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Auraiya News: पितृपक्ष आज से, पितरों को समर्पित रहेंगे 15 दिन
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वीरेंद्र मोहन शुक्ला
औरैया। आज से पितृपक्ष शुरू हो गए हैं। यह समय पितरों के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म के लिए विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष में पूर्वज पृथ्वी लोक पर आकर अपने वंशजों पर कृपा बरसाते हैं।
पितरों की आत्मशांति और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विधि-विधान से श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। इस दौरान पूरे 15 दिनों तक कई नियमों का विशेष रूप से पालन करने की मान्यता है। श्राद्धपक्ष का समय अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का होता है। इसलिए इस दौरान सात्विक भोजन करने के साथ पंचबली का भी ध्यान रखा जाता है। आचार्य वीरेंद्र मोहन शुक्ला ने बताया कि शुक्रवार से शुरू हो रहे श्राद्ध का विशेष महत्व है। इन 15 दिनों में कोई शुभ कार्य नहीं होते हैं, लेकिन पूर्वजों के तर्पण, पिंडदान, दान और श्राद्ध कर्म से ये दिन विशेष बन जाते हैं। विधि-विधान से किए गए कर्मों से पितरों को शांति मिलती है और परिवार में खुशियां बनी रहती हैं।
पितृपक्ष के दौरान बाल और नाखून काटने से बचना चाहिए। यह नकारात्मकता और दोष को बढ़ा सकता है। श्राद्ध पक्ष में खरीदारी, बड़ी धार्मिक यात्राएं और नए मांगलिक कार्य करने से बचने की परंपरा है। इसके अलावा, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्यों के साथ कोई नई शुरुआत करने से भी बचना चाहिए।
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आचार्य मनोज अवस्थी ने बताया कि पितृपक्ष के दौरान भोजन में सात्विकता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। पितृपक्ष में भोजन का पहला हिस्सा गाय, कुत्ते, कौवे, देवता और चीटियों के लिए निकालना चाहिए, इसे पंचग्रास कहा जाता है। ऐसा करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
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पितरों की आत्मशांति और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विधि-विधान से श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। इस दौरान पूरे 15 दिनों तक कई नियमों का विशेष रूप से पालन करने की मान्यता है। श्राद्धपक्ष का समय अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का होता है। इसलिए इस दौरान सात्विक भोजन करने के साथ पंचबली का भी ध्यान रखा जाता है। आचार्य वीरेंद्र मोहन शुक्ला ने बताया कि शुक्रवार से शुरू हो रहे श्राद्ध का विशेष महत्व है। इन 15 दिनों में कोई शुभ कार्य नहीं होते हैं, लेकिन पूर्वजों के तर्पण, पिंडदान, दान और श्राद्ध कर्म से ये दिन विशेष बन जाते हैं। विधि-विधान से किए गए कर्मों से पितरों को शांति मिलती है और परिवार में खुशियां बनी रहती हैं।
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पितृपक्ष के दौरान बाल और नाखून काटने से बचना चाहिए। यह नकारात्मकता और दोष को बढ़ा सकता है। श्राद्ध पक्ष में खरीदारी, बड़ी धार्मिक यात्राएं और नए मांगलिक कार्य करने से बचने की परंपरा है। इसके अलावा, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्यों के साथ कोई नई शुरुआत करने से भी बचना चाहिए।
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आचार्य मनोज अवस्थी ने बताया कि पितृपक्ष के दौरान भोजन में सात्विकता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। पितृपक्ष में भोजन का पहला हिस्सा गाय, कुत्ते, कौवे, देवता और चीटियों के लिए निकालना चाहिए, इसे पंचग्रास कहा जाता है। ऐसा करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

वीरेंद्र मोहन शुक्ला