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Ayodhya News: 2007 में आखिरी बार अयोध्या आए थे बशीर बद्र
Fri, 29 May 2026 09:24 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Fri, 29 May 2026 09:24 PM IST
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कवि सम्मेलन व मुशायरे में बशीर बद्र ने की थी शिरकत।
अयोध्या। शायर डॉ बशीर बद्र के निधन की खबर से अयोध्या के साहित्य जगत में भी शोक की लहर है। यहां के साहित्यकारों का मानना है कि शायरी जगत में उन सा कोई नहीं था।
डॉ. उर्फी बताते हैं कि जब 1971 में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में मेडिकल में दाखिला हुआ तभी से उनका संपर्क था। वह पान वाली कोठी के एक कमरे में रहते थे। अक्सर शमशाद मार्केट में अड़ी लगती थी। उन्होंने बताया कि बात 2007 की है। फैजाबाद में वह पांच जून को मुशायरा करा रहे थे। इसमें उन्होंने बशीर साहब का नाम पोस्टर में डाल दिया था। जब बशीर साहब को कार्यक्रम की जानकारी दी तो उन्होंने मना कर दिया। कई बार आग्रह के बाद भी वह नहीं माने।
डॉ. उर्फी के अनुसार, फिर उन्होंने बशीर साहब की पत्नी राहत बद्र से संपर्क साधा जो उनकी रिश्तेदार हैं। कई बार कहने के बाद वो बोलीं, कोशिश करती हूं। कुछ दिनों बाद बशीर साहब का फोन आया, आपने मेरे घर में सेंध लगा दी। राहत ने रिजर्वेशन कराने के बाद मुझे कार्यक्रम की जानकारी दी।
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डॉ उर्फी के अनुसार, 2007 में फैजाबाद का मुशायरा शायद उनका आखिरी मुशायरा था। वह सपत्नीक आए और उनके घर पर ठहरे। बशीर साहब की बहन सईदा बेगम भी पुरानी सब्जी मंडी में रहती थीं। उनके यहां केवल एक कमरे थे। इस वजह से वे बहन से मिलने जब भी आते थे तो उनके यहां ही रहते थे और कई कई दिन तक रहते थे। उनकी शायरी बेजोड़ थी।
शायरी में पूरे समाज का आईना
साहित्य में रुचि रखने वाले पूर्व एमएलए जयशंकर पांडेय का कहना है कि बशीर बद्र की शायरी का कोई जोड़ नहीं है। उनकी शायरी में पूरे समाज का आईना रहता था। मुशायरे में अक्सर उन्हें सुनने का मौका मिला। वह गंगा-जमुनी तहजीब के हिमायती थे। साहित्यकार सूर्यकांत पांडेय का कहना है कि जब वह यहां से गए तो फिर लौटकर नहीं देखा। मुशायरे के सिलसिले में ही उनका यहां आना जाना होता रहा है। वह तीन भाई थे। वह शायरी गद्य में पढ़ते थे और उनकी शायरी में सामाजिक परिवेश का पुट रहता था।
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डॉ. उर्फी बताते हैं कि जब 1971 में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में मेडिकल में दाखिला हुआ तभी से उनका संपर्क था। वह पान वाली कोठी के एक कमरे में रहते थे। अक्सर शमशाद मार्केट में अड़ी लगती थी। उन्होंने बताया कि बात 2007 की है। फैजाबाद में वह पांच जून को मुशायरा करा रहे थे। इसमें उन्होंने बशीर साहब का नाम पोस्टर में डाल दिया था। जब बशीर साहब को कार्यक्रम की जानकारी दी तो उन्होंने मना कर दिया। कई बार आग्रह के बाद भी वह नहीं माने।
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डॉ. उर्फी के अनुसार, फिर उन्होंने बशीर साहब की पत्नी राहत बद्र से संपर्क साधा जो उनकी रिश्तेदार हैं। कई बार कहने के बाद वो बोलीं, कोशिश करती हूं। कुछ दिनों बाद बशीर साहब का फोन आया, आपने मेरे घर में सेंध लगा दी। राहत ने रिजर्वेशन कराने के बाद मुझे कार्यक्रम की जानकारी दी।
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डॉ उर्फी के अनुसार, 2007 में फैजाबाद का मुशायरा शायद उनका आखिरी मुशायरा था। वह सपत्नीक आए और उनके घर पर ठहरे। बशीर साहब की बहन सईदा बेगम भी पुरानी सब्जी मंडी में रहती थीं। उनके यहां केवल एक कमरे थे। इस वजह से वे बहन से मिलने जब भी आते थे तो उनके यहां ही रहते थे और कई कई दिन तक रहते थे। उनकी शायरी बेजोड़ थी।
शायरी में पूरे समाज का आईना
साहित्य में रुचि रखने वाले पूर्व एमएलए जयशंकर पांडेय का कहना है कि बशीर बद्र की शायरी का कोई जोड़ नहीं है। उनकी शायरी में पूरे समाज का आईना रहता था। मुशायरे में अक्सर उन्हें सुनने का मौका मिला। वह गंगा-जमुनी तहजीब के हिमायती थे। साहित्यकार सूर्यकांत पांडेय का कहना है कि जब वह यहां से गए तो फिर लौटकर नहीं देखा। मुशायरे के सिलसिले में ही उनका यहां आना जाना होता रहा है। वह तीन भाई थे। वह शायरी गद्य में पढ़ते थे और उनकी शायरी में सामाजिक परिवेश का पुट रहता था।