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भगवान गणेश की वंदना के बिना नहीं मिलती है सफलता
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प्रवचन के दौरान मौजूद श्रोताओं की भीड़
- फोटो : AURAIYA
संवाद न्यूज एजेंसी
औरैया। बिधूना क्षेत्र के गांव भटौली में आयोजित श्रीमद्भागवत ज्ञान सप्ताह के दौरान आचार्य ने भगवान के विभिन्न अवतारों की कथा सुनाई। कथावाचक ने कहा कि गजानन की वंदना सफलता का मार्ग खोलती है।
रविवार को कथावाचक पंडित केशवम अवस्थी जी महाराज ने समुद्र मंथन की कथा सुनाई। कहा भगवान ने कच्छप का अवतार लिया एवं अपने ऊपर मथनी रखी। समुद्र मंथन के समय गणेश जी की प्रार्थना की गई। मंथन में 14 रत्न की प्राप्ति हुई थी। सबसे पहले हलाहल विष निकला, जिससे सभी देव एवं असुर डर गए। तब उन्होंने भगवान शंकर को पुकारा। भगवान शंकर ने उक्त विषको को ग्रहण किया एवं विष को गले में संग्रहित रखा। तभी से भगवान शंकर नीलकंठ कहलाए। समुद्र मंथन से लक्ष्मी, ऐरावत हाथी, कोस्तु मणी, परिजात, धनवंतरी, चंद्रमा, कामधेनु, धनुष आदि रत्न का प्रादुर्भाव हुआ। सबसे अंत में अमृत का प्रादुर्भाव हुआ। कहा कि दूब घास अमृत की देन है, इसलिए यह अमृत के समान पवित्र है। अमृत के लिए देव एवं असुर को आपस में लड़ता देख भगवान ने मोहिनी का अवतार लिया और देवों को अमृत पान कराया। इससे असुर क्रोधित होकर देवों पर आक्रमण कर दिए एवं स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। भगवान ने अदिति की कोख से वामन के रूप में जन्म लिया। जो भगवान का वामन अवतार कहलाया। भगवान ने वामन रूप धारण कर राक्षसों के राजा बलि से तीन कदम की जमीन दान में मांगी। दानवीर बलि ने वामन द्वारा मांगे गए दान को स्वीकार किया तब वामन भगवान ने तीन कदम में पूरी सृृष्टि को नाप लिया। राजा बलि भगवान की लीला से प्रभावित हुए एवं इंद्रलोक को मुक्त किया। कथा के दौरान भजन मंडली द्वारा सुंदर भजनों की भी प्रस्तुति की गयी। कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।
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औरैया। बिधूना क्षेत्र के गांव भटौली में आयोजित श्रीमद्भागवत ज्ञान सप्ताह के दौरान आचार्य ने भगवान के विभिन्न अवतारों की कथा सुनाई। कथावाचक ने कहा कि गजानन की वंदना सफलता का मार्ग खोलती है।
रविवार को कथावाचक पंडित केशवम अवस्थी जी महाराज ने समुद्र मंथन की कथा सुनाई। कहा भगवान ने कच्छप का अवतार लिया एवं अपने ऊपर मथनी रखी। समुद्र मंथन के समय गणेश जी की प्रार्थना की गई। मंथन में 14 रत्न की प्राप्ति हुई थी। सबसे पहले हलाहल विष निकला, जिससे सभी देव एवं असुर डर गए। तब उन्होंने भगवान शंकर को पुकारा। भगवान शंकर ने उक्त विषको को ग्रहण किया एवं विष को गले में संग्रहित रखा। तभी से भगवान शंकर नीलकंठ कहलाए। समुद्र मंथन से लक्ष्मी, ऐरावत हाथी, कोस्तु मणी, परिजात, धनवंतरी, चंद्रमा, कामधेनु, धनुष आदि रत्न का प्रादुर्भाव हुआ। सबसे अंत में अमृत का प्रादुर्भाव हुआ। कहा कि दूब घास अमृत की देन है, इसलिए यह अमृत के समान पवित्र है। अमृत के लिए देव एवं असुर को आपस में लड़ता देख भगवान ने मोहिनी का अवतार लिया और देवों को अमृत पान कराया। इससे असुर क्रोधित होकर देवों पर आक्रमण कर दिए एवं स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। भगवान ने अदिति की कोख से वामन के रूप में जन्म लिया। जो भगवान का वामन अवतार कहलाया। भगवान ने वामन रूप धारण कर राक्षसों के राजा बलि से तीन कदम की जमीन दान में मांगी। दानवीर बलि ने वामन द्वारा मांगे गए दान को स्वीकार किया तब वामन भगवान ने तीन कदम में पूरी सृृष्टि को नाप लिया। राजा बलि भगवान की लीला से प्रभावित हुए एवं इंद्रलोक को मुक्त किया। कथा के दौरान भजन मंडली द्वारा सुंदर भजनों की भी प्रस्तुति की गयी। कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।
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