव मंदिर के अवशेष होने की बात कहते हुए मुस्लिम पक्ष की याचिका को खारिज कर दिया। अपने फैसले में न्यायालय ने 104 बिंदुओं का निष्कर्ष लिखा है, जिसमें दोनों पक्षों के दावों के साथ ही गवाहों, कमीशन की रिपोर्ट, भारतीय पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट सभी को शामिल किया है। कमीशन व भारतीय पुरातत्व विभाग की न्यायालय में दी गई रिपोर्ट में भी साफ कहा गया था कि वहां पुराना लाक्षागृह है।
कमीशन की रिपोर्ट में भी महाभारत कालीन अवशेष मिलना बताया
आयुक्त ने कमीशन से जांच कराई थी, जिसकी रिपोर्ट को फैसले में सार्वजनिक किया गया है। इसमें कहा गया है कि टीला प्राचीन है और वहां टूटे हुए मिट्टी के पात्र के अवशेष व विशेष मिट्टी मिली है। जिसे लाखामंडप माना गया और महाभारत कालीन प्राचीन अवशेष माना गया। टीले की सतह को प्राचीन कंकरीट की विशेष ईंटों से बना बताया गया। वहां मानव अस्थि भी मिलने की बात कही गई। हालांकि कमीशन ने टीले के उत्तरी छोर पर प्राचीन व पक्की कब्र होने का उल्लेख भी किया है। वहां किले जैसी दीवार भी बताई गई। न्यायालय ने कमीशन रिपोर्ट को विशेषज्ञ साक्ष्य के रूप में माना है। इसके साथ ही भारतीय पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट को फैसले का आधार बनाया गया है, जिसमें बरनावा के टीले को महाभारतकालीन लाक्षागृह माना गया है।
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सात बीघा जमीन कहां गई, कुछ नहीं बता सका मुस्लिम पक्ष
वादी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यदि बादशाह ने टीले व आसपास की भूमि को वक्फ कर दिया था जो 1276 फसली वर्ष 44 बीघा 12 बिस्वांसी के रूप में दर्ज है और उसके बाद वक्फ मुतालिक पट्टी गौरियान का लगभग सात बीघा रकबा 1343 फसली वर्ष के बाद कहां स्थित है। अगर वह कम हो गया था तो उसको लेकर वादी की तरफ से क्या आपत्ति या शिकायत दर्ज कराई गई।
वक्फ बोर्ड में पंजीकरण की तिथि व दाखिल पत्र में तिथि अलग मिली
वादी ने वादपत्र में जमीन को सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड यूपी लखनऊ में बतौर वक्फ दर्ज व रजिस्टर होना बताया है। वादी ने जिस कागज को दाखिल किया था, उसमें वक्फ नंबर 583 पर मेरठ में 30 सितंबर 1964 को धारा-29 उप्र मुस्लिम वक्फ अधिनियम-1960 में दर्ज होना बताया है। जबकि वक्फ नंबर 583 के पंजीकरण की तिथि खुद वादी ने दाखिल किए कागज संख्या 191ग में उसकी दिनांक 27 जून 1964 बताई है।
अधिसूचना कब हुई, नहीं बता सके, पंजिका भी नहीं दे सके
यह भी नहीं बताया गया कि उप्र मुस्लिम वक्फ अधिनियम-1960 की धारा-4 के अंतर्गत सरकार ने वक्फ नंबर 583 मेरठ के सर्वेक्षण के लिए शासकीय राजपक्ष में कमिश्नर की नियुक्ति कब की थी, कमिश्नर ने वक्फ नंबर की कब जांच की, सरकार ने इसको शासकीय राजपत्र में कब अधिसूचित किया। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड यूपी लखनऊ द्वारा संरक्षित वक्फ की पंजिका भी साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं की गई और उसे प्रस्तुत नहीं करने का कारण भी नहीं बताया गया।
अपने फैसले में दस विभिन्न न्यायालयों के फैसले का जिक्र किया
न्यायलय ने फैसले में विभिन्न न्यायालयों के पिछले दस फैसलों का जिक्र उदाहरण के तौर पर किया है। इसके साथ ही एक बिंदु में तर्क दिया गया है कि भूमि अगर कब्रिस्तान की है तो वह कब्रिस्तान की रहेगी। किसी के उसके कुछ भाग में कृषि करने से उसकी प्रकृति नहीं बदलती है।
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बागपत। बरनावा में महाभारत कालीन लाक्षागृह व शिव मंदिर मानते हुए दिए फैसले में न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष के दस्तावेजों पर भी सवाल उठाए हैं। इसके साथ ही न्यायालय ने निष्कर्ष में 104 बिंदुओं को शामिल किया है, जिनमें विभिन्न कोर्ट के दस फैसलों का उदाहरण भी दिया गया है। वहीं कमीशन की रिपोर्ट भी सार्वजनिक की गई है, जिसमें उसे लाक्षागृह माना गया है।
बरनावा में मुस्लिम पक्ष के मुकीम खान की तरफ से बरनावा में प्राचीन टीले पर शेख बदरूद्दीन की मजार व कब्रिस्तान होने का दावा करते हुए खसरा संख्या 3377 की 36 बीघा 6 बिस्से 8 बिस्वांसी जमीन पर मालिकाना हक को याचिका दायर की गई थी। न्यायाधीश शिवम द्विवेदी ने इसे ऐतिहासिक टीला महाभारत कालीन लाक्षागृह मानते हुए वहां गुफा व शिव मंदिर के अवशेष होने की बात कहते हुए मुस्लिम पक्ष की याचिका को खारिज कर दिया। अपने फैसले में न्यायालय ने 104 बिंदुओं का निष्कर्ष लिखा है, जिसमें दोनों पक्षों के दावों के साथ ही गवाहों, कमीशन की रिपोर्ट, भारतीय पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट सभी को शामिल किया है। कमीशन व भारतीय पुरातत्व विभाग की न्यायालय में दी गई रिपोर्ट में भी साफ कहा गया था कि वहां पुराना लाक्षागृह है।
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कमीशन की रिपोर्ट में भी महाभारत कालीन अवशेष मिलना बताया
आयुक्त ने कमीशन से जांच कराई थी, जिसकी रिपोर्ट को फैसले में सार्वजनिक किया गया है। इसमें कहा गया है कि टीला प्राचीन है और वहां टूटे हुए मिट्टी के पात्र के अवशेष व विशेष मिट्टी मिली है। जिसे लाखामंडप माना गया और महाभारत कालीन प्राचीन अवशेष माना गया। टीले की सतह को प्राचीन कंकरीट की विशेष ईंटों से बना बताया गया। वहां मानव अस्थि भी मिलने की बात कही गई। हालांकि कमीशन ने टीले के उत्तरी छोर पर प्राचीन व पक्की कब्र होने का उल्लेख भी किया है। वहां किले जैसी दीवार भी बताई गई। न्यायालय ने कमीशन रिपोर्ट को विशेषज्ञ साक्ष्य के रूप में माना है। इसके साथ ही भारतीय पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट को फैसले का आधार बनाया गया है, जिसमें बरनावा के टीले को महाभारतकालीन लाक्षागृह माना गया है।
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सात बीघा जमीन कहां गई, कुछ नहीं बता सका मुस्लिम पक्ष
वादी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यदि बादशाह ने टीले व आसपास की भूमि को वक्फ कर दिया था जो 1276 फसली वर्ष 44 बीघा 12 बिस्वांसी के रूप में दर्ज है और उसके बाद वक्फ मुतालिक पट्टी गौरियान का लगभग सात बीघा रकबा 1343 फसली वर्ष के बाद कहां स्थित है। अगर वह कम हो गया था तो उसको लेकर वादी की तरफ से क्या आपत्ति या शिकायत दर्ज कराई गई।
वक्फ बोर्ड में पंजीकरण की तिथि व दाखिल पत्र में तिथि अलग मिली
वादी ने वादपत्र में जमीन को सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड यूपी लखनऊ में बतौर वक्फ दर्ज व रजिस्टर होना बताया है। वादी ने जिस कागज को दाखिल किया था, उसमें वक्फ नंबर 583 पर मेरठ में 30 सितंबर 1964 को धारा-29 उप्र मुस्लिम वक्फ अधिनियम-1960 में दर्ज होना बताया है। जबकि वक्फ नंबर 583 के पंजीकरण की तिथि खुद वादी ने दाखिल किए कागज संख्या 191ग में उसकी दिनांक 27 जून 1964 बताई है।
अधिसूचना कब हुई, नहीं बता सके, पंजिका भी नहीं दे सके
यह भी नहीं बताया गया कि उप्र मुस्लिम वक्फ अधिनियम-1960 की धारा-4 के अंतर्गत सरकार ने वक्फ नंबर 583 मेरठ के सर्वेक्षण के लिए शासकीय राजपक्ष में कमिश्नर की नियुक्ति कब की थी, कमिश्नर ने वक्फ नंबर की कब जांच की, सरकार ने इसको शासकीय राजपत्र में कब अधिसूचित किया। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड यूपी लखनऊ द्वारा संरक्षित वक्फ की पंजिका भी साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं की गई और उसे प्रस्तुत नहीं करने का कारण भी नहीं बताया गया।
अपने फैसले में दस विभिन्न न्यायालयों के फैसले का जिक्र किया
न्यायलय ने फैसले में विभिन्न न्यायालयों के पिछले दस फैसलों का जिक्र उदाहरण के तौर पर किया है। इसके साथ ही एक बिंदु में तर्क दिया गया है कि भूमि अगर कब्रिस्तान की है तो वह कब्रिस्तान की रहेगी। किसी के उसके कुछ भाग में कृषि करने से उसकी प्रकृति नहीं बदलती है।