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जुलाई के मध्य तक करें धान की रोपाई
azamgarh
Updated Thu, 08 Jun 2017 11:33 PM IST
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पवई विकास खंड में कृषि गोष्ठी को संबोधित करते भूमि संरक्षण अधिकारी संगम मौर्य।
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जिले के किसान जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के मध्य धान की रोपाई कर अधिक उत्पादन पा सकते हैं। किसानों को चाहिए कि वे विशेषज्ञों से सलाह लेकर तकनीकी ढंग से खेती करें। किसानों को यह सुझाव जिला कृषि अधिकारी बसंत कुमार दुबे ने दी है।उन्होेंने बताया कि जनपद के कुल आच्छादित क्षेत्रफल में 90 प्रतिशत धान का क्षेत्रफल है। जिसके कारण धान को जनपद की मुख्य फसल होने का श्रेय है। समय पर रोपाई कर किसान भरपूर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
इसके लिए उन्हें कृषि वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए उपायों का पालन करना होगा। उन्होंने बताया कि 130 से 140 दिन में पकने वाली धान की प्रजातियां रोपाई के माध्यम से खेती के लिए उपयुक्त होती हैं। रोपाई जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के मध्य तक अवश्य कर लेनी चाहिए अन्यथा उसके बाद 30 से 40 किग्रा प्रतिदिन प्रति हेक्टेअर की दर से उपज में कमी आती है। शीघ्र पकने वाली प्रजातियों की रोपाई जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के अंतिम सप्ताह तक की जा सकती है। अधिक उपज देने वाली सुगंधित किस्मों की रोपाई 15 जुलाई तक कर लेनी चाहिए।
सामान्यत: रोपाई के लिए 20 से 25 दिन की पौध उपयुक्त होती है लेकिन ऊसर भूमि में रोपाई के लिए 35 दिन की पौध का प्रयोग करते हैं और एक स्थान पर दो से तीन पौध लगाते हैं। लगभग 100 दिनों में पकने वाली प्रजातियों की मध्य जून से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक सीधी बुवाई भी की जा सकती है। 40-50 किग्रा बीज प्रति हेक्टेअर की दर से 20 सेमी की दूरी पर लाइनों में बुवाई की जा सकती है। यदि लेव लगाकर बुवाई करनी हो तो 100 से 120 किग्रा प्रति हेक्टेअर की दर से बीज का प्रयोग करते हैं। नर्सरी में खैरा रोग के लिए एक सुरक्षात्मक छिड़काव 5 किग्रा जिंक सल्फेट का 20 किग्रा यूरिया के साथ प्रयोग 10 और 20 दिन बाद करना चाहिए।
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सफेदा रोग के नियंत्रण हेतु 4 किग्रा फेरस सल्फेट का 20 किग्रा यूरिया के साथ प्रयोग करना चाहिए। झोंका रोग की रोकथाम के लिए 500 ग्राम कार्वेंडाजीम 50 प्रतिशत डब्ल्युपी का छिड़काव करना चाहिए। भूरा धब्बा रोग से बचने के लिए 2 किग्रा जिंक मैग्नीज कार्बामेट का प्रति हेक्टेअर की दर से छिड़काव करना चाहिए। नर्सरी में पानी का तापक्रम बढ़ने पर उसे निकाल कर पुन: भर देना चाहिए।
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इसके लिए उन्हें कृषि वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए उपायों का पालन करना होगा। उन्होंने बताया कि 130 से 140 दिन में पकने वाली धान की प्रजातियां रोपाई के माध्यम से खेती के लिए उपयुक्त होती हैं। रोपाई जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के मध्य तक अवश्य कर लेनी चाहिए अन्यथा उसके बाद 30 से 40 किग्रा प्रतिदिन प्रति हेक्टेअर की दर से उपज में कमी आती है। शीघ्र पकने वाली प्रजातियों की रोपाई जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के अंतिम सप्ताह तक की जा सकती है। अधिक उपज देने वाली सुगंधित किस्मों की रोपाई 15 जुलाई तक कर लेनी चाहिए।
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सामान्यत: रोपाई के लिए 20 से 25 दिन की पौध उपयुक्त होती है लेकिन ऊसर भूमि में रोपाई के लिए 35 दिन की पौध का प्रयोग करते हैं और एक स्थान पर दो से तीन पौध लगाते हैं। लगभग 100 दिनों में पकने वाली प्रजातियों की मध्य जून से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक सीधी बुवाई भी की जा सकती है। 40-50 किग्रा बीज प्रति हेक्टेअर की दर से 20 सेमी की दूरी पर लाइनों में बुवाई की जा सकती है। यदि लेव लगाकर बुवाई करनी हो तो 100 से 120 किग्रा प्रति हेक्टेअर की दर से बीज का प्रयोग करते हैं। नर्सरी में खैरा रोग के लिए एक सुरक्षात्मक छिड़काव 5 किग्रा जिंक सल्फेट का 20 किग्रा यूरिया के साथ प्रयोग 10 और 20 दिन बाद करना चाहिए।
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सफेदा रोग के नियंत्रण हेतु 4 किग्रा फेरस सल्फेट का 20 किग्रा यूरिया के साथ प्रयोग करना चाहिए। झोंका रोग की रोकथाम के लिए 500 ग्राम कार्वेंडाजीम 50 प्रतिशत डब्ल्युपी का छिड़काव करना चाहिए। भूरा धब्बा रोग से बचने के लिए 2 किग्रा जिंक मैग्नीज कार्बामेट का प्रति हेक्टेअर की दर से छिड़काव करना चाहिए। नर्सरी में पानी का तापक्रम बढ़ने पर उसे निकाल कर पुन: भर देना चाहिए।