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चित्रित धूसर मृदभांड से महाभारतकाल की सभ्यता के संकेत
Updated Tue, 09 Jan 2018 12:35 AM IST
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बिनौली (बागपत)। बरनावा में उत्खनन की तैयारियां पूरी हो गई है। जिस जगह को खोदाई के लिए तैयार किया गया है, उसके सरफेस पर चित्रित धूसर मृदभांड के अवशेष मिले हैं। उत्खनन से जुड़े विशेषज्ञों ने बरनावा में महाभारत कालीन सभ्यता की बस्ती मिलने की संभावना जताई है। इतिहास में भी वार्णावृत्त यानी बरनावा का जिक्र है। जैन और बौद्ध ग्रंथों में भी कई जगह वार्णावृत्त का उल्लेख किया गया है।
बरनावा में विधिवत उत्खनन 10 जनवरी से आरंभ होगा। खोदाई का उद्देश्य बरनावा क्षेत्र में मानव बस्तियों का इतिहास जानना है। ट्रैंच तैयार कर लिया गया है। शुरूआती दौर में ही कई महत्वपूर्ण संकेत मिल रहे हैं। जिस जगह को खोदाई के लिए तैयार किया गया है, उसके ऊपरी हिस्से पर ही चित्रित मृदभांड के अवशेष मिले हैं। इस तरह के मिट्टी के बर्तन महाभारत काल में ही प्रयोग किए जाते थे। इन पर रंगों से चित्र बनाए जाते थे, इनका आकार पतला होता था। हस्तिनापुर में हुए उत्खनन में भी इस तरह के ही बर्तन मिले थे।
एमएम डिग्री कॉलेज, मोदीनगर के इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. केके शर्मा कहते हैं कि चित्रित धूसर मृदभांड का जुड़ाव महाभारत काल से ही है। इस तरह के संकेत मिलने से संभावना जताई जा रही है कि यहां पर महाभारत कालीन बस्ती मिल सकेगी। उत्खनन से उस दौर की संस्कृति को जानने में भी मदद मिलेगी।
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गौरतलब है कि खुदाई स्थल की सफाई के दौरान भारतीय पुरातत्व विभाग की टीम को मृदभांड के अवशेष मिले हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन शाखा द्वितीय और भारतीय पुरातत्व संस्था लाल किला की संयुक्त टीम उत्खनन करेगी। पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉक्टर एसके मंजुल को यहां उत्खनन के लिए लाइसेंस दिया गया है। निदेशक (पुरावशेष) डॉ. डीएन डिमरी ने कहा उत्खनन से पहले सरफेस से भी कई महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं और पुरातत्व विभाग की टीम इसी से अनुमान लगाती है।
चित्रित धूसर मृदभांड के बाद धातु का प्रयोग
बिनौली। उत्तर वैदिक काल में चित्रित धूसर मृदभांड का प्रयोग किया गया। इसके बाद आर्यों ने धातु के बर्तनों का प्रयोग शुरू किया। यही नहीं आर्यों ने हस्तिनापुर क्षेत्र को इस काल में अपनी राजधानी बनाया और फिर पूर्वांचल तक बढ़ते चले गए।
महिला के कंकाल के गले में मिले थे आभूषण
बिनौली। सिनौली में वर्ष 2005 में खुदाई के दौरान हडप्पाकालीन शवादान केंद्र मिला था। इसमें एक महिला का कंकाल मिला, जिसके गले में सोने के आभूषण भी मिले थे।
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बरनावा में विधिवत उत्खनन 10 जनवरी से आरंभ होगा। खोदाई का उद्देश्य बरनावा क्षेत्र में मानव बस्तियों का इतिहास जानना है। ट्रैंच तैयार कर लिया गया है। शुरूआती दौर में ही कई महत्वपूर्ण संकेत मिल रहे हैं। जिस जगह को खोदाई के लिए तैयार किया गया है, उसके ऊपरी हिस्से पर ही चित्रित मृदभांड के अवशेष मिले हैं। इस तरह के मिट्टी के बर्तन महाभारत काल में ही प्रयोग किए जाते थे। इन पर रंगों से चित्र बनाए जाते थे, इनका आकार पतला होता था। हस्तिनापुर में हुए उत्खनन में भी इस तरह के ही बर्तन मिले थे।
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एमएम डिग्री कॉलेज, मोदीनगर के इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. केके शर्मा कहते हैं कि चित्रित धूसर मृदभांड का जुड़ाव महाभारत काल से ही है। इस तरह के संकेत मिलने से संभावना जताई जा रही है कि यहां पर महाभारत कालीन बस्ती मिल सकेगी। उत्खनन से उस दौर की संस्कृति को जानने में भी मदद मिलेगी।
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गौरतलब है कि खुदाई स्थल की सफाई के दौरान भारतीय पुरातत्व विभाग की टीम को मृदभांड के अवशेष मिले हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन शाखा द्वितीय और भारतीय पुरातत्व संस्था लाल किला की संयुक्त टीम उत्खनन करेगी। पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉक्टर एसके मंजुल को यहां उत्खनन के लिए लाइसेंस दिया गया है। निदेशक (पुरावशेष) डॉ. डीएन डिमरी ने कहा उत्खनन से पहले सरफेस से भी कई महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं और पुरातत्व विभाग की टीम इसी से अनुमान लगाती है।
चित्रित धूसर मृदभांड के बाद धातु का प्रयोग
बिनौली। उत्तर वैदिक काल में चित्रित धूसर मृदभांड का प्रयोग किया गया। इसके बाद आर्यों ने धातु के बर्तनों का प्रयोग शुरू किया। यही नहीं आर्यों ने हस्तिनापुर क्षेत्र को इस काल में अपनी राजधानी बनाया और फिर पूर्वांचल तक बढ़ते चले गए।
महिला के कंकाल के गले में मिले थे आभूषण
बिनौली। सिनौली में वर्ष 2005 में खुदाई के दौरान हडप्पाकालीन शवादान केंद्र मिला था। इसमें एक महिला का कंकाल मिला, जिसके गले में सोने के आभूषण भी मिले थे।