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Auraiya News: मरीजों की थाली से रिस रहे मानक
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औरैया। मेडिकल कॉलेज के लेबर रूम से लेकर सामान्य वार्ड तक इन दिनों मरीजों से भरे हैं। ऐसे में मरीजों और उनके तीमारदारों को मिलने वाले भोजन की व्यवस्था सवालों के घेरे में आ गई है। नाश्ता और खाना बनाने वाली कंपनी के कर्मचारी नियमों के विपरीत भोजन तैयार कर मरीजों को परोस रहे हैं। शुक्रवार को सुबह नाश्ते में चाय-बिस्कुट और दोपहर में पत्तल में खाना दिया गया। सब्जी रिसने से चादर खराब हो गई। वहीं, खाद्य सुरक्षा विभाग की जांच में खाना बनाने और परोसने वाले महिला-पुरुष कर्मचारियों के मेडिकल प्रमाणपत्र भी नहीं मिले। विभाग ने कंपनी के ठेकेदार को 14 दिन में प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने का नोटिस दिया है। तय समय में प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं कराने पर ठेकेदार के खिलाफ एडीएम कोर्ट में धारा-58 के तहत वाद दर्ज कराया जाएगा।
जिले में स्वास्थ्य सेवाओं के लिहाज से मेडिकल कॉलेज बड़ा केंद्र है। यहां रोजाना की ओपीडी दो हजार के पार पहुंच चुकी है। इन दिनों वायरल फीवर के चलते 60 से अधिक मरीज भी भर्ती हैं। लेबर रूम और सामान्य वार्डों में भर्ती मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए तीन पहर भोजन की व्यवस्था की जाती है। इसके लिए ठेकेदारी व्यवस्था लागू है और हर बेड तक खाना पहुंचाया जाता है।
शुक्रवार को सुबह मरीजों को नाश्ते में चाय और बिस्कुट दिया गया, जबकि दोपहर में पत्तल में खाना परोसा गया। लेबर रूम में भर्ती महिलाओं के लिए चाय-बिस्कुट कितना पौष्टिक है, इसे डॉक्टर और मेडिकल कॉलेज के अधिकारी बखूबी जानते हैं। इसके अलावा पत्तल से सब्जी रिस-रिसकर नीचे गिरती दिखाई दी। खास बात यह है कि मरीजों की सेहत का ख्याल रखने वाले मेडिकल कॉलेज में ही खाना बनाने की प्रक्रिया में लापरवाही बरती जा रही है।
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इसका खुलासा 30 सितंबर को खाद्य सुरक्षा विभाग की ओर से की गई जांच में हुआ। खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने ठेकेदार से खाना बनाने वाली महिला और पुरुष कर्मचारियों के मेडिकल प्रमाणपत्र मांगे, लेकिन वह इन्हें उपलब्ध नहीं करा सके। इस पर विभाग ने 14 दिन का समय दिया है। समय के भीतर प्रमाणपत्र उपलब्ध न कराने की स्थिति में ठेकेदार के खिलाफ वाद दर्ज कराया जाएगा।
मेडिकल कॉलेज के वार्ड में भर्ती कई मरीजों के तीमारदार भोजन की गुणवत्ता को लेकर खुलकर सामने नहीं आए, लेकिन दबी जुबान में उन्होंने अपनी परेशानी बताई। उनका कहना है कि मरीजों को सुबह खिचड़ी और दलिया दिया जाना चाहिए, जबकि चाय-बिस्कुट दिया जाता है। ऐसे में हल्का भोजन घर से मंगाना पड़ता है। कई बार बाहर होटल से भी रुपये देकर दलिया और खिचड़ी खरीदनी पड़ती है। तीमारदारों के अनुसार मनमाने मेन्यू की वजह से भोजन का इंतजाम प्रभावित है।
मरीजों को भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था में कागजी रिकॉर्ड पर भी जोर दिया जाता है। वार्ड से लेकर इमरजेंसी तक प्रभारी की पटल पर डाइट को लेकर बाकायदा रजिस्टर रहता है। इसमें रोजाना मरीजों को दिए जाने वाले भोजन की फीडिंग की जाती है। इसके बाद इसी रिकॉर्ड के आधार पर ठेकेदार को प्रति मरीज 85.50 रुपये का भुगतान किया जाता है।
वर्जन
शासन के निर्देश पर 30 सितंबर को मेडिकल कॉलेज की कैंटीन का निरीक्षण किया गया था। जांच के दौरान खाने में प्रयोग होने वाले पानी, कीटनाशक के छिड़काव, साफ-सफाई शेड्यूल और खाना बनाने व परोसने वाले कर्मियों के मेडिकल प्रमाणपत्र नहीं मिले। उन्होंने बताया कि ये तीनों जांच हर छह माह में होनी चाहिए। ठेकेदार ने इन तीनों बिंदुओं पर कोई ब्योरा उपलब्ध नहीं कराया है। उसे 14 दिन का समय दिया गया है। समय पूरा होने के बाद एडीएम कोर्ट में धारा-58 के तहत वाद दर्ज कराया जाएगा। खाने की सैंपलिंग भी कराई जाएगी। -विजय कुमार, खाद्य सुरक्षा अधिकारी
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मेडिकल कॉलेज हो या अन्य कोई कैंटीन, सभी पर नजर रखी जा रही है। मेडिकल कॉलेज के पहले के सैंपलों की रिपोर्ट लंबित हो सकती है, क्योंकि प्रयोगशाला से रिपोर्ट आने में देरी हो जाती है। - सुनील कुमार, सहायक आयुक्त खाद्य
फोटो-17 : शिवराज सिंह
शिवराज सिंह, पुरवा कुडरी सहायल ने बताया कि वह 10 सितंबर से वार्ड में भर्ती हैं। सुबह नाश्ते में चाय-बिस्कुट दिया गया। दोपहर में राजमा, आलू-मटर-टमाटर की सब्जी और चार रोटी मिली हैं।
फोटो-16 : मलिहान सिंह
मलिहान सिंह, मिश्रीपुर अछल्दा ने बताया कि वह 27 सितंबर से अस्पताल में भर्ती हैं। तीनों समय मिलने वाले आहार की गुणवत्ता का उन्हें पता नहीं है। सुबह नाश्ते में चाय और बिस्कुट तथा दोपहर में सब्जी-रोटी मिली है।
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जिले में स्वास्थ्य सेवाओं के लिहाज से मेडिकल कॉलेज बड़ा केंद्र है। यहां रोजाना की ओपीडी दो हजार के पार पहुंच चुकी है। इन दिनों वायरल फीवर के चलते 60 से अधिक मरीज भी भर्ती हैं। लेबर रूम और सामान्य वार्डों में भर्ती मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए तीन पहर भोजन की व्यवस्था की जाती है। इसके लिए ठेकेदारी व्यवस्था लागू है और हर बेड तक खाना पहुंचाया जाता है।
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शुक्रवार को सुबह मरीजों को नाश्ते में चाय और बिस्कुट दिया गया, जबकि दोपहर में पत्तल में खाना परोसा गया। लेबर रूम में भर्ती महिलाओं के लिए चाय-बिस्कुट कितना पौष्टिक है, इसे डॉक्टर और मेडिकल कॉलेज के अधिकारी बखूबी जानते हैं। इसके अलावा पत्तल से सब्जी रिस-रिसकर नीचे गिरती दिखाई दी। खास बात यह है कि मरीजों की सेहत का ख्याल रखने वाले मेडिकल कॉलेज में ही खाना बनाने की प्रक्रिया में लापरवाही बरती जा रही है।
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इसका खुलासा 30 सितंबर को खाद्य सुरक्षा विभाग की ओर से की गई जांच में हुआ। खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने ठेकेदार से खाना बनाने वाली महिला और पुरुष कर्मचारियों के मेडिकल प्रमाणपत्र मांगे, लेकिन वह इन्हें उपलब्ध नहीं करा सके। इस पर विभाग ने 14 दिन का समय दिया है। समय के भीतर प्रमाणपत्र उपलब्ध न कराने की स्थिति में ठेकेदार के खिलाफ वाद दर्ज कराया जाएगा।
मेडिकल कॉलेज के वार्ड में भर्ती कई मरीजों के तीमारदार भोजन की गुणवत्ता को लेकर खुलकर सामने नहीं आए, लेकिन दबी जुबान में उन्होंने अपनी परेशानी बताई। उनका कहना है कि मरीजों को सुबह खिचड़ी और दलिया दिया जाना चाहिए, जबकि चाय-बिस्कुट दिया जाता है। ऐसे में हल्का भोजन घर से मंगाना पड़ता है। कई बार बाहर होटल से भी रुपये देकर दलिया और खिचड़ी खरीदनी पड़ती है। तीमारदारों के अनुसार मनमाने मेन्यू की वजह से भोजन का इंतजाम प्रभावित है।
मरीजों को भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था में कागजी रिकॉर्ड पर भी जोर दिया जाता है। वार्ड से लेकर इमरजेंसी तक प्रभारी की पटल पर डाइट को लेकर बाकायदा रजिस्टर रहता है। इसमें रोजाना मरीजों को दिए जाने वाले भोजन की फीडिंग की जाती है। इसके बाद इसी रिकॉर्ड के आधार पर ठेकेदार को प्रति मरीज 85.50 रुपये का भुगतान किया जाता है।
वर्जन
शासन के निर्देश पर 30 सितंबर को मेडिकल कॉलेज की कैंटीन का निरीक्षण किया गया था। जांच के दौरान खाने में प्रयोग होने वाले पानी, कीटनाशक के छिड़काव, साफ-सफाई शेड्यूल और खाना बनाने व परोसने वाले कर्मियों के मेडिकल प्रमाणपत्र नहीं मिले। उन्होंने बताया कि ये तीनों जांच हर छह माह में होनी चाहिए। ठेकेदार ने इन तीनों बिंदुओं पर कोई ब्योरा उपलब्ध नहीं कराया है। उसे 14 दिन का समय दिया गया है। समय पूरा होने के बाद एडीएम कोर्ट में धारा-58 के तहत वाद दर्ज कराया जाएगा। खाने की सैंपलिंग भी कराई जाएगी। -विजय कुमार, खाद्य सुरक्षा अधिकारी
मेडिकल कॉलेज हो या अन्य कोई कैंटीन, सभी पर नजर रखी जा रही है। मेडिकल कॉलेज के पहले के सैंपलों की रिपोर्ट लंबित हो सकती है, क्योंकि प्रयोगशाला से रिपोर्ट आने में देरी हो जाती है। - सुनील कुमार, सहायक आयुक्त खाद्य
फोटो-17 : शिवराज सिंह
शिवराज सिंह, पुरवा कुडरी सहायल ने बताया कि वह 10 सितंबर से वार्ड में भर्ती हैं। सुबह नाश्ते में चाय-बिस्कुट दिया गया। दोपहर में राजमा, आलू-मटर-टमाटर की सब्जी और चार रोटी मिली हैं।
फोटो-16 : मलिहान सिंह
मलिहान सिंह, मिश्रीपुर अछल्दा ने बताया कि वह 27 सितंबर से अस्पताल में भर्ती हैं। तीनों समय मिलने वाले आहार की गुणवत्ता का उन्हें पता नहीं है। सुबह नाश्ते में चाय और बिस्कुट तथा दोपहर में सब्जी-रोटी मिली है।