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प्रतिस्पर्धा बनती है मनुष्य के दुख का कारण : विमर्श
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फोटो संख्या 3
संवाद न्यूज एजेंसी
बड़ौत। नगर के अजितनाथ सभागार में बुधवार को धर्मसभा में जैन संत विमर्श सागर महाराज ने कहा कि प्रतिस्पर्धा मनुष्य के दुख का कारण बनती है।
उन्होंने कहा कि प्रतिष्ठा की आकांक्षा से भरा होने के कारण इंसान दुखी है। मनुष्य सदैव दूसरे के समान बनने की कोशिश करता है और उसी पुरुषार्थ में रहता है। प्रतिस्पर्धा में सफल होकर वह प्रदर्शन करने लगता है और उसे अपनी प्रतिष्ठा समझकर स्वयं के जीवन को धूमिल करने लगता है। मनुष्य प्रतिस्पर्धा के कारण जिसे सुख का साधन समझता है। वही दुख का कारण बन जाती है। दुख बाहर से नहीं अंदर की आकांक्षा से आता है। इस मौके पर श्रेयांस जैन, महेंद्र जैन, मदन लाल जैन, मुकेश जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, संजय जैन, अनिल जैन आदि मौजूद रहे।
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संवाद न्यूज एजेंसी
बड़ौत। नगर के अजितनाथ सभागार में बुधवार को धर्मसभा में जैन संत विमर्श सागर महाराज ने कहा कि प्रतिस्पर्धा मनुष्य के दुख का कारण बनती है।
उन्होंने कहा कि प्रतिष्ठा की आकांक्षा से भरा होने के कारण इंसान दुखी है। मनुष्य सदैव दूसरे के समान बनने की कोशिश करता है और उसी पुरुषार्थ में रहता है। प्रतिस्पर्धा में सफल होकर वह प्रदर्शन करने लगता है और उसे अपनी प्रतिष्ठा समझकर स्वयं के जीवन को धूमिल करने लगता है। मनुष्य प्रतिस्पर्धा के कारण जिसे सुख का साधन समझता है। वही दुख का कारण बन जाती है। दुख बाहर से नहीं अंदर की आकांक्षा से आता है। इस मौके पर श्रेयांस जैन, महेंद्र जैन, मदन लाल जैन, मुकेश जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, संजय जैन, अनिल जैन आदि मौजूद रहे।