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लोकतंत्र में आज परवाह है किसको, किसकी...
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खेकड़ा (बागपत)।
सुभाषचंद्र बोस की जयंती के उपलक्ष्य में लोक साहित्य संस्कृति ने काव्य गोष्ठी की। इसमें कवियों ने नेता जी कविताओं के माध्यम से याद किया।
खेकड़ा नगर के मोहल्ला औरंगाबाद स्थित दीपक धामा के आवास पर लोक साहित्य संस्कृति समिति ने सुभाषचंद्र बोस की जयंती के उपलक्ष्य में काव्य गोष्ठी की। इसका शुभारंभ समिति के अध्यक्ष गजेंद्र कौशिक ने कर सुभाषचंद्र बोस के जीवन पर प्रकाश डाला। इसमें कवि राम कुमार सिंह मान ने कहा, लोकतंत्र में आज परवाह है किसको, किसकी, लोक की चिंता नहीं तंत्र को है। कवि गजेंद्र गजानन ने कहा, सुभाष, भगत सिंह, चंद्रशेखर सा अब ना कोई यहां पर दिखता है, मानव ही मानव का दुश्मन यहां पर दिखता है। कवि अनंग पाल दांगी ने कहा, मां के आंचल में हर दर्द की दवा मिलती है, वो लोग बच जाते हैं, सब हादसों से जिनको मां की दुआ मिलती है। कवि गोपाल शर्मा ने कहा, अपने पैरों पर था मैं चलकर गया, चारों कंधों पर चढ़कर के मैं आ गया, जिस तिरंगे की खातिर मै हद पर गया, वो तिरंगा ही मेरा कफन बन गया। कवि प्रेमशंकर प्रेम ने कहा, देखो धरती माता करती हम सब से प्यार है, फर्ज हमारा बनता बोलो, इसकी जयजयकार है, बनते इस धरती पर देखो कितने सुंदर मकान है, इन्हें देखकर हम बन जाते कितने धनवान है। कवि ब्रहम सिंह धामा आदि कवियों ने भी काव्य पाठ कर श्रोताओं को भाव विभोर कर खूब वाही वाही लूटी। गोष्ठी की अध्यक्षता दीपक धामा ने की। संचालन गजेंद्र गजानन ने किया।
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सुभाषचंद्र बोस की जयंती के उपलक्ष्य में लोक साहित्य संस्कृति ने काव्य गोष्ठी की। इसमें कवियों ने नेता जी कविताओं के माध्यम से याद किया।
खेकड़ा नगर के मोहल्ला औरंगाबाद स्थित दीपक धामा के आवास पर लोक साहित्य संस्कृति समिति ने सुभाषचंद्र बोस की जयंती के उपलक्ष्य में काव्य गोष्ठी की। इसका शुभारंभ समिति के अध्यक्ष गजेंद्र कौशिक ने कर सुभाषचंद्र बोस के जीवन पर प्रकाश डाला। इसमें कवि राम कुमार सिंह मान ने कहा, लोकतंत्र में आज परवाह है किसको, किसकी, लोक की चिंता नहीं तंत्र को है। कवि गजेंद्र गजानन ने कहा, सुभाष, भगत सिंह, चंद्रशेखर सा अब ना कोई यहां पर दिखता है, मानव ही मानव का दुश्मन यहां पर दिखता है। कवि अनंग पाल दांगी ने कहा, मां के आंचल में हर दर्द की दवा मिलती है, वो लोग बच जाते हैं, सब हादसों से जिनको मां की दुआ मिलती है। कवि गोपाल शर्मा ने कहा, अपने पैरों पर था मैं चलकर गया, चारों कंधों पर चढ़कर के मैं आ गया, जिस तिरंगे की खातिर मै हद पर गया, वो तिरंगा ही मेरा कफन बन गया। कवि प्रेमशंकर प्रेम ने कहा, देखो धरती माता करती हम सब से प्यार है, फर्ज हमारा बनता बोलो, इसकी जयजयकार है, बनते इस धरती पर देखो कितने सुंदर मकान है, इन्हें देखकर हम बन जाते कितने धनवान है। कवि ब्रहम सिंह धामा आदि कवियों ने भी काव्य पाठ कर श्रोताओं को भाव विभोर कर खूब वाही वाही लूटी। गोष्ठी की अध्यक्षता दीपक धामा ने की। संचालन गजेंद्र गजानन ने किया।