{"_id":"64c035eeeebf5ba6c501c834","slug":"arvind-got-victory-by-taking-bullets-on-the-chest-jpnagar-news-c-284-1-smbd1013-1723-2023-07-26","type":"story","status":"publish","title_hn":"Amroha News: अरविंद ने सीने पर गोलियां खाकर दिलाई थी विजय","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Amroha News: अरविंद ने सीने पर गोलियां खाकर दिलाई थी विजय
Wed, 26 Jul 2023 02:21 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
Updated Wed, 26 Jul 2023 02:21 AM IST
विज्ञापन
अमरोहा। शहीदों की चिता पर हर वर्ष लगेंगे मेले, वतन पर मिटने वालों का यहीं बाकी निशा होगा। ये पंक्तियां मिलक छावी के अरविंद शहादत की याद दिला देती हैं। जिन्होंने मात्र 21 वर्ष की उम्र में देश के लिए प्राण न्यौछावर कर दिए। कारगिल युद्ध में उन्होंने 21 दुश्मनों को ढेर करते हुए उनके पसीने छुड़ा दिए थे। वह हौसलों के साथ आगे बढ़ ही रहे थे कि दुश्मनों ने उन पर गोलियां बरसा दी। आखिरकार 11 गोली खाने के बाद वह देश के लिए शहीद हो गए। 23 साल बाद भी पूरा क्षेत्र उनकी शहादत पर गर्व करता है।
वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध को याद कर आज भी लोग सहम जाते हैं। देश के साथ जिले के जवान ने इस युद्ध में अपना बलिदान दिया। अमरोहा के मिलक छावी निवासी अरविंद का नाम भी शहीदों में शामिल है। अमरोहा मुख्यालय से लगभग 14 किलोमीटर दूर स्थित गांव मिलक छावी निवासी किसान मुखत्यार सिंह के सबसे बड़े पुत्र अरविंद वर्ष 1996 में मात्र 19 वर्ष की उम्र में सेना में भर्ती हुए। उनकी तैनाती 22 ग्रेनेडियर्स बटालियन में थी। दो साल नौ माह ड्यूटी करने के बाद अप्रैल 1999 में अरविंद दो माह की छुट्टी पर गांव आए थे। अरविंद 13 जून 1999 को ड्यूटी पर वापस लौटने लगे। तभी कारगिल युद्ध शुरू हो गया। उन्हें अधिकारियों ने कारगिल पहुंचने के आदेश दिए। जिसके बाद वह सीधे युद्ध में शामिल होने के लिए रवाना हो गए। बताया जाता है कि आपरेशन विजय के दौरान बटालियन 22 ग्रेनेडियर्स की ब्रावो कंपनी को प्वाइंट 5287 पर कब्जा करने का टास्क मिला था। 26 जून 1999 को दुश्मनों ने उस क्षेत्र में भारी बमबारी करना शुरू कर दिया। ग्रेनेडियर अरविंद टीम के साथ दुश्मनों पर टूट पड़े। इस बीच उन्होंने दुश्मन के 21 जवानों को मौत के घाट उतार दिया। वह लगातार दुश्मनों को टक्कर दे रहे थी कि तभी सामने से हुई गोलीबारी में उन्हें 11 गोलियां लगी और वह शहीद हो गए। जिसके बाद 29 जून को तिरंगे में लिपटा अरविंद का शव गांव पहुंचा।
शहीद होने के बाद जब अरविंद का शव तिरंगे झंडे में लिपट कर गांव पहुंचा तो पिता मुख्तयार और मां चंद्रवती पूरी तरह टूट चुके थे। वहीं, देश के लिए शहादत देने पर उन्हें गर्व हुआ। पिता बताते हैं कि युद्ध में पहुंचने के बाद अरविंद ने अपनी सलामती का पत्र परिजनों को भेजा था। 29 जून को उनका शव गांव पहुंच गया था, लेकिन चार दिन बाद वह खत उन्हें मिला। वह खत पढ़कर परिवार पूरी तरह टूट गया। शहीद अरविंद पांच भाई बहनों में सबसे बड़े थे। उनके भाई धर्मेंद्र सिंह के अलावा तीन बहनें सुदेश देवी, शशि देवी और सर्वेश देवी हैं। चारों भाई-बहनों को शादी हो चुकी है।
विज्ञापन
शहीद के पिता मुख्तयार ने बताया कि जब वह छुट्टी पर लौटे तो उनकी शादी की बात शुरू हुई। गांव में लड़की पक्ष पहुंचा और अरविंद का रोकना भी कर दिया गया। रोकना होने के बाद अरविंद ने दोस्तों को पार्टी भी दी थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। रोकने के कुछ दिन बाद ही उनका शव गांव पहुंचा।
अरविंद की शहादत के बाद प्रशासन की ओर से शहीद के नाम से पेट्रोल पंप, गांव में अरविंद के नाम पर प्राइमरी स्कूल और शहीदी गेट का निर्माण, 25 बेड का सरकारी अस्पताल और गांव का नाम अरविंद नगर करने का वादा किया गया। इनमें पेट्रोल पंप, प्राइमरी स्कूल खुलने और गांव का नाम अरविंद नगर मिलक करने के अलावा अन्य वादे आज तक पूरे नहीं हो सके है। अरविंद के भाई धर्मेंद्र सिंह बताते है कि 22 वर्ष बाद पिछले साल शहीदी गेट का निर्माण हुआ। जबकि अस्पताल और शहीद स्मारक पर टीन शेड की व्यवस्था आज तक नहीं हो सकी है।
विज्ञापन
वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध को याद कर आज भी लोग सहम जाते हैं। देश के साथ जिले के जवान ने इस युद्ध में अपना बलिदान दिया। अमरोहा के मिलक छावी निवासी अरविंद का नाम भी शहीदों में शामिल है। अमरोहा मुख्यालय से लगभग 14 किलोमीटर दूर स्थित गांव मिलक छावी निवासी किसान मुखत्यार सिंह के सबसे बड़े पुत्र अरविंद वर्ष 1996 में मात्र 19 वर्ष की उम्र में सेना में भर्ती हुए। उनकी तैनाती 22 ग्रेनेडियर्स बटालियन में थी। दो साल नौ माह ड्यूटी करने के बाद अप्रैल 1999 में अरविंद दो माह की छुट्टी पर गांव आए थे। अरविंद 13 जून 1999 को ड्यूटी पर वापस लौटने लगे। तभी कारगिल युद्ध शुरू हो गया। उन्हें अधिकारियों ने कारगिल पहुंचने के आदेश दिए। जिसके बाद वह सीधे युद्ध में शामिल होने के लिए रवाना हो गए। बताया जाता है कि आपरेशन विजय के दौरान बटालियन 22 ग्रेनेडियर्स की ब्रावो कंपनी को प्वाइंट 5287 पर कब्जा करने का टास्क मिला था। 26 जून 1999 को दुश्मनों ने उस क्षेत्र में भारी बमबारी करना शुरू कर दिया। ग्रेनेडियर अरविंद टीम के साथ दुश्मनों पर टूट पड़े। इस बीच उन्होंने दुश्मन के 21 जवानों को मौत के घाट उतार दिया। वह लगातार दुश्मनों को टक्कर दे रहे थी कि तभी सामने से हुई गोलीबारी में उन्हें 11 गोलियां लगी और वह शहीद हो गए। जिसके बाद 29 जून को तिरंगे में लिपटा अरविंद का शव गांव पहुंचा।
विज्ञापन
शहीद होने के बाद जब अरविंद का शव तिरंगे झंडे में लिपट कर गांव पहुंचा तो पिता मुख्तयार और मां चंद्रवती पूरी तरह टूट चुके थे। वहीं, देश के लिए शहादत देने पर उन्हें गर्व हुआ। पिता बताते हैं कि युद्ध में पहुंचने के बाद अरविंद ने अपनी सलामती का पत्र परिजनों को भेजा था। 29 जून को उनका शव गांव पहुंच गया था, लेकिन चार दिन बाद वह खत उन्हें मिला। वह खत पढ़कर परिवार पूरी तरह टूट गया। शहीद अरविंद पांच भाई बहनों में सबसे बड़े थे। उनके भाई धर्मेंद्र सिंह के अलावा तीन बहनें सुदेश देवी, शशि देवी और सर्वेश देवी हैं। चारों भाई-बहनों को शादी हो चुकी है।
विज्ञापन
शहीद के पिता मुख्तयार ने बताया कि जब वह छुट्टी पर लौटे तो उनकी शादी की बात शुरू हुई। गांव में लड़की पक्ष पहुंचा और अरविंद का रोकना भी कर दिया गया। रोकना होने के बाद अरविंद ने दोस्तों को पार्टी भी दी थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। रोकने के कुछ दिन बाद ही उनका शव गांव पहुंचा।
अरविंद की शहादत के बाद प्रशासन की ओर से शहीद के नाम से पेट्रोल पंप, गांव में अरविंद के नाम पर प्राइमरी स्कूल और शहीदी गेट का निर्माण, 25 बेड का सरकारी अस्पताल और गांव का नाम अरविंद नगर करने का वादा किया गया। इनमें पेट्रोल पंप, प्राइमरी स्कूल खुलने और गांव का नाम अरविंद नगर मिलक करने के अलावा अन्य वादे आज तक पूरे नहीं हो सके है। अरविंद के भाई धर्मेंद्र सिंह बताते है कि 22 वर्ष बाद पिछले साल शहीदी गेट का निर्माण हुआ। जबकि अस्पताल और शहीद स्मारक पर टीन शेड की व्यवस्था आज तक नहीं हो सकी है।