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रालोद के अभेद्ध दुर्ग को भेदने की भाजपा चुनौती

Wed, 09 Feb 2022 11:15 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 09 Feb 2022 11:15 PM IST
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BJP's challenge to penetrate the impregnable fort of RLD
छपरौली विधानसभा क्षेत्र रालोद का अभेद्ध दुर्ग माना जाता है। भाजपा ने इस बार दुर्ग को भेदने के लिए पूरा जोर लगाया हुआ है, लेकिन कमल कितना खिलता है यह शांत बैठा वोटर ही तय करेगा। छपरौली को पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की कर्मभूमि व उनके परिवार की विरासत ऐसे ही नहीं कहा जाता है। इस सीट पर चरण सिंह के साथ ही उनके परिवार का कोई सदस्य व पार्टी से लड़ने वाला प्रत्याशी आज तक नहीं हारा है। इस बार रालोद-सपा गठबंधन से जहां डा. अजय कुमार को चुनावी मैदान में उतारा गया है। उनके लिए सपा का मुस्लिम वोट बैंक सबसे बड़ा सहारा होगा तो किसान आंदोलन का असर भी यहां दिख सकता है। भाजपा ने यहां से विधायक सहेंद्र सिंह रमाला पर दांव लगाया है। पिछला विधानसभा रालोद से चुनाव जीतने के बाद भाजपा में चले गए थे। अब सरकार में कराए गए विकास कार्यों का भी सहारा है। बसपा से शाहिन चौधरी चुनावी जंग लड़ रहे है और इनके लिए बसपा के वोट बैंक दलितों का कुछ सहारा है और यह मुस्लिमों से उम्मीद भी लगाए हुए है। इस तरह ही कांग्रेस ने यूनुस चौधरी को उतारा है और इनको भी मुस्लिमों से बड़ी उम्मीद है।
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किसी के लिए आसान नहीं मैदान, उलझ रहा चुनाव
बड़ौत जनपद की सियासत का केंद्र है और यहां राजनीतिक दलों ने अपना झंडा लहराने के लिए पूरा जोर लगाया हुआ है। मैदान मारना किसी के लिए आसान नहीं है। सियासी गणित हर चुनाव में बदल रहा है और इस बार भी रालोद-सपा व भाजपा एक-दूसरे की वोटों में सेंध लगाकर कुर्सी पर काबिज होने की जुगत लगा रहे है। परिसीमन बदलने के बाद यहां का सियासी समीकरण भी बदलता गया और पहले बसपा व फिर भाजपा ने बड़ौत की सीट पर कब्जा जमाया। जिससे इस सीट पर चुनावी जंग हर बार कड़ी रहती है। भाजपा ने अपने विधायक केपी मलिक पर दोबारा भरोसा जताकर मैदान में उतारा है। भाजपा के अपने वोट बैंक के साथ ही नगर पालिका के पहले चेयरमैन होने के कारण शहर में मजबूत पकड़ को देखते हुए वह खूब खेल रहे है। रालोद-सपा गठबंधन ने एडवोकेट जयवीर तोमर दांव लगाया है। राजनीति में नए चेहरे होने के बावजूद उनको जाट-मुस्लिम से बड़ी उम्मीद है। किसान आंदोलन का फायदा भी उनको यहां मिलने की आस है। बसपा ने अंकित शर्मा को मैदान में उतारा है जो दलित-ब्राह्मण से बड़ी उम्मीद रखे हुए है। कांग्रेस ने राहुल कश्यप को उतारा है जो पहले जिला पंचायत का चुनाव लड़कर अपनी चुनावी जमीन तैयार कर चुके थे और उसका ही वह फायदा उठा रहे है। हालांकि इस सीट पर अभी समीकरण पूरी तरह से उलझे हुए है और ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है।
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दिग्गजों में कड़ी जंग, भविष्य भी तय होगा
बागपत विधानसभा सीट का सियासी गणित भी पिछले दो चुनाव से बदल रहा है। इस सीट पर रालोद जहां अपनी पुरानी जमीन वापस तलाश रहा है, वहीं भाजपा भी दोबारा सीट कब्जाने की उम्मीद जता रही है। इस सीट पर भी चुनाव फंसा हुआ है और सभी जातीय समीकरण का गणित लगाकर उनको साधने में लगे है। इस सीट पर भाजपा ने विधायक योगेश धामा पर दोबारा दांव खेला है। 15 साल तक जिला पंचायत की राजनीति करने वाले योगेश धामा को भाजपा के साथ ही अपने निजी वोट बैंक से बड़ी उम्मीद है। रालोद-सपा गठबंधन ने नवाब अहमद हमीद को चुनावी मैदान में उतारा है। उनके लिए मुस्लिम, जाट, यादव से बड़ी उम्मीद है तो यहां से कई बार विधायक व मंत्री रहे पिता नवाब कोकब हमीद की सादगी का सहारा है। बसपा ने नोएडा के अरुण कसाना को मैदान में उतारा है। यहां की राजनीति के लिए वे नया चेहरा है। इनको बसपा के अपने दलित वोट बैंक के साथ ही गुर्जरों से उम्मीद है। कांग्रेस ने अनिल देव त्यागी को मैदान में उतारा हुआ है। कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ता होने के साथ ही त्यागी, ब्राह्मणों से काफी उम्मीद रखे हुए है। इस तरह बागपत सीट भी समीकरणों में उलझी हुई है और यहां भी स्थिति साफ होती नहीं दिख रही है।
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