कर्बला में शहीद हुए इमाम हुसैन और उनके साथियों के गम में दो महीने आठ दिन तक मातम मनाने के बाद रविवार को शिया समुदाय ने नौरोज को ईद-ए-जहरा के पर्व के रूप में मनाया। इस दौरान समुदाय के लोगों ने गम के प्रतीक काले कपड़ों को त्यागकर खुश रंग के कपड़े पहने। महिलाओं ने सुहाग की निशानी धारण कर शृंगार किया। घरों में विभिन्न प्रकार के पकवान बनाए गए और कई स्थानों पर जश्न का सिलसिला चलता रहा।
लोग एक-दूसरे के घर पहुंचे और नज्र चखी। साथ ही ईद-ए-जहरा की मुबारकबाद दी और मिठाइयां बांटीं। त्योहार की खुशियां मनाने के लिए विशेषकर लाल रंग के लिबास पहनने का सिलसिला रहा। घर-घर जाकर लोगों ने एक-दूसरे को पर्व की बधाई दी। मौलाना शकील फराज और मौलाना कमर अब्बास रिजवी ने बताया कि मुहर्रम का चांद दिखाई देते ही शिया समुदाय के लोगों ने काले वस्त्र धारण कर लिए थे। दो महीने आठ दिन तक समुदाय में किसी तरह की खुशी नहीं मनाई गई और न ही खुशी के कार्यक्रमों में लोग शामिल हुए। जिले में मातमी दौर का अंतिम बड़ा जुलूसे अमारी शिवली गांव, मुबारकपुर और समीपवर्ती बड़ा गांव बाजार में निकाला गया। उन्होंने बताया कि कर्बला में हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत के बाद उनके बीमार बेटे हजरत इमाम जैनुल आबदीन और बहन जनाब-ए-जैनब के चेहरों पर इसी दिन मुस्कुराहट आई थी। इसी वजह से शिया समुदाय में ईद-ए-जहरा का दिन विशेष महत्व रखता है।