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Auraiya News: आज के दिन ही सदर तहसील में उतारा था यूनियन जैक
Wed, 12 Aug 2026 12:44 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
Updated Wed, 12 Aug 2026 12:44 AM IST
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बल्दू पहलवान। फाइल फोटो
औरैया। 12 अगस्त 1942 को औरैया सदर तहसील में क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराया था। यह दिन औरैया जिले के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। इस साहसिक आंदोलन में छह क्रांतिकारी शहीद हुए और 50 से अधिक घायल हुए थे। आंदोलन की कमान संभालने वाली तिकड़ी में बल्देव प्रसाद उर्फ बल्दू पहलवान की भूमिका बेहद अहम थी।
सौरभ गुप्ता के अनुसार, उनके परबाबा बल्देव प्रसाद उर्फ बल्दू पहलवान ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई थी। महात्मा गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ो आह्वान पर यह घटना हुई थी। आधा दर्जन छात्रों और नौजवानों ने ब्रिटिश यूनियन जैक उतारा था। इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने आंदोलनकारियों पर दमनचक्र चलाया था।
बल्दू पहलवान, छक्कीलाल दुबे और हाफिज करीम इस आंदोलन की अगुवाई करने वाली तिकड़ी में शामिल थे। बल्दू पहलवान इस तिकड़ी की अहम कड़ी माने जाते थे। उनका जन्म वर्ष 1886 में औरैया के सनावली गढ़िया गांव में हुआ था। बचपन से ही उनमें अन्याय के खिलाफ लड़ने की भावना थी।
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स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी
बल्दू पहलवान बचपन से अन्याय के खिलाफ लड़ने की भावना रखते थे और लोगों की जान-माल की रक्षा करते थे। बाद में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने जालौन, कानपुर, फर्रुखाबाद और कन्नौज समेत कई गांवों में जनसभाएं कीं। इन जनसभाओं के माध्यम से उन्होंने लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ जागरूक किया। वर्ष 1930 के लगानबंदी आंदोलन में भाग लेने पर उनकी 14 बीघा जमीन जब्त हुई थी। उन्हें छह माह का कठोर कारावास और आर्थिक दंड भी भुगतना पड़ा था।
पहलवान के रूप में पहचान
सौरभ गुप्ता के अनुसार, बल्दू पहलवान अपने समय के नामी पहलवानों में गिने जाते थे। अखाड़े में उनके सामने कोई पहलवान अधिक देर तक नहीं टिक पाता था। दंगलों में उन्हें सबसे पहले उतारा जाता था। उन्होंने लगभग 75 बड़ी कुश्तियां लड़ीं और कोई भी कुश्ती नहीं हारे। कुश्तियों में मिलने वाला इनाम वह गरीबों और जरूरतमंदों में बांट देते थे। करीब 80 वर्ष की आयु तक वह विभिन्न दंगलों में निर्णायक की भूमिका निभाते रहे।
86 वर्ष की आयु में हुआ निधन
बल्दू पहलवान का संपर्क काकोरी कांड के नायक मुकुंदीलाल से भी था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान दोनों के बीच सहयोगात्मक संबंध बने रहे। देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले बल्दू पहलवान ने अपना पूरा जीवन राष्ट्र सेवा को समर्पित कर दिया था। उन्होंने निस्वार्थ भाव से समाज और देश की सेवा की। मार्च 1971 में 86 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था।
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सौरभ गुप्ता के अनुसार, उनके परबाबा बल्देव प्रसाद उर्फ बल्दू पहलवान ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई थी। महात्मा गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ो आह्वान पर यह घटना हुई थी। आधा दर्जन छात्रों और नौजवानों ने ब्रिटिश यूनियन जैक उतारा था। इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने आंदोलनकारियों पर दमनचक्र चलाया था।
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बल्दू पहलवान, छक्कीलाल दुबे और हाफिज करीम इस आंदोलन की अगुवाई करने वाली तिकड़ी में शामिल थे। बल्दू पहलवान इस तिकड़ी की अहम कड़ी माने जाते थे। उनका जन्म वर्ष 1886 में औरैया के सनावली गढ़िया गांव में हुआ था। बचपन से ही उनमें अन्याय के खिलाफ लड़ने की भावना थी।
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स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी
बल्दू पहलवान बचपन से अन्याय के खिलाफ लड़ने की भावना रखते थे और लोगों की जान-माल की रक्षा करते थे। बाद में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने जालौन, कानपुर, फर्रुखाबाद और कन्नौज समेत कई गांवों में जनसभाएं कीं। इन जनसभाओं के माध्यम से उन्होंने लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ जागरूक किया। वर्ष 1930 के लगानबंदी आंदोलन में भाग लेने पर उनकी 14 बीघा जमीन जब्त हुई थी। उन्हें छह माह का कठोर कारावास और आर्थिक दंड भी भुगतना पड़ा था।
पहलवान के रूप में पहचान
सौरभ गुप्ता के अनुसार, बल्दू पहलवान अपने समय के नामी पहलवानों में गिने जाते थे। अखाड़े में उनके सामने कोई पहलवान अधिक देर तक नहीं टिक पाता था। दंगलों में उन्हें सबसे पहले उतारा जाता था। उन्होंने लगभग 75 बड़ी कुश्तियां लड़ीं और कोई भी कुश्ती नहीं हारे। कुश्तियों में मिलने वाला इनाम वह गरीबों और जरूरतमंदों में बांट देते थे। करीब 80 वर्ष की आयु तक वह विभिन्न दंगलों में निर्णायक की भूमिका निभाते रहे।
86 वर्ष की आयु में हुआ निधन
बल्दू पहलवान का संपर्क काकोरी कांड के नायक मुकुंदीलाल से भी था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान दोनों के बीच सहयोगात्मक संबंध बने रहे। देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले बल्दू पहलवान ने अपना पूरा जीवन राष्ट्र सेवा को समर्पित कर दिया था। उन्होंने निस्वार्थ भाव से समाज और देश की सेवा की। मार्च 1971 में 86 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था।

बल्दू पहलवान। फाइल फोटो