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Ayodhya News: अक्षय तृतीया पर तीर्थंकर को अर्पित किया आहार
Wed, 30 Apr 2025 10:34 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Wed, 30 Apr 2025 10:34 PM IST
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अयोध्या। अक्षय तृतीया का पर्व जैन धर्म में भी धूमधाम से मनाया जाता है। इसी क्रम में अक्षय तृतीया पर बुधवार को जैन मंदिर रायगंज में तीर्थंकर भगवान को आहार अर्पित किया गया। इसके बाद मौजूद श्रद्धालुओं को भी प्रसाद वितरित किया गया। सुबह तीर्थंकर का अभिषेक पूजन हुआ। देर शाम महाआरती का भव्य आयोजन हुआ।
जैन मंदिर के पीठाधीश स्वामी रवींद्र कीर्ति ने बताया कि जैन परंपरा के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में अयोध्या के राजा नाभिराय के पुत्र के रूप में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का जन्म हुआ। ऋषभदेव ने पिता के बाद अयोध्या का राज्यभार संभाला, पर कुछ समय बाद उनका सांसारिकता से मोहभांग हुआ। उन्होंने जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर उपवास के साथ कठिन तपस्या शुरू की और एक वर्ष 39 दिन बाद उन्होंने पहली बार बैशाख शुक्ल तृतीया के दिन आहार ग्रहण किया। इसी उपलक्ष्य में अक्षय तृतीया का पर्व जैन समाज धूमधाम से मनाते हैं।
स्वामी रवींद्र कीर्ति ने कहा कि यह दिन केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक युग प्रवर्तन का प्रतीक है। यह वह दिन है, जब दान की परंपरा ने आकार लिया, जब मौन ने दिशा दी और जब एक राजा के हाथों ‘अक्षय पुण्य’ का बीजारोपण हुआ। यह दिन हमें न केवल पुण्य करने की प्रेरणा देता है, बल्कि यह भी सिखाता है कि सच्चा दान, श्रद्धा और समर्पण से ही सिद्ध होता है।
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जैन मंदिर के पीठाधीश स्वामी रवींद्र कीर्ति ने बताया कि जैन परंपरा के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में अयोध्या के राजा नाभिराय के पुत्र के रूप में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का जन्म हुआ। ऋषभदेव ने पिता के बाद अयोध्या का राज्यभार संभाला, पर कुछ समय बाद उनका सांसारिकता से मोहभांग हुआ। उन्होंने जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर उपवास के साथ कठिन तपस्या शुरू की और एक वर्ष 39 दिन बाद उन्होंने पहली बार बैशाख शुक्ल तृतीया के दिन आहार ग्रहण किया। इसी उपलक्ष्य में अक्षय तृतीया का पर्व जैन समाज धूमधाम से मनाते हैं।
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स्वामी रवींद्र कीर्ति ने कहा कि यह दिन केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक युग प्रवर्तन का प्रतीक है। यह वह दिन है, जब दान की परंपरा ने आकार लिया, जब मौन ने दिशा दी और जब एक राजा के हाथों ‘अक्षय पुण्य’ का बीजारोपण हुआ। यह दिन हमें न केवल पुण्य करने की प्रेरणा देता है, बल्कि यह भी सिखाता है कि सच्चा दान, श्रद्धा और समर्पण से ही सिद्ध होता है।
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