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Azamgarh News: बुनी गई मुबारकपुर में नाम है बनारसी साड़ी
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अमिलो। मुबारकपुर कस्बा व आसपास की बस्तियों में दिन भर लूम की खटर-पटर होती रहती है। पहले हथकरघे चलते थे तब इतनी आवाज नहीं होती थी लेकिन उनकी जगह पॉवरलूम चलने लगे हैं। मुबारकपुर में बुनी जाने वाली साड़ी को बनारसी ही माना जाता है। इसका न तो अपना ब्रांड है और इसीलिए बाजार भी सिमटता जा रहा है। मुबारकपुर की साड़ी को ओडीओपी में शामिल है लेकिन बनारसी के नाम से।
राजा मुबारकशाह के नाम पर बसा हुआ कस्बे में सन् 1971 से लेकर 1998 तक रेशमी साड़ी का कारोबार बुलंदी पर था। ढाई लाख हथकरघों पर कारीगार रात दिन काम करके भी बाजार की मांग को पूरी नहीं कर पाते थे। कस्बे के आसपास के गांवों में भी लोग बुनाई से जुड़े। एक अच्छा बुनकर बनने में समय लगता है। ऐसे में लोगों ने बच्चों को भी बुनकरी की कला सिखाना शुरू कर दिया था। स्कूल जाने की उम्र में ही बच्चे ताना-बाना का ककहरा पढ़ने लगते थे।
बुनकर हथकरघा पर साड़ी तैयार कर शाम को उसे मंडी में बेंचकर अपना मुनाफा कमाते थे। मुबारकपुर में समृद्धि झलकती थी। सन् 1998 के बाद से यहां के कारोबार पर मंदी का साया मंडराने लगा। उसके बाद फिर व्यवसाय संकट से उबर नहीं पाया। क्षेत्र में पहले ढाई लाख हथकरघा हुआ करते थे जो घटकर 25 हजार तक हो गए हैं। इस बीच पावरलूम लगे लेकिन उनकी संख्या भी तीन हजार ही है।
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युवा पीढ़ी नहीं करना चाहती हथकरघा पर काम
अमिलो। पॉवरलूम की मशीन बिजली से चलती है लेकिन हथकरघा को हाथ और पांव के जोर पर चलाना पड़़ता है। इसमें बुनाई का काम धीमी गति से होता है। अधिक मेहनत करके भी उत्पादन कम ही होता है। इससे लागत बढ़ जाती है। पॉवरलूम पर वैसी ही डिजाइन की साड़ी कम कीमत में तैयार हो जाती है। हथकरघा काम कहीं ज्यादा बेहतर होता है। अब हैंडलूम की ब्रांडिंग होने लगी है और उसके लिए अधिक कीमत चुकाने वाले भी हैं। इसके बावजूद युवा पीढ़ी हथकरघा पर काम करने में कम ही रुचि ले रही है।
नहीं खुला विपणन केंद्र, बिजली की पड़ी मार
अमिलो। पहले पावरलूम को फिक्स दर से बिजली मिलती थी। अब स्मार्ट मीटर लगा दिए गए हैं। इससे बिजली का बिल चार से पांच गुना बढ़कर आने लगा है। सपा सरकार में मुबारकपुर में लगभग 12 करोड़ की लागत से विपणन केंद्र का निर्माण हुआ। इसमें 158 दुकाने हैं। तत्कालीन जिलाधिकारी प्रांजल यादव व अभिनेत्री शबाना आजमी ने इसके लिए प्रयास किया था। इसमें साप्ताहिक हाट लगाने की योजना थी ताकि व्यापारी आएं और बुनकरों को लाभ मिले। मगर अब तक इसे शुरू नहीं किया जा सका।
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मुबारकपुर में जब से मंडी खत्म हुई यहां का कारोबार सिमट गया। रेशम में रंग भरने वाले बुनकर अब होटल में जाकर बर्तन धो रहे हैं। कुछ जो काबिल हैं वे विदेश जाकर नौकरी करने को मजबूर हैं। - मुख्तार अहमद, बुनकर।
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फोटो संख्या-- -
मुबारकपुर क्षेत्र में ढाई लाख हथकरघा हुआ करता था जो अब घट कर 25 हजार हो गया है। मुबारकपुर में बनने वाली रेशमी साड़ी को अपना ब्रांड नाम नहीं मिल सका है। उसके पास अपना बाजार ही नहीं है।-गुफरान अहमद, बुनकर कारोबारी।
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फोटो संख्या-- -
आज हाथकरघा पर पूरा परिवार मिलकर पांच सौ रुपये नहीं कमा पाता है। पावरलूम का और बुरा हाल है। वहां भी ढाई सौ से तीन सौ रुपये मजदूरी मिल पाती है। इस महंगाई के दौर में परिवार चलाना मुश्किल है।
हाजी बदरे आलम, बुनकर।
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फोटो संख्या-- -
मुबारकपुर के बुनकरों का हाल सुधारने के लिए सरकार को कार्ययोजना बनानी चाहिए। बिजली व जीएसटी में रियायत मिलनी चाहिए। सरकार इसे बढ़ावा देगी तभी पलायन पर अंकुश लगेगा और हुनर बचेगा।-इफ्तेखार अहमद मुनीम, बुनकर
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राजा मुबारकशाह के नाम पर बसा हुआ कस्बे में सन् 1971 से लेकर 1998 तक रेशमी साड़ी का कारोबार बुलंदी पर था। ढाई लाख हथकरघों पर कारीगार रात दिन काम करके भी बाजार की मांग को पूरी नहीं कर पाते थे। कस्बे के आसपास के गांवों में भी लोग बुनाई से जुड़े। एक अच्छा बुनकर बनने में समय लगता है। ऐसे में लोगों ने बच्चों को भी बुनकरी की कला सिखाना शुरू कर दिया था। स्कूल जाने की उम्र में ही बच्चे ताना-बाना का ककहरा पढ़ने लगते थे।
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बुनकर हथकरघा पर साड़ी तैयार कर शाम को उसे मंडी में बेंचकर अपना मुनाफा कमाते थे। मुबारकपुर में समृद्धि झलकती थी। सन् 1998 के बाद से यहां के कारोबार पर मंदी का साया मंडराने लगा। उसके बाद फिर व्यवसाय संकट से उबर नहीं पाया। क्षेत्र में पहले ढाई लाख हथकरघा हुआ करते थे जो घटकर 25 हजार तक हो गए हैं। इस बीच पावरलूम लगे लेकिन उनकी संख्या भी तीन हजार ही है।
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युवा पीढ़ी नहीं करना चाहती हथकरघा पर काम
अमिलो। पॉवरलूम की मशीन बिजली से चलती है लेकिन हथकरघा को हाथ और पांव के जोर पर चलाना पड़़ता है। इसमें बुनाई का काम धीमी गति से होता है। अधिक मेहनत करके भी उत्पादन कम ही होता है। इससे लागत बढ़ जाती है। पॉवरलूम पर वैसी ही डिजाइन की साड़ी कम कीमत में तैयार हो जाती है। हथकरघा काम कहीं ज्यादा बेहतर होता है। अब हैंडलूम की ब्रांडिंग होने लगी है और उसके लिए अधिक कीमत चुकाने वाले भी हैं। इसके बावजूद युवा पीढ़ी हथकरघा पर काम करने में कम ही रुचि ले रही है।
नहीं खुला विपणन केंद्र, बिजली की पड़ी मार
अमिलो। पहले पावरलूम को फिक्स दर से बिजली मिलती थी। अब स्मार्ट मीटर लगा दिए गए हैं। इससे बिजली का बिल चार से पांच गुना बढ़कर आने लगा है। सपा सरकार में मुबारकपुर में लगभग 12 करोड़ की लागत से विपणन केंद्र का निर्माण हुआ। इसमें 158 दुकाने हैं। तत्कालीन जिलाधिकारी प्रांजल यादव व अभिनेत्री शबाना आजमी ने इसके लिए प्रयास किया था। इसमें साप्ताहिक हाट लगाने की योजना थी ताकि व्यापारी आएं और बुनकरों को लाभ मिले। मगर अब तक इसे शुरू नहीं किया जा सका।
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मुबारकपुर में जब से मंडी खत्म हुई यहां का कारोबार सिमट गया। रेशम में रंग भरने वाले बुनकर अब होटल में जाकर बर्तन धो रहे हैं। कुछ जो काबिल हैं वे विदेश जाकर नौकरी करने को मजबूर हैं। - मुख्तार अहमद, बुनकर।
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फोटो संख्या
मुबारकपुर क्षेत्र में ढाई लाख हथकरघा हुआ करता था जो अब घट कर 25 हजार हो गया है। मुबारकपुर में बनने वाली रेशमी साड़ी को अपना ब्रांड नाम नहीं मिल सका है। उसके पास अपना बाजार ही नहीं है।-गुफरान अहमद, बुनकर कारोबारी।
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फोटो संख्या
आज हाथकरघा पर पूरा परिवार मिलकर पांच सौ रुपये नहीं कमा पाता है। पावरलूम का और बुरा हाल है। वहां भी ढाई सौ से तीन सौ रुपये मजदूरी मिल पाती है। इस महंगाई के दौर में परिवार चलाना मुश्किल है।
हाजी बदरे आलम, बुनकर।
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फोटो संख्या
मुबारकपुर के बुनकरों का हाल सुधारने के लिए सरकार को कार्ययोजना बनानी चाहिए। बिजली व जीएसटी में रियायत मिलनी चाहिए। सरकार इसे बढ़ावा देगी तभी पलायन पर अंकुश लगेगा और हुनर बचेगा।-इफ्तेखार अहमद मुनीम, बुनकर