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पुत्र वियोग में राजा दशरथ जी ने त्यागे प्राण, दृश्य देखकर भावुक हुए दर्शक
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फोटो-10, अंबेडकरनगर के सिलावट में रामलीला का मंचन करते कलाकार
- फोटो : AMBEDKAR NAGAR
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महरुआ। थाना क्षेत्र के सिलावट में रितुरंग रामलीला समिति के तत्वावधान में चल रही रामलीला के चौथे दिन गुरुवार शाम कलाकारों ने राम वनवास, दशरथ प्राण त्याग आदि लीलाओं का मंचन किया। दशरथ के प्राण त्याग की सूचना मिलते ही अयोध्या में शोक की लहर दौड़ जाती है। इसे देख दर्शक भी भावुक हो गए। देर रात तक चली रामलीला मंचन का दर्शकों ने खूब लुत्फ उठाया।
मंचन का शुभारंभ मां भवानी की भव्य आरती से हुई। पहले दृश्य में दिखाया जाता है कि राजा दशरथ राम को अयोध्या के राज्य सिंहासन पर आरूढ़ करने के लिए नगर में ढिंढोरा पिटवा देते हैं। यह समाचार सुन अयोध्या की जनता प्रसन्न हो जाती है। सभी भगवान राम के राज्याभिषेक में शामिल होने के लिए तैयारी शुरू कर देते हैं। पूरी अयोध्या प्रसन्न थी। उधर जब यह बात दासी मंथरा को पता चली तो वह राजा के निर्णय से खिन्न हो जाती है। आननफानन में वह कैकेयी के महल में पहुंचती है। कहती है कि रानी अनर्थ हो गया। कैकेयी ने कहा कि मंथरा क्या अनर्थ हो गया। मंथरा ने कहा कि रानी क्या तुम्हें नहीं पता महाराज राम को अयोध्या का राजा बनाने जा रहे हैं। कैकेयी ने कहा कि इसमें अनुचित ही क्या है। राम सबसे बड़ा है। सहनशील है। प्रजा की दुख सुख को महसूस करता है। यदि महाराज ने राम को अयोध्या का राजा बनाने का निर्णय लिया है तो इसमें बुराई क्या है।
मंथरा ने अपनी कुटिल नीति का प्रयोग करते हुए आखिरकार कैकेयी को भरमा देती है। परिणामस्वरूप कैकेयी राजा दशरथ से वरदान के तौर पर राम को चौदह वर्ष का वनवास तथा भरत को अयोध्या का राजा घोषित करने की मांग करती हैं। उधर, पिता के वचन की रक्षा के लिए प्रभु राम, माता सीता व लक्ष्मण वन के लिए प्रस्थान करते हैं। राजा दशरथ सुमंत से कहते हैं कि दो-चार दिन घुमाकर इन सभी को घर वापस ले आना। उधर, अयोध्यावासी भगवान राम का रास्ता रोककर खड़े हो जाते हैं। भगवान श्रीराम सभी को समझाते हैं और कहते हैं कि सभी लोग भरत की देखरेख में अपने धर्म का पालन सुनिश्चित करें। अगले दृश्य में अपने प्रिय पुत्र के वनगमन से पीड़ित राजा दशरथ प्राण का त्याग कर देते हैं। इससे अयोध्या में शोक की लहर दौड़ जाती है। इस दृश्य को देख दर्शक भावुक हो गए।
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मंचन का शुभारंभ मां भवानी की भव्य आरती से हुई। पहले दृश्य में दिखाया जाता है कि राजा दशरथ राम को अयोध्या के राज्य सिंहासन पर आरूढ़ करने के लिए नगर में ढिंढोरा पिटवा देते हैं। यह समाचार सुन अयोध्या की जनता प्रसन्न हो जाती है। सभी भगवान राम के राज्याभिषेक में शामिल होने के लिए तैयारी शुरू कर देते हैं। पूरी अयोध्या प्रसन्न थी। उधर जब यह बात दासी मंथरा को पता चली तो वह राजा के निर्णय से खिन्न हो जाती है। आननफानन में वह कैकेयी के महल में पहुंचती है। कहती है कि रानी अनर्थ हो गया। कैकेयी ने कहा कि मंथरा क्या अनर्थ हो गया। मंथरा ने कहा कि रानी क्या तुम्हें नहीं पता महाराज राम को अयोध्या का राजा बनाने जा रहे हैं। कैकेयी ने कहा कि इसमें अनुचित ही क्या है। राम सबसे बड़ा है। सहनशील है। प्रजा की दुख सुख को महसूस करता है। यदि महाराज ने राम को अयोध्या का राजा बनाने का निर्णय लिया है तो इसमें बुराई क्या है।
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मंथरा ने अपनी कुटिल नीति का प्रयोग करते हुए आखिरकार कैकेयी को भरमा देती है। परिणामस्वरूप कैकेयी राजा दशरथ से वरदान के तौर पर राम को चौदह वर्ष का वनवास तथा भरत को अयोध्या का राजा घोषित करने की मांग करती हैं। उधर, पिता के वचन की रक्षा के लिए प्रभु राम, माता सीता व लक्ष्मण वन के लिए प्रस्थान करते हैं। राजा दशरथ सुमंत से कहते हैं कि दो-चार दिन घुमाकर इन सभी को घर वापस ले आना। उधर, अयोध्यावासी भगवान राम का रास्ता रोककर खड़े हो जाते हैं। भगवान श्रीराम सभी को समझाते हैं और कहते हैं कि सभी लोग भरत की देखरेख में अपने धर्म का पालन सुनिश्चित करें। अगले दृश्य में अपने प्रिय पुत्र के वनगमन से पीड़ित राजा दशरथ प्राण का त्याग कर देते हैं। इससे अयोध्या में शोक की लहर दौड़ जाती है। इस दृश्य को देख दर्शक भावुक हो गए।
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