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मुबारकपुर दंगा : उपद्रवियों ने तोड़ डाले थे शौचालय, हिंदुओं के घरों के दरवाजे खटखटाने पड़े थे

Thu, 19 Feb 2026 01:27 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 19 Feb 2026 01:27 AM IST
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Mubarakpur riots: Rioters destroyed toilets, forced to knock on doors of Hindu homes
आजमगढ़। मुबारकपुर में 27 साल पहले शिया-सुन्नी के बीच हुए दंगे के दरम्यान उपद्रवियों ने मुबाकरपुर में उत्पात मचाया था। उन्होंने पीड़ितों के घरों को तहस नहस कर दिया गया था। शौचालय तक तोड़ दिए थे। पीड़ित परिवारों को शौचालय का इस्तेमाल करने के लिए हिंदुओं के घरों के दरवाजे खटखटाने पड़े थे। इस मामले में अदालत ने 12 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। आजमगढ़ में फोटोजर्नलिस्ट रहे सूरज जायसवाल ने दंगों को नजदीक से देखा था। सूरज ने बताया कि कर्फ्यू के दौरान तत्कालीन यूपी सरकार के मंत्री रंगनाथ मिश्रा और तत्कालीन आबकारी राज्यमंत्री एवं क्षेत्रीय विधायक यशवंत सिंह ने दंगा क्षेत्र का भ्रमण किया था। मंत्री कई पीड़ितों से मिले थे। घोषित कर्फ्यू तो दो-तीन सप्ताह तक ही चला पर इसे एक महीने से अधिक तक बहाल रखा गया था। बसपा के बागी विधायक और तत्कालीन आबकारी मंत्री यशवंत सिंह को सीएम कल्याण सिंह ने मौके पर बने रहने को कहा था। दंगाग्रस्त क्षेत्र का हाल जानने मुबारकपुर पहुंचे सपा और बसपा के नेताओं को तत्कालीन डीएम रविन्द्र नाथ त्रिपाठी ने अंदर घुसने नहीं दिया था। बसपा के चंद्रदेव यादव के साथ आए सभी नेताओं को बैरियर पर रोक दिया गया था। उन्होंने पीड़ितों को राहत सामग्री बांटने की बात कही तो डीएम ने कहा कि हमें दे दीजिए वह बंटवा देंगे। इसी प्रकार डीएम ने रामदर्शन यादव के साथ आए सपा नेताओं को भी फरमान सुना दिया। वाराणसी से आए आईजी जोन ओपीएस मलिक ने घर-घर जाकर तबाही को मंजर देखा था जिसे उपद्रवियों ने नष्ट किया था।
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एसपी ने कहा था कि कोई हमला करे, सीधे गोली मार देना... यह मेरा आॅर्डर है

कर्फ्यू ग्रस्त मुबारकपुर से आई एक सूचना पर तत्कालीन एसपी कुंवर बृजेश सिंह को पुलिस लाइन की परेड को बीच छोड़ दिया था। वह भागकर मुबारकपुर गए थे। तब मोहल्ले में शिया परिवार को घेर कर वहां कुछ उपद्रवी हंगामा कर रहे थे। इसे लेकर तनाव और बढ़ गया था। फोर्स के साथ मौके पर पहुंचे एसपी ने परिवार को वहां से निकाला और तेज आवाज में कहा कि पीड़ितों पर अगर कोई हमला करे तो सीधे गोली मार देना यह मेरा आॅर्डर है। इतना सुन उपद्रवी सहम गए और पीड़ित परिवार को पुलिस ने सुरक्षित वहां से निकाला।
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रिश्तेदारों का खैर मकदम जानने को लोग थे बेचैन

प्रत्यक्षदर्शी रहे फोटोजर्नलिस्ट ने बताया कि जब दंगा हुआ था तब मोबाइल फोन नहीं था। मुस्लिम बस्ती के बीच हिंदू भी अपना आशियाना बनाए थे। लिहाजा, सगे-संबंधी कुशल क्षेम जानने के लिए परेशान थे। थाने के जरिये लोग रिश्तेदारों की जानकारी लेते थे। हालांकि यह दंगा शिया और सुन्नी के बीच होने के बाद किसी हिंदू परिवार को उपद्रवियों ने नहीं छेड़ा था।
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