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Amroha News: गुरुकुल की बगिया में खिल रहे मेधा के फूल, विश्व स्तर पर पहचान
Sun, 01 Oct 2023 01:28 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
Updated Sun, 01 Oct 2023 01:28 AM IST
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अमरोहा। जिले में एक छोटा सा गांव है चोटीपुरा। जहां बेटियों के लिए गुरुकुल है। यहां पढ़ने वाली बेटियां हर क्षेत्र में ऊंची उड़ान भर रही हैं। चाहे शिक्षा हो, या खेल। हर क्षेत्र में बेटियां छाई हैं। इन्हीं बेटियों की वजह से आज देश दुनिया में पहचाना जाता है। वह इस गांव में स्थित गुरुकुल से 16 राज्यों की करीब एक हजार बेटियों का भविष्य सुधर रहा है। वह पढ़ लिखकर नाम रोशन कर रही हैं।
किसान की बेटी सुमेधा ने छोटे से गांव में गुरुकुल की ऐसी नींव रखी, जहां बेटियों के सपनों को पंख लग सके। आज देश दुनिया में चोटीपुरा का डंका बज रहा है। जब-जब यहां से निकली बेटियों ने देश व विश्व स्तर पर नया मुकाम हासिल किया तो चोटीपुरा का नाम फलक पर चमका। अमरोहा जिला भी इस गांव से विशेष पहचान बनाए हुए है। गुरुकुल से निकलकर कई बेटियों ने राज्य, नेशनल और विश्व स्तर पर देश का नाम रोशन कर कामयाबी को इबारत लिखी। जिससे गांव को देश में अलग पहचान मिली।
अमरोहा से रजबपुर के बीच स्थित गांव चोटीपुरा। जिला मुख्यालय से इसकी दूरी दस किलोमीटर दूर है। पैंतीस वर्ष पूर्व इस गांव की अपनी कोई खास पहचान नहीं थी। लोग खेतीबाड़ी पर ही आधारित थे लेकिन वर्ष 1988 में एक महिला ने गांव को अलग पहचान दिलाने की ठान ली। वह थीं हरगोविंद सिंह की पुत्री सुमेधा। वह ऐसी बागबां हैं जिसकी देखरेख से श्रीमद दयानंद कन्या गुरुकुल की बगिया में मेधा के फूल खिल रहे हैं। छह छात्राओं से शुरू यह गुरुकुल अब पंद्रह राज्यों की एक हजार से अधिक छात्राओं के भविष्य को स्वरूप दे रहा है। यहां की बेटियां ओलिंपिक और प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंची तो गांव में अलग पहचान मिलती चली गई। पिता हरगोविंद सिंह ने 10 वर्ष की आयु में दिल्ली के नरेला स्थित गुरुकुल में पढ़ने भेजा। यहां छठी से आचार्य तक अध्ययन करने के बाद वह गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार चली गईं। एमए व वेदों में अग्निदेवता विषय पर पीएचडी की। वर्ष 1987 में जब गांव पहुंचीं तो, उन पर विवाह के लिए दबाव बनाया गया। इस बीच सुमेधा कई जगह स्त्रियों की दशा देख व्यथित थीं। ऐसे में उन्होंने शादी से इन्कार किया और बेटियों को संस्कारित सुशिक्षित व स्वावलंबी बनाने की ठान ली। पिता से अपने विवाह के लिए जमा किए गए 45 हजार रुपये लिए और गांव के बाहर खेत में दो कमरों का निर्माण कराया। आज दो कमरों वाले गुरुकुल ने विश्वविद्यालय का आकार ले लिया है।
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गुजरात के राज्यपाल की पौत्री ने भी ग्रहण की शिक्षा
यह गुरुकुल देश में ख्याति प्राप्त कर चुका है। यहां गुजरात के राज्यपाल डा. देवव्रत आचार्य की पौत्री वरेण्या ने भी शिक्षा हासिल की है। जो चोटीपुरा के लिए बहुत खास बात है।
ओलिंपिक तक पहुंचीं चार बेटियां
अमरोहा। गुरुकुल की बेटियों को संस्कारित करने के साथ वीरांगना बनाने के लिए आचार्य सुमेधा ने करीब पांच तीरंदाजी प्रतियोगिता शुरू कराई। इसमें पारंगत चार बेटियां सुषमा, रेणू, पुण्यप्रभा व सुमंगला ने नेशनल में स्वर्ण पदक झटका और ओलिंपिक व वर्ल्ड कप तक सफर पूरा किया। इसके बाद तो चोटीपुरा गांव का नाम बेहद खास बन गया।
आईआईटी तक पहुंची यहां की बेटियां
चोटीपुरा गुरुकुल की छात्रा अनु आर्य का शोध के लिए आईटीआई मुंबई में चयन हुआ है। छात्रा वंदना उत्तराखंड के प्रशासनिक संवर्ग में अपनी सेवाएं दे रही हैं। नंदिनी केंद्रीय विश्वविद्यालय इलाहाबाद व सोनिया इग्नू में प्रोफेसर हैं।
सुमेधा की राह पर आठ बेटियां
आचार्य सुमेधा से प्रेरित होकर गुरुकुल में पढ़ने वालीं आठ बेटियां भी गृहस्थ जीवन से दूर रहकर आजीवन बेटियों को शिक्षित करने का व्रत ले चुकी हैं। इनमें कल्पना, अमिता, सविता, रुचि, सुनीति, सुषमा, मीनाक्षी और सीता शामिल हैं। ये सभी डाक्टरेट की उपाधि ग्रहण करने के साथ ही नेट जेआरएफ और अपनी क्लास में गोल्ड मेडलिस्ट हैं।
गुरुकुल महाविद्यालय से गांव को अलग पहचान मिली। यहां की बेटियों ने गांव का नाम देश और विदेशों तक रोशन किया है। अब गांव अपने आप में बेहद खास बन गया है। जिससे गांव वालों को गर्व है। -राकेश गिल ग्रामीण
शिक्षा के क्षेत्र में गांव की अलग पहचान होती है। गांव की बेटी सुमेधा ने गुरुकुल के माध्यम से जिले को प्रसिद्धि दिलाई है। आसपास के जिलों में चोटीपुरा को गुरुकुल के नाम से ही पुकारा जाता है। जिससे गांव वाले गौरवान्वित होते हैं। -प्रवीण कुमार ग्रामीण
आज गांव के लोगों को विशेष अनुभूति होती है। गुरुकुल के माध्यम से चोटीपुरा को जो नाम और पहचान मिली है। उससे गांववासी प्रफुल्लित होते हैं। गांव की बेटी ने चोटीपुरा को विदेशों तक पहचान दिलाई है। -संतोष देवी, ग्राम प्रधान
मेरा सपना रहा था अपने गांव में ही ऐसा संस्थान हो, जिसमें बेटियों को शिक्षित करने के साथ उनका भविष्य संवारा जाए। वर्षों पूर्व देखा गया सपना पूरा हुआ। गुरुकुल से गांव को पहचान मिली तो बेटियों को एक मंच मिला। जिसके माध्यम से वह चोटीपुरा व गुरुकुल का नाम विशेष मुकाम तक ले गईं हैं। ग्रामीणों को भी इसमें सराहनीय सहयोग रहा। -आचार्या सुमेधा
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किसान की बेटी सुमेधा ने छोटे से गांव में गुरुकुल की ऐसी नींव रखी, जहां बेटियों के सपनों को पंख लग सके। आज देश दुनिया में चोटीपुरा का डंका बज रहा है। जब-जब यहां से निकली बेटियों ने देश व विश्व स्तर पर नया मुकाम हासिल किया तो चोटीपुरा का नाम फलक पर चमका। अमरोहा जिला भी इस गांव से विशेष पहचान बनाए हुए है। गुरुकुल से निकलकर कई बेटियों ने राज्य, नेशनल और विश्व स्तर पर देश का नाम रोशन कर कामयाबी को इबारत लिखी। जिससे गांव को देश में अलग पहचान मिली।
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अमरोहा से रजबपुर के बीच स्थित गांव चोटीपुरा। जिला मुख्यालय से इसकी दूरी दस किलोमीटर दूर है। पैंतीस वर्ष पूर्व इस गांव की अपनी कोई खास पहचान नहीं थी। लोग खेतीबाड़ी पर ही आधारित थे लेकिन वर्ष 1988 में एक महिला ने गांव को अलग पहचान दिलाने की ठान ली। वह थीं हरगोविंद सिंह की पुत्री सुमेधा। वह ऐसी बागबां हैं जिसकी देखरेख से श्रीमद दयानंद कन्या गुरुकुल की बगिया में मेधा के फूल खिल रहे हैं। छह छात्राओं से शुरू यह गुरुकुल अब पंद्रह राज्यों की एक हजार से अधिक छात्राओं के भविष्य को स्वरूप दे रहा है। यहां की बेटियां ओलिंपिक और प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंची तो गांव में अलग पहचान मिलती चली गई। पिता हरगोविंद सिंह ने 10 वर्ष की आयु में दिल्ली के नरेला स्थित गुरुकुल में पढ़ने भेजा। यहां छठी से आचार्य तक अध्ययन करने के बाद वह गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार चली गईं। एमए व वेदों में अग्निदेवता विषय पर पीएचडी की। वर्ष 1987 में जब गांव पहुंचीं तो, उन पर विवाह के लिए दबाव बनाया गया। इस बीच सुमेधा कई जगह स्त्रियों की दशा देख व्यथित थीं। ऐसे में उन्होंने शादी से इन्कार किया और बेटियों को संस्कारित सुशिक्षित व स्वावलंबी बनाने की ठान ली। पिता से अपने विवाह के लिए जमा किए गए 45 हजार रुपये लिए और गांव के बाहर खेत में दो कमरों का निर्माण कराया। आज दो कमरों वाले गुरुकुल ने विश्वविद्यालय का आकार ले लिया है।
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गुजरात के राज्यपाल की पौत्री ने भी ग्रहण की शिक्षा
यह गुरुकुल देश में ख्याति प्राप्त कर चुका है। यहां गुजरात के राज्यपाल डा. देवव्रत आचार्य की पौत्री वरेण्या ने भी शिक्षा हासिल की है। जो चोटीपुरा के लिए बहुत खास बात है।
ओलिंपिक तक पहुंचीं चार बेटियां
अमरोहा। गुरुकुल की बेटियों को संस्कारित करने के साथ वीरांगना बनाने के लिए आचार्य सुमेधा ने करीब पांच तीरंदाजी प्रतियोगिता शुरू कराई। इसमें पारंगत चार बेटियां सुषमा, रेणू, पुण्यप्रभा व सुमंगला ने नेशनल में स्वर्ण पदक झटका और ओलिंपिक व वर्ल्ड कप तक सफर पूरा किया। इसके बाद तो चोटीपुरा गांव का नाम बेहद खास बन गया।
आईआईटी तक पहुंची यहां की बेटियां
चोटीपुरा गुरुकुल की छात्रा अनु आर्य का शोध के लिए आईटीआई मुंबई में चयन हुआ है। छात्रा वंदना उत्तराखंड के प्रशासनिक संवर्ग में अपनी सेवाएं दे रही हैं। नंदिनी केंद्रीय विश्वविद्यालय इलाहाबाद व सोनिया इग्नू में प्रोफेसर हैं।
सुमेधा की राह पर आठ बेटियां
आचार्य सुमेधा से प्रेरित होकर गुरुकुल में पढ़ने वालीं आठ बेटियां भी गृहस्थ जीवन से दूर रहकर आजीवन बेटियों को शिक्षित करने का व्रत ले चुकी हैं। इनमें कल्पना, अमिता, सविता, रुचि, सुनीति, सुषमा, मीनाक्षी और सीता शामिल हैं। ये सभी डाक्टरेट की उपाधि ग्रहण करने के साथ ही नेट जेआरएफ और अपनी क्लास में गोल्ड मेडलिस्ट हैं।
गुरुकुल महाविद्यालय से गांव को अलग पहचान मिली। यहां की बेटियों ने गांव का नाम देश और विदेशों तक रोशन किया है। अब गांव अपने आप में बेहद खास बन गया है। जिससे गांव वालों को गर्व है। -राकेश गिल ग्रामीण
शिक्षा के क्षेत्र में गांव की अलग पहचान होती है। गांव की बेटी सुमेधा ने गुरुकुल के माध्यम से जिले को प्रसिद्धि दिलाई है। आसपास के जिलों में चोटीपुरा को गुरुकुल के नाम से ही पुकारा जाता है। जिससे गांव वाले गौरवान्वित होते हैं। -प्रवीण कुमार ग्रामीण
आज गांव के लोगों को विशेष अनुभूति होती है। गुरुकुल के माध्यम से चोटीपुरा को जो नाम और पहचान मिली है। उससे गांववासी प्रफुल्लित होते हैं। गांव की बेटी ने चोटीपुरा को विदेशों तक पहचान दिलाई है। -संतोष देवी, ग्राम प्रधान
मेरा सपना रहा था अपने गांव में ही ऐसा संस्थान हो, जिसमें बेटियों को शिक्षित करने के साथ उनका भविष्य संवारा जाए। वर्षों पूर्व देखा गया सपना पूरा हुआ। गुरुकुल से गांव को पहचान मिली तो बेटियों को एक मंच मिला। जिसके माध्यम से वह चोटीपुरा व गुरुकुल का नाम विशेष मुकाम तक ले गईं हैं। ग्रामीणों को भी इसमें सराहनीय सहयोग रहा। -आचार्या सुमेधा