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बिट्रिश हुकूमत में अस्तित्व में नहीं था दिबियापुर
ब्यूरो अमर उजाला, औरैया
Updated Fri, 30 Oct 2015 12:27 AM IST
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वर्ष 1855 में जब दिल्ली- हावड़ा रेलमार्ग दिबियापुर से होकर गुजरा, उस समय दिबियापुर अस्तित्व में ही नहीं था। अंग्रेजों के जमाने में फफूंद कस्बा अलग ही पहचान रखता था। इतिहास के जानकारों के अनुसार उस समय वर्ष 1897 तक फफूंद मुंसिफी रही, जबकि 1930 तक तहसील मुख्यालय रहा।
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औद्योगिक नगर दिबियापुर में बने रेलवे स्टेशन का नाम फफूंद होने के बारे में पड़ताल की गई तो पता चला कि 1104 ईस्वी में फफूंद कस्बे को कन्नौज के राजा जयचंद के दामाद जगम्मनपुर के राजा विशोक देव के पोते फूफन देव ने बसाया था। बिट्रिश हुकूूमत में इटावा का फफूंद कस्बा तहसील मुख्यालय एवं मुंसिफ कोर्ट रहा।
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फफूंद कस्बे के जाकिर हुसैन इंटर कालेज के प्रधानाचार्य कुदरत उल्ला खां के अनुसार यह बातें नवी हैदर की किताब शबाने पुर्दल खां एवं एक अन्य किताब इटावा के हजार वर्ष में दर्ज हैं।
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नगर पंचायत फफूंद के पूर्व चेयरमैन मुकेश भारतीय बताते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में दिबियापुर का कहीं नामोनिशान नहीं था। दिबियापुर के पास में ही पुरानी दिबियापुर के नाम से एक पुर्वा (गांव) में कुछ लोग रहते थे।
बताते हैं कि अंग्रेजों के शासनकाल में वर्ष 1855 में दिल्ली- हावड़ा रेलमार्ग फफूंद कस्बे से नौ किलोमीटर दूर से गुजरी तो यहां स्टेशन बनाकर नाम फफूंद रख दिया गया। रेलवे स्टेशन होने से दिबियापुर के आसपास बस्ती होती गई। जनसंख्या बढ़ने पर दिबियापुर को नगर पंचायत का दर्जा मिला।
नगर पंचायत दिबियापुर कार्यालय के लिपिक नरेंद्र सिंह के अनुसार दिबियापुर नगर पंचायत का गठन वर्ष 1972 में हुआ, तब आसपास के गांव उमरी, ककराही, जमुहां एवं लखनापुर के कुछ हिस्से काटकर दिबियापुर को नगर पंचायत का दर्जा दिया गया।
वर्ष 2011 के आंकड़े के अनुसार दिबियापुर की आबादी 27254 है। इस समय दिबियापुर को नगर पालिका का दर्जा दिलाए जाने के लिए जनप्रतिनिधि प्रयासरत हैं। इसमें आसपास के कई गांवों को जोड़े जाने का प्रस्ताव शासन को भेजा जा चुका है।