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Auraiya News: पटना से आकर औरैया में जलाई आजादी के आंदोलन की अलख
Thu, 14 Aug 2025 10:40 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
Updated Thu, 14 Aug 2025 10:40 PM IST
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फोटो-14एयूआरपी -04 गुरु नारायण त्रिपाठी की फाइल फोटो। स्रोत: अरुण त्रिपाठी
औरैया। दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्टी से भी खुश्बू-ए-वतन आएगी। ब्रिटिश हुकूमत से जंग-ए आजादी में गुमनाम सेनानियों का जिक्र भी अमृत महोत्सव काल में होना लाजिमी है। अंग्रेजों को धूल चटाने के लिए खुद को मृत घोषित करवाने वाले सोमदेव शर्मा ने कंचौसी, लहरापुर व सहायल के सेनानियों का नेतृत्व कर आंदोलन को धार दी थी।
ऐसे क्रांतिकारी को आजादी की वर्षगांठ पर राष्ट्रभक्त नमन कर रहे हैं। सोमदेव शर्मा बिहार के पटना के रहने वाले थे। आजादी आंदोलन में औरैया को कर्मस्थली बनाने वाले इस गुमनाम सेनानी ने मुफलिसी का जीवन व्यतीत करते हुए झींझक में प्राण त्याग दिए।
भारत प्रेरणा मंच के जिला महासचिव अविनाश अग्निहोत्री ने बताया कि देश को आजाद कराने में अमूल्य योगदान देने वाले सोमदेव शर्मा बिहार पटना के निवासी थे। उन्होंने 1857 की आजादी की जंग में फिरंगियों से लोहा लेने के लिए औरैया की धरती को अपनी कर्मस्थली बनाया। सोमदेव शर्मा ने औरैया जिले के लहरापुर सहायल व कंचौसी क्षेत्र में देश भक्तों का समूह तैयार किया और अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया।
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उन्होंने अपनी टीम के साथ ब्रिटिश शासन के खिलाफ कई बड़े अभियान चलाए। परेशान अंग्रेजों ने सोमदेव को जिंदा और मृत पकड़ने पर बड़े इनाम की घोषणा कर दी। इसी दौर में मधवापुर गांव के पास एक लावारिस लाश बरामद हुई। सोमदेव के समर्थकों ने अंग्रेजों का ध्यान हटाने के लिए लाश की पहचान सोमदेव शर्मा के रूप में कर दी तब किसी ब्रिटिश अधिकारी ने सोमदेव नहीं देखा था।
इसलिए उन्होंने सोमदेव को मृत मानकर फाइल बंद कर दी। इधर, सोमदेव अग्रेजों से आजादी मिलने तक ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अभियानों को अंजाम देते रहे। बताते हैं कि उन्होनें प्रतिज्ञा की थी कि जब तक देश आजाद नहीं होगा। तब तक वह विवाह नहीं करेगें। देश की आजादी के बाद वह पटना लौटे और विवाह किया। शादी के बाद प्रकृति का ऐसा कहर टूटा कि उस पुरोधा को हिला दिया। उनके जितने भी बच्चे पैदा हुए, वह सभी अपंग थे।
इसके बाद वह फिर अपनी कर्मस्थली कंचौसी क्षेत्र में वापस लौटे। कई लोगों के प्रयास से उनको झींझक कस्बे के एक स्कूल में पुस्तक बाइडिंग का काम मिला। यहीं वह मुफलिसी का जीवन जीते हुए परलोक वासी हो गए। सोमदेव शर्मा गुमनामी के ऐसे अंधेरे में खोए कि आज उनका कोई लिखित दस्तावेज मौजूद नहीं है लेकिन क्षेत्र के बुजुर्ग आजादी का हर वर्षगांठ पर उनके किस्से आज भी बताते हैं।
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ग्वालियर से नौकरी छोड़ आंदोलन में कूदे थे गुरु नारायण
फोटो-14एयूआरपी -04 गुरु नारायण त्रिपाठी की फाइल फोटो। स्रोत: अरुण त्रिपाठी
आजादी आंदोलन के एक ओर सेनानी बिधूना के देवरांव निवासी गुरु नारायण त्रिपाठी भी हैं। सीमित संसाधन के कारण ये ज्यादा पढ़ लिख नहीं सके।
गुरु नारायण त्रिपाठी के पुत्र अरुण त्रिपाठी बताते हैं कि पिता ने अपनी जीविका चलाने के लिए ग्वालियर के राज घराने में पुलिस की नौकरी कर ली थी। 1857 के दौर में महात्मा गांधी ग्वालियर पहुंचे और आजादी आंदोलन को लेकर कई सभाएं की।
इस सभाओं से प्रेरित होकर गुरु नारायण ने नौकरी छोड़ दी और आजादी आंदोलन के सिपाही बन गए। तब इटावा के कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया के साथ अंग्रेजों के खिलाफ सक्रिय हो गए। उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। 9 अगस्त 2013 को उन्हें राष्ट्रपति की ओर से सम्मानित किया गया। इसके बाद सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने भी उनके घर आकर उन्हें सम्मानित किया था। वहीं 14 जून 2016 को उनका देहांत हो गया था।
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ऐसे क्रांतिकारी को आजादी की वर्षगांठ पर राष्ट्रभक्त नमन कर रहे हैं। सोमदेव शर्मा बिहार के पटना के रहने वाले थे। आजादी आंदोलन में औरैया को कर्मस्थली बनाने वाले इस गुमनाम सेनानी ने मुफलिसी का जीवन व्यतीत करते हुए झींझक में प्राण त्याग दिए।
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भारत प्रेरणा मंच के जिला महासचिव अविनाश अग्निहोत्री ने बताया कि देश को आजाद कराने में अमूल्य योगदान देने वाले सोमदेव शर्मा बिहार पटना के निवासी थे। उन्होंने 1857 की आजादी की जंग में फिरंगियों से लोहा लेने के लिए औरैया की धरती को अपनी कर्मस्थली बनाया। सोमदेव शर्मा ने औरैया जिले के लहरापुर सहायल व कंचौसी क्षेत्र में देश भक्तों का समूह तैयार किया और अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया।
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उन्होंने अपनी टीम के साथ ब्रिटिश शासन के खिलाफ कई बड़े अभियान चलाए। परेशान अंग्रेजों ने सोमदेव को जिंदा और मृत पकड़ने पर बड़े इनाम की घोषणा कर दी। इसी दौर में मधवापुर गांव के पास एक लावारिस लाश बरामद हुई। सोमदेव के समर्थकों ने अंग्रेजों का ध्यान हटाने के लिए लाश की पहचान सोमदेव शर्मा के रूप में कर दी तब किसी ब्रिटिश अधिकारी ने सोमदेव नहीं देखा था।
इसलिए उन्होंने सोमदेव को मृत मानकर फाइल बंद कर दी। इधर, सोमदेव अग्रेजों से आजादी मिलने तक ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अभियानों को अंजाम देते रहे। बताते हैं कि उन्होनें प्रतिज्ञा की थी कि जब तक देश आजाद नहीं होगा। तब तक वह विवाह नहीं करेगें। देश की आजादी के बाद वह पटना लौटे और विवाह किया। शादी के बाद प्रकृति का ऐसा कहर टूटा कि उस पुरोधा को हिला दिया। उनके जितने भी बच्चे पैदा हुए, वह सभी अपंग थे।
इसके बाद वह फिर अपनी कर्मस्थली कंचौसी क्षेत्र में वापस लौटे। कई लोगों के प्रयास से उनको झींझक कस्बे के एक स्कूल में पुस्तक बाइडिंग का काम मिला। यहीं वह मुफलिसी का जीवन जीते हुए परलोक वासी हो गए। सोमदेव शर्मा गुमनामी के ऐसे अंधेरे में खोए कि आज उनका कोई लिखित दस्तावेज मौजूद नहीं है लेकिन क्षेत्र के बुजुर्ग आजादी का हर वर्षगांठ पर उनके किस्से आज भी बताते हैं।
ग्वालियर से नौकरी छोड़ आंदोलन में कूदे थे गुरु नारायण
फोटो-14एयूआरपी -04 गुरु नारायण त्रिपाठी की फाइल फोटो। स्रोत: अरुण त्रिपाठी
आजादी आंदोलन के एक ओर सेनानी बिधूना के देवरांव निवासी गुरु नारायण त्रिपाठी भी हैं। सीमित संसाधन के कारण ये ज्यादा पढ़ लिख नहीं सके।
गुरु नारायण त्रिपाठी के पुत्र अरुण त्रिपाठी बताते हैं कि पिता ने अपनी जीविका चलाने के लिए ग्वालियर के राज घराने में पुलिस की नौकरी कर ली थी। 1857 के दौर में महात्मा गांधी ग्वालियर पहुंचे और आजादी आंदोलन को लेकर कई सभाएं की।
इस सभाओं से प्रेरित होकर गुरु नारायण ने नौकरी छोड़ दी और आजादी आंदोलन के सिपाही बन गए। तब इटावा के कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया के साथ अंग्रेजों के खिलाफ सक्रिय हो गए। उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। 9 अगस्त 2013 को उन्हें राष्ट्रपति की ओर से सम्मानित किया गया। इसके बाद सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने भी उनके घर आकर उन्हें सम्मानित किया था। वहीं 14 जून 2016 को उनका देहांत हो गया था।