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महिला सम्मान की बात करने वाले नहीं देते कमान
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अंबेडकरनगर। सभी राजनीतिक दल महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने और हर क्षेत्र में उन्हें आरक्षण दिए जाने की वकालत भले ही करते हों। लेकिन चुनावों में टिकट देने की बात होत ही अपने कदम पीछे खींच लेती हैं। इस बार के चुनाव में भी महिलाओं के बजाय पुरुषों को ही टिकट देने की प्राथमिकता दी गई है। मौजूदा चुनाव में कांग्रेस ने जरूर पांच में से चार सीटों पर महिलाओं को मैदान में उतारा है। बसपा ने दो सीटों पर महिलाओं को टिकट दिया है। भाजपा व सपा ने एक भी महिला को उम्मीदवार नहीं बनाया है। इससे पहले के चुनाव में तो महिलाओं को टिकट मिलने की स्थिति और भी चिंताजनक थी।
जिले में विधानसभा चुनाव की बात की जाए, तो आधी आबादी का नेतृत्व आगे बढ़ाने तथा महिलाओं को मौका देने के मामले में राजनीतिक दलों ने कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। हालांकि सभी प्रमुख दलों मेें सक्रिय महिला नेताओं की कमीं न तो पहले रही है और न ही बीच के दौर को शामिल करते हुए मौजूदा समय में इसकी कोई कमीं राजनीतिक दलों में दिखती है। यह बात अलग है कि कभी जातीय समीकरण, तो कभी पुरुषों के ज्यादा प्रभावी हो जाने आदि का आंकलन करते हुए राजनीतिक पार्टियों ने महिलाओं को टिकट देने में कोई खास तवज्जो नहीं दिया।
पिछले पांच दशक के चुनावों की बात की जाए, तो महिलाओं को टिकट देने के मामले में सभी प्रमुख दल जिले में फिसड्डी ही साबित हुए हैं। समय समय पर उन्होंने अपनी पार्टियों में सक्रिय व जुझारू महिला नेताओं को प्राथमिकता देने के बजाय पुरुष नेताओं को टिकट देना उचित समझा। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले पांच दशक में कुल चार महिला विधायक जिले की अलग-अलग सीटों से निर्वाचित हुई हैं।
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अकबरपुर सुरक्षित सीट पर वर्ष 1957 में कांग्रेस से रामरती पहली बार विधायक चुनी गईं। 1962 में भी वे कांग्रेस से विधायक बनीं। इसके बाद से इस सीट को महिला विधायक का इंतजार है। पार्टियों ने दरअसल यहां इसके बाद से महिलाओं को टिकट ही नहीं दिए। वर्ष 1991 में अपना दल ने उर्मिला पटेल को टिकट प्रदान किया, वे चौथे स्थान पर रही थीं। टांडा से वर्ष 2007 में कांग्रेस पार्टी ने अजरा सुल्ताना अंसारी को टिकट दिया था, वे चौथे स्थान पर थीं। 2017 में प्रमुख दलों के बीच इकलौती महिला प्रत्याशी के तौर पर बीजेपी की संजू देवी विधायक बनने में कामयाब हुई थीं।
2019 के उपचुनाव में बसपा ने जलालपुर से छाया वर्मा को टिकट दिया था, लेकिन कड़े संघर्ष के बावजूद वे जीत नहीं पाईं। परिसीमन से पहले रही जहांगीरगंज सुरक्षित सीट से वर्ष 1974 में कांग्रेस के टिकट पर रामरती देवी, तो 1977 के चुनाव में रामरती ही जनता पार्टी के टिकट पर विधायक बनी थीं। वर्ष 2002 के चुनाव में बसपा प्रमुख मायावती विधायक बनीं, तो परिसीमन के बाद आलापुर नाम में परिवर्तित हुई इस सीट पर 2017 में बीजेपी की अनीता कमल विधायक बनीं। इस चुनाव में सपा ने महिला प्रत्याशी संगीता कनौजिया को अपना प्रत्याशी बनाया था।
मायावती की धमक का भी नहीं पड़ा असर
वर्ष 2002 में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने जहांगीरगंज विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था। उनकी इस धमक के बाद भी जिले में महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने की सुध राजनीतिक दलों में आमतौर पर नहीं हो सकी। उस चुनाव में मायावती ने बसपा प्रत्याशी के तौर पर 51 हजार 4 मत प्राप्त किया था। दूसरे स्थान पर रहे सपा के भीमप्रसाद सोनकर को 44 हजार 597 मत प्राप्त हुए थे। उस चुनाव में कुल 10 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा था, जिसमें मायावती के अलावा सिर्फ एक निर्दल महिला प्रत्याशी तारावती उर्फ तारादेवी शामिल थीं। भाजपा ने साहबदीन कनौजिया अपना उम्मीदवार बनाया था, जिन्हें 38 हजार 25 मत मिले थे, जबकि चौथे स्थान पर रहे अपना दल के जगधारी को 3 हजार 245 मत मिला था।
कांग्रेस ने बनाया लड़की हूं, लड़ सकती हूं नारे को मजबूत
जिले में कांग्रेस को बतौर महिला प्रत्याशी विधायक बनाने के लिए वर्ष 1962 के बाद से इंतजार बना हुआ है। इसके बाद से कांग्रेस की कोई महिला प्रत्याशी विधायक नहीं बन पाई हैं। कांग्रेस ने भी पिछले तमाम चुनावों में महिलाओं को टिकट देने के मामले में अन्य दलों की तरह ही रवैया दिखाया। हालांकि इस बार पार्टी ने टिकट देने में अन्य दलों सेे बाजी मारी है। दरअसल पार्टी महासचिव व उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी ने यूपी के लिए लड़की हूं, लड़ सकती हूं मुहिम का आगाज कर रखा है। इसे देखते हुए ही पार्टी ने जिले में महिलाओं को सर्वाधिक महत्व टिकट वितरण में दिया है। कांग्रेस ने सबसे पहले एक टिकट घोषित किया, वह महिला कोटे में गया। जिला मुख्यालय की अकबरपुर विधानसभा सीट से पूर्व जिला पंचायत सदस्य प्रियंका जायसवाल को टिकट घोषित किया। पार्टी ने इसके बाद तीन और सीट पर टिकट घोषित किया, तो उसमें से जलालपुर में रागिनी पाठक और आलापुर सत्यमवदा को टिकट थमा दिया। शेष बची कटेहरी सीट पर तमाम दावेदारों के बीच पार्टी ने यहां भी महिला कोटे में सीट देते हुए निशात फातिमा को चुनाव लड़ाने का निर्णय ले लिया। ऐसे में कुल पांच विधानसभा सीट में से कांग्रेस ने चार सीटों पर महिला प्रत्याशियों को मैदान में उतार रखा है। अब इसका कितना लाभ चुनाव में मिलता है, यह तो देखने वाली बात होगी, लेकिन टिकट वितरण कर कांग्रेस ने अपने नारे को मजबूत बनाने की पहल जरूर कर दी है।
बीते चुनाव में बनी थीं दो महिला विधायक
वर्ष 2017 के सामान्य चुनाव में जिले से दो महिला विधायक बीजेपी के टिकट पर चुनी गई थीं। टांडा से चुनी गईं संजू देवी तथा आलापुर से चुनीं गई अनीता कमल का टिकट पार्टी ने इस बार काट दिया है। सभी पांच सीट पर भाजपा ने एक भी महिला दावेदार को अपना प्रत्याशी नहीं बनाया है। यही हाल समाजवादी पार्टी का भी है। सपा ने भी किसी सीट पर महिला दावेदार को प्राथमिकता नहीं दी। इसके चलते ही टांडा से सपा के टिकट की प्रबल दावेदार अशरफपुर किछौछा नगर पंचायत की चेयरमैन शबाना खातून ने पार्टी से त्यागपत्र देकर बसपा की सदस्यता ले ली थी। बहुजन समाज पार्टी ने उन्हें टांडा से अपना प्रत्याशी भी बना दिया। बसपा ने इस बार एक और महिला को टिकट देते हुए आलापुर प्रत्याशी बनाया है। एक आईपीएस अधिकारी की मां केशरा देवी को बसपा आलापुर सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ा रही है।
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जिले में विधानसभा चुनाव की बात की जाए, तो आधी आबादी का नेतृत्व आगे बढ़ाने तथा महिलाओं को मौका देने के मामले में राजनीतिक दलों ने कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। हालांकि सभी प्रमुख दलों मेें सक्रिय महिला नेताओं की कमीं न तो पहले रही है और न ही बीच के दौर को शामिल करते हुए मौजूदा समय में इसकी कोई कमीं राजनीतिक दलों में दिखती है। यह बात अलग है कि कभी जातीय समीकरण, तो कभी पुरुषों के ज्यादा प्रभावी हो जाने आदि का आंकलन करते हुए राजनीतिक पार्टियों ने महिलाओं को टिकट देने में कोई खास तवज्जो नहीं दिया।
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पिछले पांच दशक के चुनावों की बात की जाए, तो महिलाओं को टिकट देने के मामले में सभी प्रमुख दल जिले में फिसड्डी ही साबित हुए हैं। समय समय पर उन्होंने अपनी पार्टियों में सक्रिय व जुझारू महिला नेताओं को प्राथमिकता देने के बजाय पुरुष नेताओं को टिकट देना उचित समझा। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले पांच दशक में कुल चार महिला विधायक जिले की अलग-अलग सीटों से निर्वाचित हुई हैं।
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अकबरपुर सुरक्षित सीट पर वर्ष 1957 में कांग्रेस से रामरती पहली बार विधायक चुनी गईं। 1962 में भी वे कांग्रेस से विधायक बनीं। इसके बाद से इस सीट को महिला विधायक का इंतजार है। पार्टियों ने दरअसल यहां इसके बाद से महिलाओं को टिकट ही नहीं दिए। वर्ष 1991 में अपना दल ने उर्मिला पटेल को टिकट प्रदान किया, वे चौथे स्थान पर रही थीं। टांडा से वर्ष 2007 में कांग्रेस पार्टी ने अजरा सुल्ताना अंसारी को टिकट दिया था, वे चौथे स्थान पर थीं। 2017 में प्रमुख दलों के बीच इकलौती महिला प्रत्याशी के तौर पर बीजेपी की संजू देवी विधायक बनने में कामयाब हुई थीं।
2019 के उपचुनाव में बसपा ने जलालपुर से छाया वर्मा को टिकट दिया था, लेकिन कड़े संघर्ष के बावजूद वे जीत नहीं पाईं। परिसीमन से पहले रही जहांगीरगंज सुरक्षित सीट से वर्ष 1974 में कांग्रेस के टिकट पर रामरती देवी, तो 1977 के चुनाव में रामरती ही जनता पार्टी के टिकट पर विधायक बनी थीं। वर्ष 2002 के चुनाव में बसपा प्रमुख मायावती विधायक बनीं, तो परिसीमन के बाद आलापुर नाम में परिवर्तित हुई इस सीट पर 2017 में बीजेपी की अनीता कमल विधायक बनीं। इस चुनाव में सपा ने महिला प्रत्याशी संगीता कनौजिया को अपना प्रत्याशी बनाया था।
मायावती की धमक का भी नहीं पड़ा असर
वर्ष 2002 में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने जहांगीरगंज विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था। उनकी इस धमक के बाद भी जिले में महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने की सुध राजनीतिक दलों में आमतौर पर नहीं हो सकी। उस चुनाव में मायावती ने बसपा प्रत्याशी के तौर पर 51 हजार 4 मत प्राप्त किया था। दूसरे स्थान पर रहे सपा के भीमप्रसाद सोनकर को 44 हजार 597 मत प्राप्त हुए थे। उस चुनाव में कुल 10 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा था, जिसमें मायावती के अलावा सिर्फ एक निर्दल महिला प्रत्याशी तारावती उर्फ तारादेवी शामिल थीं। भाजपा ने साहबदीन कनौजिया अपना उम्मीदवार बनाया था, जिन्हें 38 हजार 25 मत मिले थे, जबकि चौथे स्थान पर रहे अपना दल के जगधारी को 3 हजार 245 मत मिला था।
कांग्रेस ने बनाया लड़की हूं, लड़ सकती हूं नारे को मजबूत
जिले में कांग्रेस को बतौर महिला प्रत्याशी विधायक बनाने के लिए वर्ष 1962 के बाद से इंतजार बना हुआ है। इसके बाद से कांग्रेस की कोई महिला प्रत्याशी विधायक नहीं बन पाई हैं। कांग्रेस ने भी पिछले तमाम चुनावों में महिलाओं को टिकट देने के मामले में अन्य दलों की तरह ही रवैया दिखाया। हालांकि इस बार पार्टी ने टिकट देने में अन्य दलों सेे बाजी मारी है। दरअसल पार्टी महासचिव व उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी ने यूपी के लिए लड़की हूं, लड़ सकती हूं मुहिम का आगाज कर रखा है। इसे देखते हुए ही पार्टी ने जिले में महिलाओं को सर्वाधिक महत्व टिकट वितरण में दिया है। कांग्रेस ने सबसे पहले एक टिकट घोषित किया, वह महिला कोटे में गया। जिला मुख्यालय की अकबरपुर विधानसभा सीट से पूर्व जिला पंचायत सदस्य प्रियंका जायसवाल को टिकट घोषित किया। पार्टी ने इसके बाद तीन और सीट पर टिकट घोषित किया, तो उसमें से जलालपुर में रागिनी पाठक और आलापुर सत्यमवदा को टिकट थमा दिया। शेष बची कटेहरी सीट पर तमाम दावेदारों के बीच पार्टी ने यहां भी महिला कोटे में सीट देते हुए निशात फातिमा को चुनाव लड़ाने का निर्णय ले लिया। ऐसे में कुल पांच विधानसभा सीट में से कांग्रेस ने चार सीटों पर महिला प्रत्याशियों को मैदान में उतार रखा है। अब इसका कितना लाभ चुनाव में मिलता है, यह तो देखने वाली बात होगी, लेकिन टिकट वितरण कर कांग्रेस ने अपने नारे को मजबूत बनाने की पहल जरूर कर दी है।
बीते चुनाव में बनी थीं दो महिला विधायक
वर्ष 2017 के सामान्य चुनाव में जिले से दो महिला विधायक बीजेपी के टिकट पर चुनी गई थीं। टांडा से चुनी गईं संजू देवी तथा आलापुर से चुनीं गई अनीता कमल का टिकट पार्टी ने इस बार काट दिया है। सभी पांच सीट पर भाजपा ने एक भी महिला दावेदार को अपना प्रत्याशी नहीं बनाया है। यही हाल समाजवादी पार्टी का भी है। सपा ने भी किसी सीट पर महिला दावेदार को प्राथमिकता नहीं दी। इसके चलते ही टांडा से सपा के टिकट की प्रबल दावेदार अशरफपुर किछौछा नगर पंचायत की चेयरमैन शबाना खातून ने पार्टी से त्यागपत्र देकर बसपा की सदस्यता ले ली थी। बहुजन समाज पार्टी ने उन्हें टांडा से अपना प्रत्याशी भी बना दिया। बसपा ने इस बार एक और महिला को टिकट देते हुए आलापुर प्रत्याशी बनाया है। एक आईपीएस अधिकारी की मां केशरा देवी को बसपा आलापुर सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ा रही है।