चरित्रवान से डरते हैं सभी :

Azamgarh Updated Mon, 07 May 2012 12:00 PM IST
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पवई। पवई के बिलवाई स्थित शिवधाम पर मानस कथा महोत्सव के दूसरे दिन काशी से पधारे मानस मर्मज्ञ डा. मदन मोहन मिश्र ने कहा कि निर्बल बलवान से डरता है, निर्धन धनवान से डरता है। मूर्ख विद्वानों से डरता है। लेकिन ये तीनों चरित्रवान से डरते हैं।
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उन्होंने कहा कि रावण बलवान इतना था कि चलता था तो पृथ्वी हिलती थी। धनवान इतना था कि स्वर्णमयी लंका नगरी उसके पास था, विद्वान भी था। लेकिन चरित्र न होने के कारण आज भी प्रत्येक वर्ष दशहरे को उसका पुतला जलाया जाता है। चरित्रवान न होने के कारण ब्राह्मण वंशीय रावण को राक्षस कहा जाता है जबकि निम्नकुलीय रविदास को चरित्रवान आचरणवान होने के कारण समाज में समादर मिल रहा है। जौनपुर से पधारे मानस दिनकर पं. दिनेश कुमार मिश्र ने कहा कि लूट कर खाना विकृति है,कमाकर खाना प्रकृति है, दिनकर जी ने कहा कि जैसे शेर व्यक्ति को खा जाता है, उसी तरह मूर्ख व्यक्तित्व को खा जाता है। मन भर ज्ञान से अच्छा है छटाक भर व्यक्तित्व। भगवान को जानना ज्ञान है और भगवान में खो जाना भक्ति है। प्रतापगढ़ से पधारे कथाकार पं. आशुतोष द्विवेदी ने बताया कि भगवान की कृपा मनुष्य पर निरंतर बरस रही है। लेकिन हमें उसकी अनुभूति नहीं होती है। सकारात्मक सोच व्यक्ति के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धी है और नाकारात्मक सोच सबसे बड़ा अभिशाप है, जोखिम में डाले बिना कोई महान नहीं बन सकता। मंच की अध्यक्षता भगवती प्रसाद दूबे और संचालन एनवी सिंह ने किया।
अंबारी। दीदारगंज स्थित शिवकाली मंदिर पर चल रहे दिव्य श्रीरामकथा में हवन-पूजन और मंडप परिक्रमा को भक्तों का सैलाब उमड़ रहा है। श्रीरामकथा के तीसरे दिन बाल व्यास ने श्री भरत लाल को प्रेम की प्रतिमूर्ति बताया।
बाल व्यास पं. कौशल किशोर जी महाराज ने कहा कि श्रीरामचरित मानस में श्री भरत लाल का चरित्र मातृत्व प्रेम के लिए उदात्त उदाहरण है। भगवान श्रीराम के वनगमन के बाद ननिहाल से लौटकर आए श्रीभरत लाल जी महाराज ने जब यह सुना कि मेरी मां कैकेयी ने प्रभु श्रीराम को वन दिया और मुझे अयोध्या का राजसिंहासन दिया तो कैकेयी के इस कृत्य की कठोर निंदा करते हुए श्रीभरत लाल ने धिक्कारते हुए कहा कि प्रभु को जंगल भेजकर और हमें राज्य देकर तुमने वह भूल की है जो अक्षम्य है। जैसे कोई पुष्पों, फलों युक्त वृक्ष को उसकी जड़ से अलग कर मूल भाग छोड़कर वृक्ष के फूल-पत्तियों को जल दें तो वृक्ष कभी हरा नहीं हो सकता, ठीक उसी प्रकार मेरे राम जी वृक्ष है मैं उस वृक्ष की शाखा हूं जैसे वृक्ष की जड़ कट जाने से वृक्ष सूखने लगता है। ठीक उसी प्रकार भगवान श्रीराम का चरण मेरे जीवन का आधार है। जैसे जल से विलग होने पर मछली का कोई अस्तित्व नहीं रहता है। ठीक वैसे ही मेरे जीवन का प्रभु से विलग कोई महत्व नहीं है। मैं राज्य का वरण नहीं। प्रभु शरण और चरण का अनुसरण करूंगा। इस मौके पर निर्भय गाजीपुरी, सिधारी विश्वकर्मा, हरेंद्र पाठक, राजाराम उपाध्याय, सुखराम यादव, ओमकार, धीरेंद्र यादव आदि उपस्थित थे।
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