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जिला कारागार में भी चल रही वर्चस्व की जंग

Thu, 13 Oct 2016 10:56 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/आजमगढ
अमर उजाला ब्यूरो/आजमगढ Updated Thu, 13 Oct 2016 10:56 PM IST
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 The ongoing battle for supremacy in district jail
jail
गोरखपुर जिला जेल में गुरुवार को बंदियों की बगावत के बाद प्रदेश की जेलों में बंदियों के बीच गुटबंदी और लचर सुरक्षा व्यवस्था पर फिर सवाल खड़ा हो गया है। जिला कारागार की बात करें तो यहां स्टाफ की कमी के चलते बंदियों के बीच गुटबंदी है। अगर वाराणसी और गोरखपुर जैसे हालात हुए तो उस पर काबू पाने की मुकम्मल व्यवस्था नहीं है। यदि समय और हालात को देखते हुए यहां की बदइंतजामी दूर नहीं हुईं तो कभी भी हालत गोरखपुर या वाराणसी जेल जैसे हो सकते हैं।
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वैसे तो जेल में वर्चस्व की जंग बहुत पहले से चल रही है लेकिन दो वर्ष पूर्व अमरजीत और सचिन पांडेय गुट के बीच हुई मारपीट ने इसे सार्वजनिक कर दिया। जेल के भीतर चल रही गतिविधियों को शांत कराने के उद्देश्य से ही तत्कालीन एसपी आकाश कुलहरि ने जेल में छापेमारी कर 54 मोबाइल बरामद किया। यह उस वक्त की सबसे बड़ी कार्रवाई रही। हालांकि एसपी ने बरामद मोबाइलों के कॉल डिटेल निकलवाकर उन लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की बात कही थी जिनसे अपराधी बातचीत करते थे। बाद में इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। वर्तमान समय में मंडल कारागार में बंदियों की क्षमता एक हजार से ऊपर है लेकिन इन्हें संभालने वाले अधिकारी और बंदी रक्षकों की संख्या काफी कम है।
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जेल प्रशासन के पास पर्याप्त स्टाफ न होने की वजह से बैरकों की सही ढंग से तलाशी नहीं हो पा रही, ना ही बंदियों के गतिविधियों की जानकारी अधिकारियों को मिल पा रही। जेल सूत्रों की मानें तो जेल में कई कुख्यात अपराधी बंद हैं, जो जेल में अपनी सत्ता चला रहे हैं। इसके चलते जेल में बंदियों के बीच आए दिन नोकझोंक होती रहती है। राजनीतिक पकड़ से मजबूत इन अपराधियों के विरुद्ध अधिकारी चाह कर भी कार्रवाई नहीं कर पा रहे। जेल की बदइंतजामी के चलते ही 18 अगस्त की शाम हत्या और लूटपाट के मामले में निरुद्ध तीन बंदी जेल की 22 फीट ऊंची दीवार गैस पाइप के सहारे लांघकर भाग गए थे। तीनों का अब तक कोई पता नहीं चला। पुलिस उन्हें ढूंढ रही है।
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