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Ambedkar Nagar News: खामोश खिलौने और अधूरी कॉपियों ने बयां की उजड़े बचपन की दास्तां
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अकबरपुर के मुरादाबाद मोहल्ले में घर के बाहर खड़ी बच्चों की खिलौने वाली कार। संवाद
अंबेडकरनगर। पत्नी और बच्चों की मौत के बाद अकबरपुर के मीरानपुर मुरादाबाद स्थित मकान को शुक्रवार को नियाज ने जब खाली करवाना शुरू किया तो बिखरे पड़े खिलौनों में उनके उजड़े हुए संसार की झलक नजर आई। जिन खिलौनों को लेने के लिए बच्चे जिद किया करते थे, उन्हें लावारिस पड़ा देख पिता नियाज खुद को संभाल नहीं सके।
घर खाली होना शुरू हुआ तो हर कोने से अतीत की यादें ताजा होने लगीं। घर के आंगन से लेकर कमरे तक पड़े बच्चों के खिलौनों ने दिल को सबसे ज्यादा झकझोरा। एक तरफ बैटरी चालित जीप खड़ी थी, जिस पर कुछ दिन पहले तक आठ वर्षीय सादिया हंसते-खेलते सवारी किया करती थी। वहीं उसके पास पड़ा रिमोट, छोटे-छोटे टेडी बियर और ढेरों खिलौने जिनसे बच्चे खेला करते थे, वह बिखरे पड़े थे। यह खिलौने भले ही निर्जीव हों, लेकिन बच्चों के लिए उनकी दुनिया का अहम हिस्सा थे। (संवाद)
किताब-कॉपियों ने गहरा किया दर्द
बच्चे पढ़-लिखकर काबिल बनें इसके लिए पिता ने कोई कमी नहीं छोड़ी थी। बेहतर स्कूल में दाखिले से लेकर फीस जमा करने और इससे जुड़े सभी संसाधन बच्चों को उपलब्ध थे। कमरे के एक कोने में पड़ी बच्चों की किताब-कॉपियाें ने दर्द को और गहरा कर दिया। चारों बच्चों पढ़ाई में बेहद होनहार थे। किताबों पर लिखे नाम, पेंसिल के निशान और अधूरी लिखी हुई लाइनें इस बात की गवाही दे रही थीं कि ये बच्चे अपने सपनों को संवारने में लगे थे। कॉपी के पन्नों में कहीं गणित के अधूरे सवाल थे तो कहीं अधूरी कविता जो अब कभी पूरी नहीं होगी।
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घर खाली होना शुरू हुआ तो हर कोने से अतीत की यादें ताजा होने लगीं। घर के आंगन से लेकर कमरे तक पड़े बच्चों के खिलौनों ने दिल को सबसे ज्यादा झकझोरा। एक तरफ बैटरी चालित जीप खड़ी थी, जिस पर कुछ दिन पहले तक आठ वर्षीय सादिया हंसते-खेलते सवारी किया करती थी। वहीं उसके पास पड़ा रिमोट, छोटे-छोटे टेडी बियर और ढेरों खिलौने जिनसे बच्चे खेला करते थे, वह बिखरे पड़े थे। यह खिलौने भले ही निर्जीव हों, लेकिन बच्चों के लिए उनकी दुनिया का अहम हिस्सा थे। (संवाद)
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किताब-कॉपियों ने गहरा किया दर्द
बच्चे पढ़-लिखकर काबिल बनें इसके लिए पिता ने कोई कमी नहीं छोड़ी थी। बेहतर स्कूल में दाखिले से लेकर फीस जमा करने और इससे जुड़े सभी संसाधन बच्चों को उपलब्ध थे। कमरे के एक कोने में पड़ी बच्चों की किताब-कॉपियाें ने दर्द को और गहरा कर दिया। चारों बच्चों पढ़ाई में बेहद होनहार थे। किताबों पर लिखे नाम, पेंसिल के निशान और अधूरी लिखी हुई लाइनें इस बात की गवाही दे रही थीं कि ये बच्चे अपने सपनों को संवारने में लगे थे। कॉपी के पन्नों में कहीं गणित के अधूरे सवाल थे तो कहीं अधूरी कविता जो अब कभी पूरी नहीं होगी।
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