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डायरिया का डर : घर छोड़कर सड़क पर आ गए सिंटू और विनीता के परिजन

Tue, 30 Sep 2025 01:51 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 30 Sep 2025 01:51 AM IST
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Fear of diarrhoea: Sintu and Vinita's family left their homes and took to the streets.
कौरागहनी गांव की मुसहर बस्ती में डायरिया से एक साथ तीन बच्चों की मौत से पूरा गांव दहशत में है। भयभीत लोग अपने बच्चों को लेकर सड़क किनारे शरण ले रहे हैं। डायरिया से मृत सिंटू और विनीता के पिता दिनेश ने बताया कि वह अपना घर छोड़कर बचे बच्चों कों लेकर बस्ती से बाहर निकल कर रोड पर जाकर शरण लिए है। मार्टीनगंज को शासन से नगर पंचायत का दर्जा तो मिल गया लेकिन यहां सुविधाएं गांव जैसी भी नहीं हैं। नियमित सफाई न होने से कौरागहनी गांव और उसके आसपास जलभराव और झाड़ी है। जगह-जगह गंदगी हैं। यहां के लोग आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी योजनाओं से वंचित हैं।
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मुसहर बस्ती में हालात बदतर हैं। यहां लोग कीचड़, जलभराव और बदबू के बीच जी रहे हैं। न पक्का रास्ता, न शौचालय, न स्वच्छ पानी मिलता है। यहां सिर्फ 20-25 फीट गहरे हैंडपंप हैं, जिनका दूषित पानी डायरिया का कारण बन रहा है। 1000 की आबादी वाली इस बस्ती के बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। स्कूल दो किलोमीटर दूर है। यहां के मरीजों को चारपाई पर लादकर करीब एक किलोमीटर दूर ले जाते हैं। क्योंकि एंबुलेंस तक पहुंच पाना असंभव है। इस गांव के लोग आज तक सरकारी योजनाएं जैसे जल जीवन मिशन, शौचालय योजना, आवास योजना सिर्फ कागजों तक सीमित हैं। बताया कि कौरागहनी गांव कोई बीमार पड़ता है तो मरीज को चारपाई पर या गोद में उठाकर एक किलोमीटर दूर ले जाना पड़ता है, क्योंकि वहां तक एंबुलेंस नहीं आ सकती। शारदा और सतिया ने बताया कि सरकारी अस्पताल मार्टीनगंज में इलाज महंगा पड़ता है। पहले एक पर्ची कटती है फिर बाहर से दवा लिखा जाता है। जिसकी कीमत करीब 700-1000 तक आती है। मजबूरी में प्राइवेट झोलाछाप से इलाज कराना पड़ता है।
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सरकार की योजनाओं से वंचित मुसहर बस्ती
फरिहा। स्वास्थ्य सेवाएं ही नहीं, बस्ती अब तक जल जीवन मिशन, शौचालय योजना, आवास योजना और पक्के रास्ते जैसी मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित है। यहां न तो कोई पानी की टंकी है, न शौचालय और न ही नालियों की कोई व्यवस्था। ना कभी हुआ था छिड़काव बच्चों की मौत के बाद छिड़काव का कार्यक्रम जारी किया गया है।
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बोले सभासद :
सभासद धर्मेंद्र यादव ने बताया कि उन्हें कार्यभार संभाले 18 महीने हुए हैं और रास्ता, शौचालय और आवास को कार्य योजना में डाला गया है। जल्द ही कार्य शुरू होगा, उन्होंने आश्वासन दिया। मुसहर बस्ती की यह त्रासदी सिर्फ एक बीमारी की कहानी नहीं, बल्कि दशकों की उपेक्षा, लापरवाही और सिस्टम की सुस्ती का आईना है। तीन बच्चों की जान चली गई, लेकिन क्या अब सरकार और प्रशासन की आंख खुलेगी? स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता और बुनियादी ढांचे से वंचित इस बस्ती को अब सिर्फ राहत नहीं, सम्मानजनक जीवन की जरूरत है।
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